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अक्षय तृतीया : लोक में अक्षय काल

Dr Mayank Murari  Lagatar Desk:   जिसका क्षय नहीं होता है, वह अमरता से भरा होता है, वही पुण्य का पावन वास होता है. वह अक्षय और अविनाशी है. उस अस्तित्व के साथ खुद को जोड़ कर ऊर्ध्व आरोहण का यह अक्षय काल है. कहा गया है कि कलप कलप लगि प्रभु अवतारही. यानी हरेक कल्प में ईश्वर खुद अवतार लेते हैं, और सृष्टि का विस्तार करते हैं. सृष्टि के विस्तार का एक चक्र है, जिसे सृष्टि चक्र कहते हैं. यह चक्र लघु से दीर्घ है. भारतवर्ष की देश और काल का यह चिंतन असाधारण है. इस पृथ्वी पर काल और देश के विराटतम और शाश्वत के संबंध की यह विशिष्ट अंतदृष्टि है. यह चिंतन कोई आज का नहीं है, बल्कि हजारों साल पूर्व ऋषियों ने समाधि की अवस्था में इसका अन्वेषण किया था. हमने काल और देश के चिंतन के लिए लौकिक और परालौकिक शब्द गढ़े. पृथ्वी पर दिवस और रात्रि का होना किसी और जगह के लिए सत्य नहीं हो सकता है. इसलिए हमने इसे लौकिक समय माना. चूंकि हमारी पृथ्वी की गति और ग्रह-नक्षत्रों की गति में भिन्नता है, अतएव हमारे संवत्सर भी एक नहीं होंगे. इसलिए मानव का सौ वर्ष का जीवन काल, ब्रह्मा के 100 वर्ष के जीवन काल के बराबर नहीं होगा. https://lagatar.in/wp-content/uploads/2023/04/Untitled-387.jpg"

alt="" width="600" height="400" /> ब्रह्मा का एक दिन दो भाग दिवस और रात्रि में विभाजित है. दिवस में ब्रह्मा द्वारा इस सृष्टि का विस्तार और विकास किया जाता है और रात्रि में सृष्टि विस्तार का संकुचन होता है और अंततः वह ब्रह्मा में सम्माहित हो जाता है. ब्रह्मा का एक दिवस ही एक कल्प कहलाता है और एक रात्रि भी कल्प है. इस एक कल्प को मानव वर्ष में बदले तो 432 करोड़ मानव वर्ष से ब्रह्मा का एक कल्प बनता है. एस्ट्रो फीजिक्स में बताया जाता है कि ब्रह्मांड की पृष्ठभूमि अत्यंत घनत्व वाले पदार्थ की है, जो कम जगह को घेरती है. फिर विस्फोट हुआ, जिसे बिग बैंग कहा गया. इससे ब्रह्मांड का विस्तार होता चला गया. उस विस्तार की क्रिया अब भी सभी तत्वों पर क्रियाशील है जिसे चुबंबकीय तरंग, गुरुत्व बल और रेडियो तरंग के माध्यम से महसूस किया जाता है.

एकोडहं बहुस्याम

पृथ्वी द्वारा सूर्य का चक्कर लगाया जाता है. सूर्य द्वारा आकाशगंगा का और आकाशगंगा द्वारा ध्रुवतारा या सप्तर्षि तारामंडल का चक्कर लगाया जाता है. लेकिन यह ध्रुव किसका चक्कर लगाता है. उस तत्व को हमने ब्रह्म या ब्रह्मा कहा. इस सोपान पर समय और देश का स्तर और सीमा समाप्त हो जाती है. इस कारण हमने कहा कि जो कालातीत और देशातीत है, वह विराट स्वयं में महाकाल और शाश्वत है. देश में वह अक्षत है और काल में वह अक्षत काल है. जहां समय की गति और देश की प्रक्रिया खत्म हो जाती है. आखिर इनकी अभिव्यक्ति और क्रियाशीलता खत्म कैसे होती है? गीता में कहा गया है कि सभी अभिव्यक्तियां अव्यक्त ब्रह्मा से निकलती है और रात्रि का समय आने पर उसी में समावेशित हो जाती है जो खुद अव्यक्त है. इस अव्यक्त से अव्यक्त के निर्माण का एक सुंदर उदाहरण मिट्टी से पौधे का अंकुरण है. जब मिट्टी के अंदर बीज होता है, तो वह अव्यक्त होता है, जिसकी विस्तार की सीमा ब्रह्मा की तरह अनंत होती है. पहली अभिव्यक्ति की प्रक्रिया बीज के अंकुरण से होती है. यह पहली व्यक्त प्रक्रिया है. इसके बाद सब कुछ व्यक्त और दृष्टिगोचर होता है. वेदांत की भाषा में कहा जाए तो बीज हो या ब्रह्मा, दोनों एकोडहं बहुस्याम के मूलभाव की तरह एक से अनेक हो जाते हैं.

एक सहस्र महायुग का एक कल्प

सृष्टिक्रम और विकास की गणना के लिए कल्प भारतीय मापदंड है. मानव की औसत आयु सौ वर्ष मानी गई है. परमेष्टि की आयु भी सौ साल मानी गई है. लेकिन व्यक्ति और उस परमेष्टि अर्थात् ब्रह्मा की सौ साल की आयु में काल और देश का विराट अंतर है. ब्रह्मा की आयु सौ साल है लेकिन उस सौ साल में एक दिन को एक कल्प के बराबर माना गया है. प्रत्येक कल्प के अंत में प्रलय होता है, जब धरती पर से जीवन समाप्त हो जाता है. ब्रह्मा के दिन और रात बीतने पर सृष्टि पुनः अपने को नवीनीकृत करती है. एक दिन की कालावधि एक कल्प के बराबर होती है और उसके बाद प्रलय आता है. कल्प को चार अरब बत्तीस करोड़ मानव वर्षों के बराबर का माना गया है. यह ब्रह्मा के एक दिवस या एक सहस्र महायुग (चार युगों के अनेक चक्र) के बराबर होता है. चार अरब वर्ष पूर्व जीवन की उत्पत्ति मानी गई है. इस प्रकार कल्प हिन्दू समय चक्र की बहुत लम्बी मापन इकाई है.

सदा गतिशील है जगत

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alt="" width="600" height="400" /> सृष्टि के उस आदि काल के आरंभ में जब परमपुरुष ने अपनी शक्ति के साथ क्रियाशील होने की सोची, तो काल और देश की सृष्टि हुई. अस्तित्व के विस्तार की सीमा अनंतकाल से अक्षय और अनश्वर है. ईशावास्योपनिषद हमसे कहता है कि यह जगत जिसमें अनगिनत सूर्य, नक्षत्र, निहारिकाएं समाई हुई हैं और जिसमें एक नगण्य उपस्थिति और अनंत अहम् लिए हम इंसान भी समाए हैं, वह जगत सदा गतिशील है. उस आदिकाल में जब यह जगत बना तब से यह चल रहा है, बिना एक भी पल को रुके. छांदोग्य उपनिषद के अनुसार, शुरू में केवल एक ब्रह्म था. चूंकि वह अकेला था, उसने यह संकल्प किया, ‘एकः अहम् बहुस्याम’ और वह अपनी इच्छा और तप से एक से अनेक हो गया. ऋग्वेद के नासदीय सूक्त के अनुसार, सृष्टि की उत्पत्ति के पहले ना सत था ना असत, केवल अंधकार था. असत से अर्थ शून्य से है, जिसका कोई रूप नहीं है. सत से अर्थ पदार्थ या मैटर से है.

परमतत्व का यशगान है सृष्टि

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alt="" width="600" height="400" /> ऋग्वेद के नासदीयसूक्त 10-129 में सृष्टि के उद्भव का उल्लेख किया गया है-सृष्टि के आदिकाल में न सत् था न असत, न वायु थी, न आकाश, न मृत्यु थी और न अमरता, न रात थी न दिन, उस समय केवल वही था जो वायुरहित स्थिति में भी अपनी शक्ति से सांस ले रहा था. उस समय परम कारण, व्यापक एकमात्र ईश्वर ही अवस्थित थे. सर्वव्यापक भगवान आत्मस्वरूप में स्थित होकर सर्वप्रथम मन की सृष्टि करते हैं. फिर अंहकार की सृष्टि होती है. उससे शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गंध नामक पंचतन्मात्रा तथा क्षिति, जल, पावक, गगन समीरा नामक पंचमहाभूतों की उत्पत्ति होती है. इन भूत और मात्रा की हरेक क्रिया कर्म है जिसे दर्शन की भाषा में प्रक्रिया कहते हैं. इस प्रकार कोई भी प्रक्रिया की प्रकृति अनश्वर होती है. यह जगत भी एक प्रक्रिया है. जहां निरंतर कर्म और परिवर्तन चल रहा है. यह कर्म और परिवर्तन ही ब्रह्माण्ड की उत्पति का कारण है. सभी भिन्न निहारिकाएं, और बाद में ग्रह-नक्षत्र, फिर प्रकृति और मनुष्य, सब अस्तित्व में आते हैं. उन सबका प्रलंबन ही कर्म कहलाता है. इनमें से प्रत्येक तत्व नाशवान है. इसलिए यह अधिभूत कहलाते हैं. ( स्वामी रंगनाथानंदः भगवदगीता, भाग-दो, पृष्ठ- 245). यह जहां से आते हैं. वह ब्रह्म ही अनश्वर है, जिससे कल्प के आरंभ में इस ब्रह्माण्ड की उत्पति होती है. इस ब्रह्म के व्यक्तभाग को भूताकाश यानी सृष्टि और अव्यक्त भाग को चिताकाश कहा गया. इस चिताकाश में सबकुछ ओतप्रोत है. जहां कुछ परिवर्तन नहीं होता है, बल्कि यहां देश और काल की स्थिति भी शाश्वत होती है. श्रीकृष्ण गीता (10.42) में इसी बात को कहते हैं कि मैं अपने एक अंश से इस संपूर्ण ब्रह्माण्ड को धारण किए हुए विद्यमान हूं. ऋग्वेद के पुरुषसूक्त के माध्यम से ऋषियों ने कहा कि पादोडस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि. वास्तविकता का एक चौथाई अंश इस जगत के रूप में व्यक्त है और शेष सभी अभिव्यक्तियों के परे और अनश्वर है. यह सृष्टि बहुस्वरूपों में प्रकट होते हुए भी उसी पवित्रतम को विविध अभिव्यक्तियों से उद्भाषित करती है. सब कुछ उस परमतत्व का यशगान है. इसके बावजूद भी उस परमतत्व का स्वरूप अभिव्यक्ति की सीमा से बाहर होता है. अपने स्वरूप का वर्णन करते हुए भगवान कहते ( गीता - 08.16 ) हैं कि सभी लोक, जिसमें ब्रह्मलोक भी शामिल है, एक समय के बाद उसका क्षय हो जाता है. वह वापस लौट जाते हैं. केवल मेरे स्वरूप से एकाकार होकर ही पुनर्जन्म नहीं होता है. यही कारण है कि महाव्योम में स्थित ब्रह्माण्ड भी एक भुवन है. एक घर जिसमें व्यक्ति और जीवन रहता है और जिसको खत्म होना पड़ता है. यह लोक भी कल्प के बाद पुनः उस परमतत्व में वापस लौट जाता है. उस परमतत्व की प्रकृति हिरण्यगर्भ की है. उसमें कई लोक, कई ब्रह्म और कई कल्पों की रचना चलती रहती है.

शेषनाग पर नारायण

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alt="" width="600" height="400" /> ब्रह्मा के निर्माण और कल्प के साथ सृष्टि के विस्तार की पौराणिक कथा के अनुसार नारायण शेष नाग पर ध्यानस्थ योग निद्रा में रहते हैं. उस नाग पर अव्यक्त नारायण स्थित है जो खत्म नहीं हुआ है, जो शेष है. जब समस्त ब्रह्मांड कल्प में विलीन हो जाता है और जब वह अनंत विस्तार करता है, तब भी वह शेषनाग पर असीम चेतना के साथ विराजमान होते हैं. जब वह योगनिंद्रा में होते हैं, तब उनसे ब्रह्म प्रकट होता है. जब ब्रह्मा बाहर आते हैं, तो कुछ समझ में नहीं आता, अतएव पुनः विष्णु में समा जाते हैं. लेकिन उनको एहसास होता है कि कुछ करना है. बाहर आने पर उनको तप, तप का स्वर सुनाई पड़ता है. यह मन और ज्ञान का तप है. सृजन और विस्तार के पूर्व का तप है. यह ब्रह्मा द्वारा सृष्टि के विस्तार के लिए तप किया जाता है. कथा के अनुसार अस्तित्व का अंत भी विष्णु में समाहित होने से होता है, और जब विष्णु इच्छा करते हैं, तो उनसे ब्रह्म खुद को कल्प के दिवस में विस्तार करते हैं. इसे भी पढ़ें: छवि">https://lagatar.in/why-did-the-government-not-take-action-on-the-report-of-the-commissioner-against-chhavi-ranjan-ed-should-investigate-babulal/">छवि

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