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बाबा साहब डॉ अंबेडकर विष पिये, दिये अमृत

Anant Kumar Bermo: बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर भारत के संविधान निर्माता ही नहीं बल्कि युगपुरुष, युग प्रवर्तक और युगदृष्टा भी थे. उनका जीवन सरस, समतल, सपाट नहीं बल्कि आपत्ति, वाद विवाद में सिझा हुआ है. 14 अप्रैल 1891 को मध्यप्रदेश के महू जिला के रत्नागिरी में उनका जन्म हुआ था. अछूत समाज में जन्मने के बाद भी भारत की एकता, अखंडता, संप्रभुता और बंधुत्व का जो भाव और दुःख है, उसे कई मौके पर उन्होंने उद्धृत किया. महाकवि निराला की उक्ति है कि बाहर मैं कर दिया गया हूं. भीतर पर मार दिया गया हूं. बाबा साहब अंबेडकर भी उस पीड़ा के शिकार थे. मूकनायक पत्रिका बंद हो जाने के बाद उन्होंने 3 अप्रैल 1927 को पाक्षिक निकाला जिसका नाम `बहिष्कृत भारत`  रखा. नाम भी कितना सार्थक और कितना मार्मिक. दो शब्दों में दो भारत. बहिष्कृत है, लेकिन भारत है. भारत है लेकिन बहिष्कृत है. यह बहिष्कार बाबा साहेब को स्वीकार ना था. वह बहिष्कार को नियति मानने के लिए तैयार ना थे. बहिष्कार का बहिष्कार उनका संकल्प था. उन्हें बाहर कर दिए जाने की छटपटाहट की चरम परिणति बौद्ध धर्म में धर्मांतरण था, लेकिन भारत को अक्षुण्ण रखने के लिए हमेशा मार्गदर्शन और संघर्ष करते रहे. जिस समाज ने उन्हें गहरे जख्म दिये, विष दिया, उनके लिए उन्होंने संविधान दिया. जहां सबके लिए समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व जैसा अधिकार स्वरूप अमृत दिया. 25 नवंबर 1949 को संविधान सभा में उन्होंने ऐतिहासिक भाषण दिया. उन्होंने कहा कि मैं संविधान सभा में दलित वर्ग के हितों के लिए प्रवेश लिया था, लेकिन संविधान सभा ने उनका चयन मसौदा तैयार करने के लिए गठित समिति के अध्यक्ष पद पर कर दिया. उन्होंने संविधान सभा का कृतज्ञता व्यक्त किया. उन्होंने कहा कि मैं इस तथ्य से चिंतित हूं कि भारत एक बार नहीं बल्कि कई बार अपने ही लोगों की गद्दारी और या भक्ति के कारण स्वतंत्रता गवाई है. इसलिए क्या इतिहास स्वयं को फिर दोहराएगा. हिंदुओं के जातिभेद और पंथभेद दो दुश्मनों में एक दूसरे की विरोधी पार्टियों में सम्मिलित हुई है. इससे मेरी चिंता बढ़ गई है. उन्होंने कहा कि यदि आपने अपनी पार्टी का विचार राष्ट्रहित से बड़ा मान लिया तो भारतीय स्वतंत्रता खतरे में पड़ जाएगी. यह स्वतंत्रता सदैव के लिए समाप्त हो सकती है. इसलिए हमें अपने रक्त के अंतिम बूंद बहा कर भी स्वतंत्रता की रक्षा करनी है. उन्होंने व्यक्तिपूजा से सावधान रहने की बात कही. कहा था कि कोई देश सेवा में जीवन समर्पित किया है तो उसके प्रति श्रद्धा प्रकट करना कोई बुरी बात नहीं है, लेकिन अपना सम्मान गवांकर आभार व्यक्त नहीं किया जा सकता है. कोई नारी अपनी सतीत्व भंग कराकर उसे धन्यवाद नहीं कर सकती है. कोई राष्ट्र अपनी स्वतन्त्रता खोकर धन्यवाद नहीं कर सकता. इसलिए देशहित सर्वोपरि है. बाबा साहब अम्बेडकर आर्थिक चिंतकों में से एक थे. अर्थशास्त्र में पीएचडी करने वाले पहला भारतीय थे. उनकी थीसिस रुपए की समस्या पर थी. उनकी थीसिस से ही भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना की नींव रखी गई. 1942 में जब वे वायसराय की कार्यकारी परिषद् के सदस्य थे, जो श्रम मंत्री स्तर का पद था. उस समय उन्होंने श्रमिकों के लिए काम के घंटे 14 से घटाकर 8 घंटे किया था. श्रमजीवी महिलाओं को प्रसूति के दौरान अवकाश और लाभ की स्वीकृत कराया. इसे भी पढ़ें-  किस">https://lagatar.in/how-most-of-the-movements-are-made-the-victims-of-the-power-of-power/">किस

तरह सत्तामोह का शिकार बना दिए जाते हैं ज्यादातर आंदोलन !
उनके प्रयास से ही भारतीय ट्रेड यूनियन एक्ट बना. दामोदर वैली प्रॉजेक्ट की स्थापना की. हिन्दू कोड बिल में महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए संघर्ष किया. पैतृक संपत्ति में महिलाओं के समान अधिकार की वकालत की. संसद में बिल पास नहीं होने पर मंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया. उन्होंने राष्ट्र के प्रति समर्पण पर एक ही वाक्य में दिया था. उन्होंने कहा था कि वे पहले भी भारतीय हैं और अंत में भी भारतीय हैं. राष्ट्र व्यक्ति से महान है, व्यक्ति चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो वह राष्ट्र के समक्ष छोटा ही है. इसे भी पढ़ें-  कर्नाटक">https://lagatar.in/karnataka-voice-rising-in-bjp-on-communal-incidents-yeddyurappa-said-let-muslims-live-in-peace/">कर्नाटक

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