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ब्रांड मोदी के अपराजेय होने के दावे को बंगाल ने निर्णायक चुनौती दी है

Faisal Anurag
ब्रांड मोदी की अपराजेयता का दंभ और मिथ दोनों ही बंगाल में जिस तरह भरभरा कर गिरा है, उसकी गूंज 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए चेतावनी भरा दस्तक है. वैसे ब्रांड मोदी का मिथ तो बार-बार टूटा है. लेकिन धारणा बनाने के खेल में नजरअंदाज किया जाता रहा है. विश्व विख्यात विचारक नॉम चोमस्की इसे मैन्युफैक्चरिंग कसेंट की संज्ञा देते हैं. चुनावों के अध्येता भी वह तस्वीर पेश नहीं कर पाते हैं, जिसने ब्रांड मोदी को बार-बार कठघड़े में खड़ा किया है.2014 में सत्ता आने के बाद ब्रांड मोदी को दिल्ली ने चुनौती दी. बिहार में 2015 में मोदी की हार हुई

. इसके बाद तो मध्यप्रदेश, राजस्थान, दिल्ली, पंजाब, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, झारखंड, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक तमिलनाडु, केरल, पश्चिम बंगाल में वे चुनाव हारे. 2020 में बिहार और 2017 में गुजरात में बहुत ही मुश्किल से जीत पाये थे. लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव ने उनके ब्रांड की चमक को बढ़ा दिया, लेकिन इसे विस्मृत कर दिया गया कि इस जीत के पीछे अंधराष्ट्रवाद,सांप्रदायिकता और नफरत का गठजोड़ है.
जब भी चुनावों का विश्लेषण किया जाना चाहिए तो इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए कि राज्यों के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी से कहीं ज्यादा नरेंद्र मोदी खुद को दावं पर लगा देते हैं. इसलिए जीत का सेहरा यदि ब्रांड मोदी की चमक बढ़ाता है तो हार भी की जिम्मेवारी भी इसी ब्रांड की नाकामयाबी है.

वैसे तर्क दिया जा सकता है कि बंगाल में भारतीय जनता पार्टी ने 75 सीटें जीती हैं तो इसका सेहरा भी ब्रांड मोदी को ही जाता है. इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता है. लेकिन राजनीति में हर बार इस तरह के तर्क कारगर नहीं होते हैं. खासकर उस स्थिति में जब दावं बड़ा हो. इसलिए बंगाल के चुनाव परिणाम को केवल बंगाली अस्मिता की जीत भर में सीमित नहीं किया जा सकता है. यह साफ तौर पर उस फासिस्ट सांप्रदायिक राजनीति को खारिज करने की दिशा में एक निर्णायक कदम है. बंगाल ने ममता बनर्जी को जितना पसंद नहीं किया है, उससे कहीं ज्यादा नरेंद्र मोदी अमित शाह को नकारा है.

इसलिए बंगाल के चुनावों का असर देश में तमाम विपक्षी दलों पर भी दिख रहा है. जिनके भीतर एक अकुलाहट है और जिसे ऐसे नेतृत्व की भी तलाश है जो फ्रंट से मुकाबला करने का साहस दिखाता है. ममता बनर्जी नंदीग्राम में हारी या हरा दी गयीं इस पर चर्चा होती रहेगी लेकिन ममाता बनर्जी इस समय एक ऐसे नेता के रूप में उभरी हैं जो न केवल उर्जावान हैं, बल्कि उसके इरादे ठोस हैं और निर्भिक हैं. केंद्र की एजेंसियों ने पिछले सात सालों में ममता बनर्जी को घेरे में लेने की हर मुमकिन कोशिश की है और यह सिलसिला थमने नहीं जा रहा है, इन हालातों में भी ममता बनर्जी ने बार-बार यह दिखाया है राजनीतिक प्रतिस्पर्धी के प्रति उनकी कठोरता कम नहीं होती. इसका अहसास नरेंद्र मोदी और अमित शाह को भी है. इसलिए बंगाल के चुनाव परिणाम के संदेशों को आइटी सेल दिग्भ्रमित करने के अपने अभियान में सक्रिय हो गया है.

बंगाल ने इस धारणा को तोड़ दिया है कि सेकुलरवाद के लिए लड़ने के दौर का अवसान हो गया है. बंगाल का चुनाव परिणाम बताता है कि उसने सेकुलर राजनीति के लिए मैनडेट दिया है. भाजपा के ही एक नेता और सुभाष चंद्र बोस के भतीजा चंद्र कुमार बोस ने चुनाव नतीजों के बाद कहा है कि यह दौर सामाजिक धार्मिक विभाजन के सहारे जीत के रास्ते नहीं बना सकता है. भाजपा को ऐसे प्रयासों से बचना चाहिए, जिससे बंगाल जैसे राज्यों की साझा विरासत प्रभातिव होती हो.
भाजपा ने बंगाल में जिस तरह के ध्रुवीकरण के प्रयास किए उससे उसे 75 सीटें हासिल हो गयी. लेकिन इसे बंगाल के नागरिकों के बड़े समूह ने खारिज कर दिया. ममता बनर्जी की पार्टी की जीत एक ऐसे समावेशी पैटर्न के कारण संभव हुआ, जिसमें धार्मिक तौर पर नफरत के तत्व को अच्छा नहीं माना जाता है. चूंकि बंगाल में भाजपा ने बड़ा दांव लगा रखा था, इसलिए उसके असर को भी राष्ट्रव्यापी नजरिए से ही देख समझा जाना चाहिए.

बंगाल के बड़े फिल्म अभिनेता रिद्धि सेन ने ठीक ही कहा है बंगाल के समाने यह चुनौती थी कि वह किस तरह देश को विचारों को ट्रायल पर रखने के सरकार के इरादे का समाना करता है और देश में एकाधिकारवाद की प्रवृति को चुनौती देता है. बंगाल ने स्पष्ट संदेश दिया है, हालांकि उसे अभी और भी गंभीर चुनौतियों का पहाड़ है.

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