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जो आदेश प्रारंभ से ही गलत है, उसे बाद में नए आधार जोड़कर वैध नहीं बनाया जा सकता: हाई कोर्ट

  • - लंबित दया नियुक्ति मामले में सरकार की अपील खारिज.
  • - एकलपीठ के 7 जनवरी 2025 के आदेश को रखा बरकरार.

Ranchi: झारखंड हाईकोर्ट ने लंबे समय से लंबित दया नियुक्ति (Compassionate Appointment) के एक मामले में  फैसला सुनाया है.  हाई कोर्ट की खंडपीठ कहा है कि यदि प्रारंभिक आदेश ही त्रुटिपूर्ण है, तो उसे बाद में नए आधार जोड़कर सही नहीं ठहराया जा सकता. कोर्ट ने एकलपीठ के 7 जनवरी 2025 के आदेश को बरकरार रखते हुए राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी और प्रतिवादी के दया नियुक्ति के दावे पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया. प्रतिवादी कंचन देवी की ओर से अधिवक्ता सुभाशीष रसिक सोरेन और शोभा लकड़ा ने पक्ष रखा था. 

 

मामले में हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस एमएस सोनक एवं न्यायमूर्ति राजेश शंकर की कोर्ट ने यह फैसला सुनाया है. प्रतिवादी ने कोर्ट को बताया था कि उनका हिंदी विद्यापीठ द्वारा जारी सर्टिफिकेट 26 फरवरी 2015 के पहले का है. हाई कोर्ट की एकल पीठ ने देवघर स्थित हिंदी विद्यापीठ द्वारा जारी डिग्रियों को 26 फरवरी 2015 तक वैध माना है.  26 फरवरी 2015 के बाद जारी की गई डिग्रियों के आधार पर किसी भी प्रकार का लाभ नहीं दिया जाएगा.

 

सरकार का आरोप

अपील की सुनवाई में याचिकाकर्ता (राज्य सरकार) ने प्रतिवादी पर दया नियुक्ति के लिए देरी करने का आरोप लगाया गया था. कोर्ट ने कहा कि प्रतिवादी ने समय पर अपना दावा प्रस्तुत किया था और इसमें किसी प्रकार की लापरवाही नहीं थी.

 

क्या कहा हाई कोर्ट ने

सरकार की अपील पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि जो आदेश प्रारंभ से ही गलत है उसे बाद में नए आधार जोड़कर वैध नहीं बनाया जा सकता. कोर्ट ने यह भी कहा कि दया नियुक्ति योजना का मुख्य उद्देश्य कर्मचारी की आकस्मिक मृत्यु के बाद उसके परिवार को तत्काल आर्थिक सहायता प्रदान करना और उनकी कठिनाइयों को कम करना है.

 

क्या है मामला

दरअसल, राज्य सरकार ने 15 जून 2020 को प्रतिवादी के दावे को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि हिंदी विद्यापीठ, देवघर की डिग्री मान्यता प्राप्त नहीं है.  अपील के दौरान सरकार ने अपने निर्णय को सही ठहराने के लिए नए आधार प्रस्तुत करने की कोशिश की, जिसे कोर्ट ने स्वीकार करने से इनकार कर दिया.

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