चुनावों में पद और पावर का दुरुपयोग
Shyam Kishore Choubey 1991 की अंतिम तिमाही की कोई तारीख रही होगी, जब पीवी नरसिंह राव के प्रचलित नाम से प्रसिद्ध तत्कालीन प्रधानमंत्री पमुलापति वेंकट नरसिंह राव लोकसभा का उपचुनाव लड़ने के लिए आंध्रप्रदेश के नंदयाल पहुंचे थे. उस समय उनका कारकेड हटा लिया गया था, जिस पर खूब बवाल कटा था. यह हिमाकत तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन (तिरूनेलै नारायण अइयर शेषन) के निर्देश पर की गई थी. 70 वर्षीय नरसिंह राव 1991 में सार्वजनिक जीवन से संन्यास लेने की योजना बना रहे थे. तभी एक ऐसी घटना हुई, जिसने उन्हें प्रधानमंत्री बना दिया. इसके पूर्व वे रक्षा मंत्री और आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री के अलावा कई अन्य महत्वपूर्ण पदों पर रह चुके थे. दसवीं लोकसभा के गठन के लिए 1991 में हो रहे आम चुनावों के दौरान तमिलनाडु के श्रीपेरम्बदूर में 21 मई को चुनावी जनसभा में मानव बम द्वारा तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के बाद परिस्थितियां विकट हो गई थीं. इसी माहौल में 17 भाषाओं के जानकार नरसिंह राव 21 जून 1991 को प्रधानमंत्री बनाये गये थे. तब वे राज्यसभा या लोकसभा में से किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे. संसद की सदस्यता हासिल करने की संवैधानिक बाध्यता के कारण उनको उपचुनाव में उतरना पड़ा था. चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरसिंह राव का कारकेड हटा लिया जाना मामूली घटना नहीं थी, तब जबकि कुछ ही महीने पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की चुनाव प्रचार के दौरान भरी सभा में हत्या की जा चुकी थी. प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, मंत्री अथवा किसी को भी पर्याप्त सुरक्षा दी ही जानी चाहिए. प्रजातांत्रिक लोक कल्याणकारी राज्य की यह प्राथमिक आवश्यकता है. इसके बावजूद यह सवाल लाजिमी है कि चुनाव प्रचार के दौरान संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्ति दल अथवा व्यक्ति विशेष के पक्ष में दलील, अपील और प्रेरित करनेवाली बातें कर सकते हैं अथवा नहीं? सच तो यह है कि वे खूब प्रेरित करते हैं. इतना ही नहीं, संबंधित दल अथवा व्यक्ति के प्रतिपक्षी के प्रति वे नमक-मिर्च लगाकर नकारात्मक बातें भी करते हैं. यह उनकी निष्पक्षता पर ऊंगली उठाता है. जब भी कोई व्यक्ति अथवा किसी दल का नेता मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री पद पर आसीन होने के ठीक पहले शपथ लेता है, तब वह किसी भी धर्म, जाति, दल, व्यक्ति अथवा क्षेत्र के प्रति किसी भी तरह का भेदभाव या पक्षपात न करने की शपथपूर्वक घोषणा करता है. इसके साथ ही वह अपने कार्य क्षेत्र और अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत आनेवाले तमाम व्यक्तियों, संस्थाओं के प्रति समान दृष्टि रखनेवाला मान लिया जाता है. बेशक, अधिकतर मामलों में ऐसा व्यक्ति किसी न किसी दल से जुड़ा होता है और जैसा कि मानव जीवन में होता है, उसमें भी राग-द्वेष होता है. इसके बावजूद जब वह संवैधानिक व्यवस्था के तहत मर्यादित किंतु अत्यंत संवेदनशील पद पर आसीन करा दिया जाता है, तो उससे अपेक्षा की जाती है कि वह पूरे समाज को एक नजर से देखेगा. इसके ठीक विपरीत चुनावों के दौरान दलगत जरूरतों से घिरा वही व्यक्ति सार्वजनिक रूप से अपना राग-द्वेष प्रदर्शित करता नजर आता है. मजे की बात यह कि ऐसे कृत्य पर किसी न किसी अंश में सार्वजनिक धन भी खर्च होता है. इस सार्वजनिक धन में उस व्यक्ति अथवा उस दल से जुड़े लोगों का भी पैसा होता है, जिनके प्रति संबंधित राजनेता कटूक्तियां अभिव्यक्त करता है. इसके बावजूद हम मानते हैं कि हमारे चुनाव निष्पक्ष होते हैं. है न अजीब स्थिति? इसे यह कहकर नहीं स्वीकार किया जा सकता कि ऐसी ही व्यवस्था है. निष्पक्षता का तमगा देकर जब हम किसी व्यक्ति को संवैधानिक पद पर आसीन कराते हैं तो ऐसी व्यवस्था भी बनायी जानी चाहिए कि उसकी निष्पक्षता बरकरार रहे. कुछ हद तक यह उस व्यक्ति पर भी निर्भर करता है, लेकिन सर्वमान्य व्यवस्था बन जाए तो बेहतर होगा. मुख्यमंत्री पूरे प्रदेश का मुख्यमंत्री होता है, यहां तक कि जिस व्यक्ति को वह चुनाव में हराकर यह पद हासिल करने के योग्य बनता है, उसका भी वही मुख्यमंत्री होता है. यही हालत राज्य के मंत्रियों की होती है. प्रधानमंत्री पूरे देश का प्रधानमंत्री होता है और उसकी कैबिनेट में शामिल तमाम मंत्री और उसके बाहर के उपमंत्री भी पूरे देश के मंत्री होते हैं. व्यवस्थागत अथवा दलगत कारणों से जब वे चुनाव मैदान में प्रतिपक्षी पर आग उगलते नजर आते हैं, तो उनकी विवशताएं और पक्षधरता सामने आ जाती है. उनको कुछ विशेष सुविधाएं भी मिल जाती हैं. इस कारण सत्ताधारी दल का जलवा बना रहता है और उसकी हनक देखते बनती है. कई दौर के चुनाव सुधारों के बाद हम इस स्थिति तक ही पहुंच सके हैं कि चुनावों के दौरान प्रत्याशियों का विधि-सम्मत खर्च निर्धारित कर पाये हैं, हालांकि दलों के खर्च पर अंकुश नहीं लग सका है. इससे चुनाव के दौरान संवैधानिक पदवाले राजनेताओं के खर्च का सहज एडजस्टमेंट हो जाता है. परिस्थितियां बता रही हैं कि सत्ता के लिए चुनाव लड़ने और सत्ता पर रहते हुए चुनाव लड़ने में बहुत फर्क है. इस फर्क को मिटाने के बाद ही पारदर्शिता की गुंजाइश बनेगी और समदर्शी भाव सामने आएगा. ऐसी ही एक अन्य विकट स्थिति है. जेल में रहकर भी कोई व्यक्ति चुनाव लड़ सकता है, हजारों/लाखों लोगों के वोट प्राप्त कर सकता है, जबकि खुद उसका वोटिंग राइट जब्त रहता है. जो आदमी स्वयं वोट नहीं दे सकता, वह अनेक लोगों के वोट पाने का अधिकारी हो सकता है, यह अजीब स्थिति हमने ही बनायी है. सुधारों और अमृत काल के इस दौर में क्या हम ऐसी व्यवस्था बनाने के काबिल हैं कि चुनावों में पद और पावर का दुरुपयोग रोकते हुए नजर तो आएं कम से कम. डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. [wpse_comments_template]

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