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अर्जुन मुंडा ने सरकार की मंशा पर उठाए सवाल, कहा- पेसा नियमावली से बदली आदिवासी पहचान

Ranchi : झारखंड सरकार की पेसा नियमावली को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज होती जा रही है. राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा ने रविवार को कहा कि सरकार ने पेसा एक्ट की आत्मा पर ही कुठाराघात किया है. यह नियमावली पेसा एक्ट 1996 की मूल भावना के विपरीत है और आदिवासी समाज के साथ धोखाधड़ी की गई है.

 

अर्जुन मुंडा प्रदेश भाजपा कार्यालय में पत्रकारों से बात कर रहे थे. संवाददाता सम्मेलन में श्री मुंडा के साथ भाजपा के प्रदेश महामंत्री एवं सांसद डॉ. प्रदीप वर्मा, मीडिया प्रभारी शिवपूजन पाठक, सह मीडिया प्रभारी अशोक बड़ाइक और प्रवक्ता राफिया नाज भी उपस्थित थे.

 

अर्जुन मुंडा ने कहा कि झारखंड में पेसा नियमावली लागू करने की मांग लंबे समय से की जा रही थी. कई लोग न्यायालय भी गए. सरकार पर दबाव बना. फिर कैबिनेट से पास नियमावली सामने आई, लेकिन यह अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरती. 

 

पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि पेसा एक्ट वर्ष 1996 से लागू है और इसके बेहतर क्रियान्वयन के लिए राज्य सरकार को नियमावली बनाने का अधिकार जरूर है, लेकिन एक्ट की मूल भावना से छेड़छाड़ करने का अधिकार किसी सरकार को नहीं है. उन्होंने आरोप लगाया कि झारखंड सरकार ने नियमावली में एक्ट के मूल विषय का एक तरह से कोल्ड ब्लडेड मर्डर किया है.

 

अर्जुन मुंडा ने ग्राम सभा की परिभाषा को लेकर कहा कि किसी भी नियम में परिभाषा उसकी प्रस्तावना में स्पष्ट रूप से दी जाती है, जिससे उसके विस्तृत स्वरूप की दिशा तय होती है. झारखंड सरकार द्वारा घोषित पेसा नियमावली में ग्राम सभा की परिभाषा पेसा एक्ट 1996 से अलग और अस्पष्ट है. प्रस्तावना में केवल परंपरा का उल्लेख है, जबकि एक्ट में ग्राम सभा को रूढ़िजन्य विधि, धार्मिक प्रथा और परंपराओं के आधार पर परिभाषित किया गया है. 

 

अर्जुन मुंडा ने चेतावनी दी कि जब मूल भावना ही खत्म कर दी जाएगी तो इसके परिणाम गंभीर होंगे. यह नियमावली प्रशासन और संस्थाओं को मनमानी की छूट देगी और शासन तंत्र का संस्थागत विकास कमजोर होगा. उन्होंने कहा कि नियमावली भले ही पृष्ठों के हिसाब से बड़ी हो, लेकिन भावों के हिसाब से शून्य है. देर से बनी यह नियमावली दुरुस्त नहीं है और आदिवासी समाज के चारित्रिक स्वरूप को बदलने का प्रयास करती है.

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