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कल-पुर्जों के कचरे से कई परिवार का चलता है पेट
आदित्यपुर औद्योगिक क्षेत्र के मशीनों से निकलने वाले कल-पुर्जों के कचरे से कई परिवार का पेट पलता है. इस व्यवसाय से जुड़े लोगों को सुबह से इंतजार रहता है कि कब कारखाना से कचरा बाहर निकलेगा और यह उस कचरे से लोहा चुनकर अपने दिनभर का गुजारा कर सकेंगे. औद्योगिक क्षेत्र में 30 से 40 परिवार के लोग अप्रत्यक्ष रूप से इससे जुड़े हैं. औद्योगिक क्षेत्र के मशीनों से निकलने वाले इन कचरों को आम बोलचाल की भाषा में स्क्रैप भी कहा जाता है. आदित्यपुर औद्योगिक क्षेत्र में तकरीबन 13 सौ कल-कारखाने हैं. अनुमानित आंकड़े के मुताबिक प्रतिदिन 30 से 40 लोग अलग-अलग सड़क पर फैक्ट्रियों से निकलने वाले मशीन के लोहे के कचरे को चुंबक के सहारे जमा करते हैं. बाद में इन कचड़ों में शामिल लोहे के कण और बुरादा को अलग करते हैं. बाद में इसे लोहे के टाल में बेच देते हैं, जिससे इन परिवारों को दो वक्त की रोटी नसीब हो पाती है. इसे भी पढ़ें :BSSC">https://lagatar.in/bssc-paper-leak-case-paper-also-came-out-from-begusarais-examination-center-accountant-roshan-arrested/">BSSCपेपर लीक मामला : बेगूसराय के परीक्षा केंद्र से भी बाहर आया था पेपर, अकाउंटेंट रोशन गिरफ्तार
50 किलो तक निकलता है लोहे का कण, 7 से 25 रुपये किलो बिकता है
औद्योगिक क्षेत्र के सड़कों पर प्रतिदिन दर्जनों लोग चुंबक और झाड़ू मार कर एकत्र किए गए लोहे के बुरादे को जमा करते हैं. जिन्हें अलग करने के बाद हर दिन करीब 50 किलो तक लोहे का बारीक कचरा निकलता है. कचरा से निकलने वाले लोहे के इन बारीक कणों की कीमत भी उनकी क्वालिटी के मुताबिक अलग-अलग है. लोहे का यह कचरा 7 से लेकर 25 रुपये किलो ग्राम तक बाजार में बिकता है. इन कचरों को दोबारा री-साइकिल कर लोहा बाजार में प्रयोग में लाया जाता है. अमूमन 50 से 60 किलो लोहे का कचरा निकलने से एक व्यक्ति 200 से 500 रुपये तक कमा लेता है. जबकि इसके ठीक विपरीत जब कचरा कम निकलता है तो कमाई भी उसके अनुसार कम ही होती है. इसे भी पढ़ें :अफसर">https://lagatar.in/officers-do-not-want-employees-become-officers-of-their-counterparts/">अफसरनहीं चाहते, कर्मचारी बने उनके समकक्ष के अधिकारी
लॉकडाउन और औद्योगिक मंदी में हुआ था बुरा हाल
कोरोना काल के दौरान लॉकडाउन में अधिकांश उद्योग और कल-कारखाने बंद थे, लिहाजा मशीनरी और कलपुर्जे भी नहीं चलते थे. ऐसे वक्त में इससे जुड़े कई लोगों को अपना और अपने आश्रितों का पेट पालने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था. इस धंधे से जुड़े कुछ मजदूर बताते हैं कि उस वक्त सरकार की ओर से जो चावल आपूर्ति की जाती थी, उसे ही खा कर ये गुजर-बसर कर रहे थे. हालांकि अब धीरे-धीरे परिस्थितियां सामान्य हो रही है और उद्योग धंधे भी रफ्तार पकड़ रही है. ऐसे में मशीनरी कचरा बेचने वाले लोगों का कामकाज भी धीरे-धीरे ठीक-ठाक हो रहा है. इसे भी पढ़ें :आदित्यपुर">https://lagatar.in/adityapur-hanumanji-is-the-living-deity-of-the-present-with-his-grace-happiness-and-prosperity-will-prevail-in-the-country-and-the-world-sunny-singh/">आदित्यपुर: हनुमानजी वर्तमान के जीवंत देवता है, इनकी कृपा से देश दुनिया में सुख समृद्धि कायम रहेगी – सन्नी सिंह [wpse_comments_template]

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