Himangshu karan
Baharagora: झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल की सीमाओं के त्रिवेणी संगम पर स्थित बहरागोड़ा प्रखंड, जिसे अपनी उर्वर भूमि के कारण ‘धान का कटोरा’ कहा जाता है, इन दिनों गंभीर संकट से जूझ रहा है.

यहां के किसान भारी परेशानियों का सामना कर रहे हैं और उनकी सालभर की मेहनत पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं.किसानों के सामने इस समय तीहरी मार पड़ी है. एक ओर बेमौसम बारिश फसलों को नुकसान पहुंचा रही है, वहीं दूसरी ओर जंगलों से निकलकर हाथियों का झुंड खेतों को रौंद रहा है.
इससे किसानों की फसलें बर्बाद हो रही हैं इसके अलावा बाजार में सक्रिय बिचौलियों के कारण किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है. बिचौलियों के जाल में फंसकर किसानों की मेहनत का सही लाभ नहीं मिल रहा, जिससे उनकी कमर टूटती जा रही है.

स्थानीय किसानों का कहना है कि यदि जल्द ही इस समस्या का समाधान नहीं किया गया, तो उनकी स्थिति और भी दयनीय हो सकती है. उन्होंने प्रशासन से मांग की है कि फसल नुकसान का मुआवजा दिया जाए, हाथियों के उत्पात पर नियंत्रण के लिए ठोस कदम उठाए जाएं और किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य सुनिश्चित कराया जाए.
बेमौसम बारिश 'सोना' उगलने वाली धरती पर पसरा मातम:
पिछले चार दिनों से हो रही आंधी और बारिश ने बहरागोड़ा के कृषि परिदृश्य को बदल कर रख दिया है. इस वर्ष मौसम की अनुकूलता के कारण धान की पैदावार उत्कृष्ट हुई थी, जिससे किसान गदगद थे.
लेकिन ऐन कटनी के वक्त कुदरत ने करवट बदली और खुशियों को मातम में बदल दिया.जिससे निचले इलाकों में स्थिति भयावह है. जिन किसानों ने धान काटकर खेतों में सूखने के लिए छोड़ा था, उनकी फसल अब पानी में तैर रही है.
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि 48 घंटे से अधिक पानी में डूबे रहने के कारण धान के दानों में अंकुरण (Sprouting) शुरू हो सकता है, जिससे पूरी फसल किसी काम की नहीं रहेगी.वहीं बारिश के साथ चली तेज हवाओं ने खड़ी फसल को'लॉजिंग' (जमीन पर गिरना) का शिकार बना दिया है. गिरे हुए धान की कटनी न केवल महंगी पड़ती है, बल्कि दाने भी मिट्टी में मिल जाते हैं.
गजराज का तांडव: रातों की नींद और खेतों की चैन गायब:
बारिश की मार कम थी कि हाथी प्रभावित क्षेत्रों में जंगली हाथियों ने मोर्चा खोल दिया है. हाथियों का झुंड रात के अंधेरे में खेतों में घुसकर पकी हुई फसल को न केवल खा रहा है, बल्कि उसे पैरों तले रौंदकर बर्बाद कर रहा है.जिसपर ग्रामीणों का कहना है कि हर साल कटनी के समय हाथियों का आगमन होता है, लेकिन वन विभाग और प्रशासन द्वारा किए गए सुरक्षा उपाय महज खानापूर्ति साबित होते हैं. किसान टॉर्च और मशाल के सहारे अपनी जान जोखिम में डालकर फसल बचाने को मजबूर हैं.
भंडारण की कमी और बिचौलियों की चांदी:-
बहरागोड़ा के किसानों की त्रासदी का तीसरा पहलू आर्थिक शोषण है. प्रखंड में आधुनिक और पर्याप्त कोल्ड स्टोरेज व अन्न भंडारों का घोर अभाव है. जिससे किसान भीगे हुए धान को ज्यादा दिन घर में नहीं रख सकते क्योंकि वह खराब हो जाएगा.
जबकि सरकारी लैम्पस (LAMPS) की प्रक्रिया इतनी जटिल और धीमी है कि किसानों को मजबूरन गांव में घूमने वाले बिचौलियों को उचित मूल्य से भी कम पर धान बेचना पड़ रहा है.वहीं बिचौलिए किसानों की इस मजबूरी का फायदा उठा रहे हैं और भारी मेहनत से उपजाई गई फसल को कौड़ियों के भाव खरीद रहे हैं.
इन परिघटनाओं के कारण किसानों की कमर पूरी तरह टूट चुकी है. अब उनकी नजरें केवल सरकार और जनप्रतिनिधियों पर टिकी हुई हैं. यदि समय रहते मुआवजे और उचित विपणन (Marketing) तथा भंडारण की व्यवस्था नहीं की गई, तो 'धान का कटोरा' कहे जाने वाले इस क्षेत्र से किसानों का पलायन और कृषि से मोहभंग होना एक दिन निश्चित है.
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