
बैजनाथ मिश्र
ईरान में जारी लड़ाई से पूरी दुनिया हलकान है. पूरे विश्व पर ऊर्जा संकट के काले बादल दिनानुदिन घनीभूत होते जा रहे हैं. एक-एक दिन बामुश्किल गुजर रहे हैं. सबके जेहन में एक ही सवाल कौंध रहा है. वह यह कि यह युद्ध कब खत्म होगा. लेकिन इस सवाल का जवाब अमेरिका और इजरायल को देना है जिन्होंने इसे शुरु किया है. इसलिए उन उद्देश्यों पर गौर करना जरूरी है जिन्हें लेकर हमला किया गया है. इस युद्ध के अगुवा अमेरिका ने ईरान की राजनीतिक व्यवस्था बदलने (रिजीम चेंज), उसकी सैन्य शक्ति क्षीण करने और उसकी मारक (मिसाइल बनाने और उसे लांच करने) क्षमता खत्म करने के मकसद से यह युद्ध थोपा है.
अमेरिका यह भी चाहता है कि ईरान यूरेनियम संवर्धन न कर पाये और परमाणु हथियार न बना सके. वह अरब देशों में ईरान प्रोत्साहित आतंकी गिरोहों और सहयोगी गुटों को भी नेस्तनाबूद करना चाहता है. लेकिन वह अपने इन उद्देश्यों को ईरान में लोकतंत्र की बहाली और वहां कायम मजहबी हुकूमत के कारण दमन झेल रहे नागरिकों को आजादी दिलाने की चाशनी में डुबोकर पेश कर रहा है. हकीकत यह है कि वह बहुध्रुवीय बनते विश्व समुदाय को एक ध्रुवीय बनाने के लिए भी जहां-तहां हिंसक खुरपेंची ऊधम मचा रहा है.
जहां तक इजरायल की बात है, वह दरअसल अमेरिका का बगल बच्चा है. इजरायल स्वयं को तब तक सुरक्षित नहीं मान सकता है जब तक ईरान की वर्तमान व्यवस्था तहस-नहस न हो जाय या ईरान जिहादी मानसिकता छोड़ न दे. इजरायल ईरान को गाजा जैसा सबक नहीं सिखाना चाहता है क्योंकि 1979 में हुई क्रांति से पहले का ईरानी समाज इजरायल को अपना मित्र मानता था. इसलिए इजरायल ईरान में रह रहे अलग-अलग सामाजिक समूहों के संपूर्ण विनाश से गुरेज कर रहा है. इसलिए वह टारगेटेड हमला कर रहा है. वैसे भी ईरान एक प्राचीन सभ्यता का हिस्सा रहा है और इसीलिए उसके भारत से भी भू राजनीतिक ही नहीं, गहरे सांस्कृतिक संबंध रहे हैं. सारी गड़बड़ी 1979 की क्रांति के बाद शुरु हुई है.
संक्षेप में कहें तो अमेरिका-इजरायल के उद्देश्य लगभग एक जैसे ही हैं. इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने ऐसी सटीक सूचना उपलब्ध करायी कि युद्ध शुरु होते ही सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामनेई सहित पहली कतार के लगभग सभी नेता मार दिये गये. ईरान के सुरक्षा प्रमुख अली लारीजानी समेत कुछ अन्य कमांडर भी ढ़ेर कर दिये गये हैं. फिलिस्तीन में हमास, यमन में हूती तथा लेबनान में हिजबुल्ला जैसे आतंकी संगठनों की कमर टूट चुकी है. इन संगठनों को ईरान ने ही पोषित और खूंखार बनाया था और वह भी केवल इजरायल को तबाह करने के लिए. हिजबुल्ला अब भी थोड़ा फड़फड़ा रहा था, लेकिन इजरायल उसके ठिकानों पर लगातार हमला कर रहा है.
ईरान की समस्या यह है कि उसे कहीं से भी अपेक्षित सहायता नहीं मिल पा रही है. रूस खुद यूक्रेन युद्ध में फंसा है. वह सैन्य सहायता पहुंचाने की स्थिति में नहीं है. चीन एक शातिर खिलाड़ी है. वह सिर्फ दिखावे के लिए ईरान के साथ है. वह ईरान के लिए अमेरिका के साथ अपने व्यापारिक रिश्तों की बलि चढ़ाने की हद तक जाने को तैयार नहीं है. सीरिया में बशर-अल-असद का जमाना पहले ही लद चुका है जहां से ईरान को मदद मिलती थी. यानी ईरान सिर्फ अपने बूते अमेरिका-इजरायल की हेकड़ी गुम करने के लिए खम ठोंककर खड़ा है और हथियार डालने को तैयार नहीं है. उसने पश्चिम एशिया के दर्जन भर से अधिक देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों और बुनियादी ढ़ांचों पर हमला करके युद्ध का दायरा बढ़ा दिया है. इससे अमेरिका सकते में है.
ईरान ने द्विपक्षीय युद्ध को क्षेत्रीय संघर्ष में बदल दिया है. उसने स्ट्रेट ऑफ हार्मुज (जलडमरूमध्य) को बंद कर दिया है. इससे पूरी दुनिया में तेल और गैस के लिए त्राहि-त्राहि मचेगी और विश्व समुदाय अमेरिका के खिलाफ हो जाएगा. ईरान जानता था कि बातचीत जारी रखने के बावजूद अमेरिका-इजरायल के साथ उस पर हमला करेगा. इसलिए उसने स्वयं को युद्ध के लिए तैयार कर लिया था. उसने अपने मिसाइल लांचरों को देश के अलग-अलग हिस्सों में छिपा दिया था और जब युद्ध शुरु हुआ तो उसने अलग-अलग ठिकानों से मिसाइलों की ऐसी वर्षा कर दी कि अमेरिका, इजरायल ही नहीं, अरब देश भी भौचक रह गये.
हार्मुज से ईरानी अधिपत्य खत्म करने के लिए अमेरिका ने नाटो देशों से अपने युद्धपोत भेजने का आग्रह तो किया, लेकिन किसी ने साकारात्मक उत्तर नहीं दिया. बाद में अमेरिका के गिड़गिड़ाने पर कुछ देशों ने सहयोग का भरोसा दिया. इस प्रकार अमेरिका हिरण की तरह ऐसे जाल में फंस गया है जहां से निकलने के लिए वह जितना उछल-कूद मचा रहा है, और उलझता जा रहा है. वह इस युद्ध से निकलने का बहाना ढ़ूंढ़ रहा है.
खैर, अब हम लौटते हैं इस समूचे घटनाक्रम में भारत की भूमिका पर. एक तो यह समझ लीजिए कि हमारे यहां नेशन फर्स्ट की अवधारणा खत्म हो चुकी है. डोनाल्ड ट्रंप की सनक भरी कार्रवाई के बावजूद जहां अमेरिका में डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकन्स एक हैं, वहीं हमारे यहां विपक्ष सरकार को पलीता लगाने लगा है, विघ्नसंतोषी शक्तियों की खूरेंजी चालू है और आपदा में अवसर तलाशने वालों की बहार आ गयी है.
यह सही है कि हमारी सरकार से प्रारंभिक चूक हुई है. खामनेई के मारे जाने के बाद हमने जो बयान जारी किया वह महज एक कूटनीतिक वक्तव्य था. हमने कहा कि किसी देश की सार्वभौमिकता और उसकी सीमा पर हमला न हो. इसमें यह संदेश था कि अमेरिका-इजरायल ईरान पर हमला न करे और ईरान भी अरब देशों को निशाना न बनाये. इसके विपरीत देश का एक वर्ग और विपक्ष चाहता था कि सरकार खामनई की हत्या की निंदा करे. सरकारी पार्टी के प्रवक्ताओं ने इस मुद्दे पर बहसों में कहना शुरु किया कि खामनई न राष्ट्रपति थे, न प्रधानमंत्री. वह चीफ सुप्रीमो जरूर थे, लेकिन मजहबी प्रमुख थे. इसलिए सरकार से निंदा या शोक प्रस्ताव की मांग करना उचित नहीं है.
यह भी कहा गया कि वह आतंकी संगठनों का पोषक और संरक्षक थे. यदि ऐसा ही है तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने ईरान दौरे के क्रम में आतंकियों के इस आका से मिले क्यों? भारत ने हमले की निंदा का वह मौका भी गंवा दिया जब एक स्कूल पर बम वर्षा की गयी जिसमें करीब डेढ़-दो सौ निर्दोष बच्चे कालकवलित हो गये.
दरअसल सरकार को यह उम्मीद नहीं थी युद्ध इतना लंबा खिंचेगा. उसने सोचा होगा कि बस दो चार दिन में बारूदी धमाके बंद हो जायेंगे जैसा पिछली बार हुआ था. लेकिन करीब हफ्ते भर बाद सरकार समझ गयी कि अब कूटनीतिक चालों का वक्त आ गया है. उसके बाद सब ठीक होने लगा. ईरान को भी हमारे समर्थन की जरुरत थी. हमने उसका एक युद्ध पोत बचाया, दवायें और मेडिकल साजो सामान भेजा. प्रधानमंत्री भी सक्रिय हुए और विदेश मंत्री भी. अभी ईरान के साथ हमारे संबंध सामान्य हैं. लेकिन हम इजरायल और अमेरिका के खिलाफ तनकर खड़े नहीं हो सकते. इजरायल हमारा जांचा-परखा रणनीतिक साझेदार है और अमेरिका से हमारे गहरे व्यापारिक संबंध हैं. वैसे भी तुलसीदास ने रामचरित मानस में मारीच (रावण का मामा) के माध्यम से जिन नौ लोगों से विरोध मोल न लेने की सलाह दी है, उनमें शस्त्री, धनी और मूर्ख भी हैं. अमेरिका सबसे धनी है, उसके पास सबसे ज्यादा हथियार है और राष्ट्रपति ट्रंप मूर्ख के साथ-साथ सनकी भी हैं. इसलिए सही नीति यह है कि ट्रंप के कहे पर ध्यान मत दीजिए. अपना हित देखिए.
हमारे यहां भी गैस और तेल की किल्लत है. अभी तेल की किल्लत का कोई सतर्क करने वाला संकेत तो नहीं मिल रहा है, लेकिन गैस के दाम में 60 रुपये की बढ़ोतरी कर और कुछ नये नियम-परिनियम लागू कर सरकार ने बता दिया है कि गैस की किल्लत है. यह युद्ध शीघ्र समाप्त होना चाहिए. यह लंबा खिंचा तो दुनिया बर्बाद हो जाएगी. एक सबक उन्हें भी लेना चाहिए जो ऑपरेशन सिंदूर के चार दिन में ही बंद हो जाने पर सरकार की आलोचना कर रहे थे.
भारत ब्रिक्स संगठन का अध्यक्ष है. ईरान भी इसका सदस्य है. इसलिए हमें ब्रिक्स सदस्यों के साथ मिलकर युद्ध रोकने लिए दबाव बनाना चाहिए और ब्रिक्स के साथ मिलकर एक ऐसा व्यवस्था तंत्र तैयार करना चाहिए जिससे सदस्य देशों में गैस, तेल और उर्वरक का संकट पैदा न हो. यह हमारे लिए एक अवसर भी है स्वयं को विश्व स्तर पर स्थापित करने के लिए.
Leave a Comment