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आखिर नैतिक पुलिसिंग को सभ्य कौन तय करेगा और किस आधार सेः मनोज कुमार झा

राजद सांसद मनोज कुमार झा ने बिहार सरकार के एक मंत्री के उस वक्तव्य पर सवाल खड़ा किया है, जिसमें मंत्री श्रेयसी सिंह ने सभ्य या बेहतर नैतिक पुलिसिंग का जिक्र किया है. मनोज कुमार झा ने लिखा है- “सभ्य या बेहतर नैतिक पुलिसिंग” जैसे शब्दों को सुनना उनसे गुजरना ही अपने आप में भयावह लगता है. बिहार मंत्रिमंडल के एक मंत्री द्वारा “सभ्य” शब्द का इस्तेमाल दरअसल उस भयावह प्रवृत्ति के पक्ष में ही एक तर्क गढ़ देता है, जिसे सवालों के घेरे में होना चाहिए. आखिर नैतिक पुलिसिंग को सभ्य कौन तय करेगा और किस अधिकार से?
 
सांसद मनोज कुमार झा की फ़ाइल फोटो.
  • - लिंचिंग करने वाली भीड़ भी खुद को नैतिक पुलिस ही समझती है.

Lagatar Desk

राजद सांसद मनोज कुमार झा ने बिहार सरकार के एक मंत्री के उस वक्तव्य पर सवाल खड़ा किया है, जिसमें मंत्री श्रेयसी सिंह ने सभ्य या बेहतर नैतिक पुलिसिंग का जिक्र किया है. मनोज कुमार झा ने लिखा है- “सभ्य या बेहतर नैतिक पुलिसिंग” जैसे शब्दों को सुनना उनसे गुजरना ही अपने आप में भयावह लगता है. बिहार मंत्रिमंडल के एक मंत्री द्वारा “सभ्य” शब्द का इस्तेमाल दरअसल उस भयावह प्रवृत्ति के पक्ष में ही एक तर्क गढ़ देता है, जिसे सवालों के घेरे में होना चाहिए. आखिर नैतिक पुलिसिंग को सभ्य कौन तय करेगा और किस अधिकार से?

 

मनोज कुमार झा ने आगे लिखा- सिर्फ विचार के लिए एक बात रख कर देखें. लिंचिंग करने वाली भीड़ भी खुद को नैतिक पुलिस ही समझती है. वह भी अपने हिंसक कृत्य को नैतिकता, सम्मान और सामाजिक व्यवस्था की रक्षा के नाम पर जायज़ ठहराती है. और जब ऐसी भीड़ को मंत्रिमंडल के मंत्री माला पहनाकर सम्मानित करने लगें, तो निंदा और वैधता के बीच की रेखा खतरनाक ढंग से धुंधली होने लगती है. शब्द मायने रखते हैं. कभी-कभी कोई विशेषण सिर्फ किसी प्रवृत्ति का वर्णन नहीं करता, उसे सामान्य और स्वीकार्य भी बनाने लगता है. और हमने बीते वर्षों में इस तरह की प्रवृतियों का सामान्यीकरण देखा है और भुगता है.

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