
बैजनाथ मिश्र
भारत सरकार ने वंदे मातरम् को लेकर एक नया प्रोटोकोल यानी दिशा निर्देश जारी किया है. यह दिशा निर्देश इस अमर गीत के डेढ़ सौ साल पूरा होने के उपलक्ष्य में जारी किया गया है. बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने 1876 में यह गीत लिखा था. बाद में यह बंकिमचंद्र के प्रसिद्ध उपान्यास आनंद मठ का हिस्सा बन गया. यह उपन्यास संन्यासी विद्रोह पर केंद्रित है. यह गीत पहली बार सार्वजनिक रुप से कांग्रेस के कोलकाता अधिवेशन में 1896 में गाया गया था. तब इसे स्वरबद्ध किया था रवींद्रनाथ टैगर ने.
यह पूरा गीत छह छंदों में पिरोया गया है. 1937 में कांग्रेस के ही अधिवेशन में इसके चार छंदों को हटा दिया गया था, वह भी जिन्ना और उनके समर्थकों के दबाव में. तर्क यह दिया गया कि इस गीत के तीसरे से छठे छंद में मूर्तिपूजा की गयी है जो इस्लामवादियों के लिए हराम है.
कल्पना कीजिए जो गीत 1896 से 1937 तक कांग्रेस के अधिवेशनों, अन्य कार्यक्रमों में मोसलसल पूरा का पूरा गाया जाता रहा, वह जिन्ना के उभार के साथ ही सांप्रदायिक हो गया. इस पूरे गीत का प्रत्येक शब्द राष्ट्र के प्रति समर्पण, सम्मान और गर्व से भरा हुआ है. स्वाधीनता संग्राम के सेनानियों के लिए यह राष्ट्र मंत्र बन गया था. यह गीत इतना स्फूर्तिदायी और लोकप्रिय हो चुका था कि ब्रिटिश हुकूमत ने इसके उद्घोष पर पाबंदी लगा दी थी. लेकिन आजादी के मतवाले इसे गाते रहे, जेलों में ठूंसे जाते रहे और फांसी के फंदे को चूमते रहे.
बहरहाल, जिन्नावादियों के विरोध के बाद कांग्रेस ने पुनर्विचार के लिए एक समिति बना दी. उसमें टैगोर और नेताजी सुभाषचंद्र बोस भी थे. समिति की रिपोर्ट के आधार पर वंदे मातरम् के चार छंदों को हटा दिया गया और ऊपर के दो छंदों के साथ गाया जाने लगा. लेकिन यहीं से भारत के विभाजन की नींव भी पड़ गयी और अंततः जिन्ना-नेहरू-माउंटबेटन की तिकड़ी ने देश का बंटवारा कर दिया. यदि उस समय जिन्नावादियों को हतोत्साहित कर दिया गया होता को शायद भारत अखंड रह जाता.
सरकार ने नये दिशा निर्देश के माध्यम से अब वंदे मातरम् के सभी छह छंदों का गायन अनिवार्य कर दिया है. इससे भारत में रह गयी जिन्नावादी जमातें फिर विफर गयी हैं. उनका विफरना अकारण है. प्रोटोकॉल में जो कुछ कहा गया है, उस पर एतराज मजहबी नहीं, सियासी है. इस पर बवाली कव्वाली सिर्फ राजनीतिक इस्लाम के नुमाइंदे, रसूखदार और कारिंदे गा रहे हैं, वह भी बाकायदा मजहबी एदारे में. मकसद यह है कि सेक्युलरिज्म महफूज रहे. सेक्युलरिज्म की सलामती के लिए अगर मुल्क की थोड़ी बहुत तौहीन हो जाय या मजहब की बुनियाद पर ही सवाल उठ जाय तब भी कोई हर्ज नहीं है. इसी तिकड़म ने देश बांटा था. इस बार भी कव्वाली की ताली इशारे दे रही है. लेकिन वो साल दूसरा था, ये साल दूसरा है.
देश के मुसलमानों के एक तबके को सरकार से खास शिकायत नहीं है. देश का मन-मिजाज भी बदला हुआ है. मजहब और जाति की चाशनी में डुबोये खंजर भोथर होने लगे हैं. कोई माने, न माने, राष्ट्र सर्वोपरि का भाव चटक और गाढ़ा हो रहा है. देश कुछ कर गुजरने के लिए तैयार हो रहा है. इस तैयारी को ऊर्जा मिलेगी देशभक्ति के बीज मंत्रों से. वंदे मातरम् उन्हीं में से एक है. फिर सरकार ने यह तो कहा नहीं है कि यह गीत गाना ही पड़ेगा.
अपने दिशा निर्देश के जरिए सरकार ने सिर्फ इतनी इल्तजा की है कि जब वंदे मातरम् पूरा गाया जा रहा हो या इसकी धुन बजायी जा रही हो तो बराय मेहरबानी सावधान की मुद्रा में खड़े हो जायें. यह भी छूट शायद है कि आप अदब से खड़ा हों या बेअदब से, मर्जी आपकी है. क्योंकि बेअदबी के लिए दंड का कोई प्रावधान नहीं है. अलबत्ता सरकारी कर्मचारी के लिए यह बेअदबी सेवा नियमावली का उल्लंघन हो सकता है.
देश के किसी भी गैर राजनीतिक समूह ने सरकार के प्रोटोकॉल का विरोध नहीं किया है. कई मुस्लिम स्कॉलर इसका समर्थन कर रहे हैं. इनमें से कुछ तो इस गीत में वर्णित दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती को भारत माता की शक्तियां तक बोलने लगे हैं. यानी विघ्नसंतोषी गिरोह की धौंकनी कुछ जला-पका नहीं पा रही है.
आनंद मठ एक अमूल्य साहित्यिक निधि है. राष्ट्रभक्ति, बलिदान और समर्पण के त्रिकुंड की अग्नि से आप्लावित. कांग्रेस के पुरखों के लिए वंदे मातरम् प्रेरणापुंज था. थोड़ा बहुत अब भी होगा, क्योंकि दो छंद तो ये भी गाते हैं. वह चाहती तो वंदे मातरम् में वर्णित सभी संबोधनों को रूपक बताकर अपनी मंशा साफ कर सकती थी. लेकिन वह शायद बताना यह चाहती है कि यह कांग्रेस मोतीलाल नेहरू वाली नहीं है, यह राहुल की कांग्रेस है, जिसे 1937 से पहले की कांग्रेस से कुछ लेना देना नहीं है. यहां भी वही हाल है, यानी वो साल दूसरा था ये साल दूसरा है.
तब कांग्रेस ही कांग्रेस थी. भारत में कम्युनिस्ट भी कायदे से 1925 से ही तेज हुए. इसी समय आरएसएस भी प्रभाव में आया. वर्षों तक कांग्रेस राष्ट्रवाद की धुरी बनी रही. लेकिन जैसे-जैसे उसके पुण्य क्षीण होते गये, वह जुगाड़ की राजनीति पर उतर आयी. कांग्रेस के लचर राष्ट्रवाद का मुखौटा उतर रहा है. अब राष्ट्रवाद की धुरी भाजपा बन गयी है और वह तब तक रहेगी जब तक कांग्रेस अपनी जड़ों की ओर नहीं लौटती.
डीएमके, टीएमसी, सपा वगैरह ने वंदे मातरम के गायन में नये बदलाव का विरोध किया है. इसकी वजह है कट्टरपंथियों का वोट. ध्रुवीकरण के इस प्रयास के विरुद्ध प्रति ध्रुवीकरण की संभावना से ये अनजान हैं. कांग्रेस चाहती तो वह नये प्रोटोकॉल का समर्थन कर भाजपा की राह में अड़ंगे डाल सकती थी, लेकिन वह भाजपा विरोध में राष्ट्र विरोध से भी संकोच नहीं कर रही है.
एक आरोप यह लगाया जा रहा है कि बंगाल चुनाव के मद्देनजर भाजपा ने तुरुप चाल चली है. इन लोगों को लगता है कि बंकिमचंद्र की कृति को महत्व देकर भाजपा बंगाल के भद्रलोक को रिझाने की कोशिश कर रही है. संभव है यह अनुमान सही हो. लेकिन यथार्थ यह है कि बंगाल में अब टैगोर, महर्षि अरविंद, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, नजरूल इस्लाम और बंकिमचंद्र आदि के नाम पर चुनाव नहीं जीते जा सकते. जब गांधी जी का पोता रायबरेली में नये गांधी खानदान के वारिस से चुनाव हार जाता है तब बंकिमचंद्र का नाम बंगाल में कितना वोट दिला पायेगा.
अब तक वहां जितनी भी सरकारें बनीं हैं चाहे कांग्रेसी हों, वामपंथी हों या टीएमसी की, किसी को भी उपर्युक्त विभूतियों के आदर्शों से कुछ लेना-देना नहीं रहा है. भाजपा भी अगर सोचती है कि वह केवल वंदे मातरम् पर जारी प्रोटोकॉल के बूते बंगाल का किला फतह कर लेगी, तो वह भ्रम में है. हां, इससे एक माहौल बनेगा जिसका लाभ बंगाल से अधिक दूसरे राज्यों में मिल सकता है.
सरकार ने प्रोटोकॉल जारी करते समय यह सावधानी बरती है कि कहीं इसका उल्लंघन न हो जाय. इसलिए सिनेमा हॉल या थियेटर में वंदे मातरम् की धुन पर खड़े होने की अनिवार्यता नहीं हैं. लेकिन सरकारी शिक्षण संस्थानों में इसका गायन भी अनिवार्य होगा और खड़ा होना भी पड़ेगा. संसद और विधानसभाओं में तो यह बजेगा ही. सरकार ने आम नागरिकों को इस गीत पर खड़ा होने के बारे में नैतिक कर्तव्य कह कर हाथ झाड़ लिया है. हमारे देश, समाज में नैतिक कर्तव्यों की धज्जियां हम रोज उड़ाते हैं. जब हेलमेट चेकिंग के लिए पुलिस लगानी पड़ती है तब किसी नैतिक कर्तव्य का अनुपालन कैसे होगा? ऐसा लगता है कि सरकार ने किसी विवाद से बचने के लिए ही दंड का प्रावधान नहीं किया है. इसके बावजूद विरोध के स्वर उठ रहे हैं तो कहना पड़ेगा कि विरोध महज विरोध के लिए हो रहा है, न वाजिब कारण है, ना पारिस्थितियों का अनुरोध.
जब सैन्य और पुलिस परेडों तक को इस नियम से बाहर रखा गया है तब भी विरोध हो रहा हो तो फिर अफसोस ही किया जा सकता है. जो वंदे मातरम् के दो छंद भी नहीं गाते थे, वे भला छह छंद क्यों गाने लगेंगे? ये भारतीय सिर्फ इसलिए हैं, क्योंकि ये भारत में रहते हैं, इनके अंदर भारत नहीं है. यही हमारा दुर्भाग्य है, फिर भी जिनके दिल में भारत है उन्हें वंदे मातरम् से न पहले अलर्जी थी, न अब है.
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