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हत्या के 17 साल पुराने मामले में अभियुक्त झारखंड हाईकोर्ट से बरी, उम्रकैद की सजा रद्द

Ranchi News : हजारीबाग की निचली अदालत ने मो. खलील को हत्या के मामले में उम्रकैद और साक्ष्य छिपाने के मामले में सात साल की सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी.हाईकोर्ट  ने मो. खलील की ओर से दायर सजा के खिलाफ अपील पर यह फैसला सुनाया.अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है.
 
झारखंड हाईकोर्ट (फाइल फोटो)
  • साक्ष्य के अभाव में झारखंड हाईकोर्ट ने सुनाया फैसला
  •  जांच में खामियों और निचली अदालत के अनुमान पर उठाए सवाल

Ranchi News : झारखंड हाईकोर्ट ने हत्या और साक्ष्य छिपाने के 17 साल पुराने मामले में  फैसला सुनाते हुए आरोपी मो. खलील को बरी कर दिया है. अदालत ने अभियोजन पक्ष की ओर से आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त और विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए जाने के कारण निचली अदालत के फैसले को रद्द कर दिया.

 

हजारीबाग की निचली अदालत ने मो. खलील को हत्या के मामले में उम्रकैद और साक्ष्य छिपाने के मामले में सात साल की सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी.हाईकोर्ट  ने मो. खलील की ओर से दायर सजा के खिलाफ अपील पर यह फैसला सुनाया.अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है.  

 

क्या है मामला

मामला वर्ष 2009 का है. 21 मार्च 2009 को हजारीबाग जिले के बड़कागांव थाना क्षेत्र के पसेरिया गांव में पहाड़ी नाले के पास एक अज्ञात महिला का शव बरामद किया गया था. महिला के शरीर पर चोट के निशान थे. शव की पहचान नहीं हो सकी थी. इसके बाद पुलिस ने हत्या और साक्ष्य छिपाने के आरोप में अज्ञात लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर जांच शुरू की.

 

जांच के दौरान मृतका की पहचान ममता रानी डे उर्फ रीता डे के रूप में हुई. पुलिस के अनुसार मृतका और आरोपी मो. खलील के बीच पहले से संबंध थे. मो. खलील पर आरोप था कि उसने अपनी वास्तविक पहचान छिपाकर मृतका से संबंध बनाए थे. बाद में दोनों के बीच विवाद होने लगा था. मृतका ने आरोपी के खिलाफ वरिष्ठ अधिकारियों से शिकायत भी की थी. अभियोजन पक्ष ने इसी विवाद को हत्या का संभावित कारण बताया था.

 

होटल संचालक ने आरोपी की पहचान से किया इनकार

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि मामले में कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं था. अभियोजन पक्ष ने परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर आरोपी को दोषी ठहराने की मांग की थी.अभियोजन पक्ष के अनुसार, घटना से पहले 19 मार्च 2009 को आरोपी अपनी पत्नी के साथ रांची के स्टेशन रोड स्थित एक होटल में ठहरा था. होटल के रजिस्टर में नाम और पता दर्ज होने की बात भी सामने आई थी. हालांकि, होटल संचालक ने अदालत में स्पष्ट रूप से कहा कि कटघरे में खड़ा व्यक्ति वह नहीं था, जो होटल में ठहरा था. उसने आरोपी की पहचान करने से भी इनकार कर दिया. हाई कोर्ट ने माना कि होटल संचालक की गवाही आरोपी को घटना से जोड़ने वाली महत्वपूर्ण कड़ी साबित नहीं हुई.

 

ड्यूटी रजिस्टर को लेकर निचली अदालत के निष्कर्ष पर सवाल

आरोपी उस समय हटिया रेल थाना में तैनात था. बचाव पक्ष ने अदालत को बताया कि संबंधित अवधि में आरोपी की ड्यूटी का विवरण गार्ड रजिस्टर में दर्ज था. 19 और 20 मार्च 2009 को वह मैगजीन गार्ड के रूप में ड्यूटी पर था, जबकि 21 मार्च को उसकी ड्यूटी हटिया-जम्मूतवी एक्सप्रेस में ट्रेन एस्कॉर्ट पार्टी के साथ थी.

 

निचली अदालत ने माना था कि ड्यूटी के बीच मिले समय में आरोपी हटिया से हजारीबाग जाकर हत्या कर सकता था और वापस लौटकर ड्यूटी पर उपस्थित हो सकता था.हालांकि, हाईकोर्ट ने इस निष्कर्ष को विश्वसनीय साक्ष्यों पर आधारित नहीं माना. खंडपीठ ने कहा कि आरोपी के ड्यूटी से अनुपस्थित रहने या निर्धारित समय में घटनास्थल तक जाकर हत्या करने के संबंध में कोई ठोस साक्ष्य नहीं था. निचली अदालत का निष्कर्ष केवल अनुमान पर आधारित था.

 

घटनास्थल पर संघर्ष के निशान नहीं मिले

हाईकोर्ट ने जांच अधिकारी की गवाही का भी उल्लेख किया. जांच अधिकारी के अनुसार, जहां महिला का शव मिला था, वहां संघर्ष के कोई निशान नहीं पाए गए थे. यह भी पता नहीं चल सका था कि हत्या वास्तव में किस स्थान पर की गई थी. शव के पास महिला का बैग और अन्य सामान मिले थे. बैग में डायरी और कुछ कागजात भी थे, जिनमें मृतका और आरोपी के संबंधों से जुड़ी घटनाओं का उल्लेख था.

 

खंडपीठ ने सवाल उठाया कि यदि हत्या किसी दूसरे स्थान पर की गई थी और शव को नाले के पास फेंका गया था, तो आरोपी मृतका के सामान को शव के पास क्यों छोड़ता, जिससे उसकी पहचान और आरोपी के साथ संबंधों का पता चल सके. अदालत ने कहा कि इन परिस्थितियों से आरोपी की संलिप्तता स्वतः साबित नहीं होती.

 

धारा 313 के बयान में भी महत्वपूर्ण कमी

हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि आरोपी और मृतका के बीच खराब संबंधों को हत्या का कारण मानते हुए निचली अदालत ने जिन परिस्थितियों पर भरोसा किया, उनके संबंध में आरोपी से दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के तहत दर्ज बयान में उचित सवाल नहीं पूछे गए थे. खंडपीठ के अनुसार, आरोपी के सामने संबंधित परिस्थितियां रखे बिना उन पर दोषसिद्धि के लिए भरोसा नहीं किया जा सकता था.

 

 निचली अदालत का फैसला रद्द, आरोपी बरी

 सभी तथ्यों, गवाहों के बयानों और उपलब्ध साक्ष्यों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ हत्या और साक्ष्य छिपाने के आरोप साबित करने में विफल रहा है.इसके बाद खंडपीठ ने 16 सितंबर 2013 को सुनाए गए दोषसिद्धि के फैसले और 17 सितंबर 2013 को सुनाई गई सजा को रद्द कर दिया. अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए आरोपी मो. खलील को बरी कर दिया. चूंकि आरोपी पहले से जमानत पर था, इसलिए उसे जमानत बंधपत्र की देनदारी से भी मुक्त कर दिया गया. 

 

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