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सरहुल पूर्व संध्या पर दीक्षांत मंडप में हुआ आकर्षक सांस्कृतिक कार्यक्रम, मांदर की थाप पर थिरके युवक-युवतियां

रतो बहिन बेचो बरतो भैया, बेचो आइयो बरवा एरा गे बरो

Ranchi : सरना नव युवक संघ के तत्वावधान में बुधवार को रांची विश्वविद्यालय के दीक्षांत मंडप में सरहुल पूर्व संध्या रंगारंग कार्यक्रम का आयोजन किया गया. डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय, जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग रांची, सरस्वती हरिजन बालिका कॉलेज छात्रावास, दीपशिखा आदिवासी बालिका पीजी छात्रावास, आदिवासी बालक छात्रावास हातमा समेत 26 छात्रावासों के छात्र-छात्राओं ने सरहुल पूर्व संध्या कार्यक्रम में हिस्सा लिया. इस मौके पर छात्र-छात्राओं ने एक से बढ़कर एक आदिवासी नृत्य एवं संगीत कार्यक्रम प्रस्तुत किया. मांदर एवं ढोल का ऐसा दौर चला कि हर कोई झूमने पर विवश हो गया. कार्यक्रम में सरहुल गीत भी प्रस्तुत किये गये. भागीरथ आदिवासी बालिका कॉलेज छात्रावास रांची के छात्राओं ने मांदर की थाप पर सामूहिक नृत्य कुडुख बरतो बहिन, बेचो बरतो ,,,,,(आओ बहन खेलेंगे मां बाप को दिखाने के लिए खेलेंगे) के गीतों पर दीक्षांत मंडप तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा. कार्यक्रम में जनजातीय भाषाओं के मुंडारी, कुडुख, हो और संथाली के छात्र छात्राओं ने एकल एवं सामूहिक गीत संगीत और नृत्य प्रस्तुत किया. देर शाम विजेता टीम को आयोजन समिति ने पुरस्कृत किया.

सरना फूल पत्रिका का लोकार्पण

इससे पूर्व कार्यक्रम में सरना फूल पत्रिका के 44वें अंक का लोकार्पण किया. इस अवसर पर इस अवसर पर कुडुख लेखन साहित्यकार के क्षेत्र में कार्य करने के लिए भीखू तिर्की, हो भाषा के साहित्यकार डोबरो बिरूली, एयर होस्टेस के क्रांति गाड़ी को सम्मानित किया गया. कार्यक्रम में मुख्य अतिथि रांची विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. अजित कुमार सिन्हा, पूर्व मंत्री बंधु तिर्की, डॉ. हरि उरांव, बीरेंद्र कुमार सोय, प्रकाश चंद्र उरांव, जोहे भगत समेत अन्य शामिल हुए.

नृत्य-संगीत से कला-संस्कृति बचाने की प्रेरणा मिलती है : बंधु

पूर्व मंत्री बंधु तिर्की ने कहा कि इस तरह के कार्यक्रम आदिवासी समाज के युवाओं को कला संस्कृति बचाने के लिए प्रेरित करता है. साथ ही साथ समाज को नेतृत्व करने की क्षमता विकसित होता है. ओपेन यूनिवर्सिटी के त्रिवेणी कुमार साहु ने कहा कि सरहुल महापर्व दुनिया की संस्कृति में अक्षुण्ण संस्कृति है. इस त्योहार में पूर्वज प्रकृति के साथ परस्पर संबंध रखने का प्रयास करते हैं. जल, जंगल और जमीन जीविका का साधन है. सरहुल पर्व संस्कृति का त्योहार है. इस त्योहार को बसंत का त्योहार भी कहा जाता है. इसे भी पढ़ें : BREAKING:">https://lagatar.in/breaking-party-challenges-lokpal-order-related-to-shibu-soren-and-jmm-in-delhi-high-court-hearing-on-23rd/">BREAKING:

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