
बैजनाथ मिश्र
अप्रैल में संपन्न हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणाम आप सभी देख-पढ़ और आत्मसात कर चुके हैं. असम में जहां भाजपा तीसरी बार सरकार बना रही है, वहीं पुडुचेरी में एनडीए की फिर सरकार बन रही है तो तमिलनाडु में दो साल पहले मैटिनी मैन थलपति विजय की पार्टी टीवीके ने राज्य में गहरे तक समायी द्रविड़ राजनीति की जड़ें हिला दी है. बंगाल में भाजपा ने ऐसी विजय हासिल की है कि विपक्षी खेमे में हाहाकार मच गया है. यहां टीएमसी इतनी बुरी तरह हारी है कि इसकी मुखिया ममता बनर्जी ने मानो सुध-बुध खो दी है.
इन चुनाव परिणामों पर गौर करें तो असम, केरलम और बंगाल में जमकर ध्रुवीकरण हुआ है, वह भी धार्मिक आधार पर. यहां तथाकथित सेक्युलरिज्म का बैंड बज गया है या वह उघार हो गया है. असम में विपक्ष में बैठने वाले चौबिस विधायकों में से बाईस अल्पसंख्यक हैं. ये सभी निचले असम से जीतकर आये हैं. लेकिन ऊपरी असम में भाजपा ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर लगभग सभी सीटें बटोर ली है. यही कारण रहा कि कांग्रेस के प्रायोजित मुख्यमंत्री गौरव गोगोई तक भारी अंतर से हार गये हैं.
संक्षेप में कहें तो व्यापक हिन्दू समाज ने एकतरफा एनडीए को वोट दिया है जबकि अल्पसंख्यकों ने कांग्रेस गंठबंधन और एआईयूडीएफ को एकमुश्त वोट दिया है. परिणाम यह हुआ है कि 126 सदस्यों वाली विधानसभा में एनडीए ने 102 सीटें झटक ली है. कांग्रेस के 19 विधायकों में से 18 अल्पसंख्यक समुदाय के हैं.
केरलम में वैसे तो हर पांच साल में सत्ता की अदला-बदली होती है. पिछली बार एलडीएफ ने अपनी जीत दोहरा दी थी. लेकिन भाजपा की बढ़ती सक्रियता ने अल्पसंख्यकों को एकजुट कर दिया. उन्होंने यूडीएफ (कांग्रेसनीत) की झोली भर दी. यहां मुस्लिम लीग ने वामपंथी गंठबंधन (एलडीएफ) के सेक्युलरिज्म का भूत उतार दिया है. उसने यूडीएफ प्रत्याशियों की जीत में जान लगा दी और खुद तीस सीटें झटक ली.
केरलम में मुस्लिम और ईसाई मतदाताओं की संख्या करीब 45 फीसदी है. शेष पचपन फीसदी में नायर समाज का प्रभुत्व है. कांग्रेस के पास इस समाज के तीन बड़े नेता- शशि थरूर, केसी वेणुगोपाल और रमेथ चेनिथला थे ही, बाकी हिन्दू वोट भाजपा और एलडीएफ में बंट गये. परिणाम यह हुआ कि यूडीएफ ने करीब 46 फीसदी वोटों के साथ 140 सीटों वाली विधानसभा की 102 सीटें ले ली. एलडीएफ को करीब 30 फीसदी वोटों और 35 सीटों से संतोष करना पड़ा. भाजपा को सीटें तो सिर्फ तीन ही मिलीं, लेकिन उसका वोट 11 फीसदी बढ़कर 28 फीसदी के आसपास पहुंच गया. यानी एलडीएफ और भाजपा के वोटरों में महज दो प्रतिशत का ही अंतर रह गया. यदि संक्षेप में कहें तो भाजपा के जितने फीसदी वोट बढ़े, एलडीएफ के उतने ही फीसदी घट गये और वामपंथ का यह आखिरी किला भी ढ़ह गया.
जहां तक बंगाल की बात है, यहां का ध्रुवीकरण भी साफ-साफ दिखाई देता है. इसे ऐसे समझिए. कांग्रेस के दोनों विधायक अल्पसंख्यक हैं. माकपा का इकलौता विधायक भी अल्पसंख्यक है. बाबरी मस्जिदवाले हुमायूं कबीर भी दो सीटों से जीते हैं. फुरफुरा शरीफ वाली पार्टी को भी एक सीट मिली है और टीएमसी के 80 विधायकों में से तीस-पैंतीस अल्पसंख्यक ही हैं. ऐसा क्यों हुआ, इसे समझने के लिए बंग्लादेश में दो साल पहले से घट रही घटनाओं पर गौर करना होगा. जिस समय वहां हिन्दू मारे जा रहे थे, मंदिर जलाये जा रहे थे, महिलाओं से रेप हो रहा था, उस समय देश की सेक्युलर जमात मौन थी. उसके बाद वहां हुए संसदीय चुनाव में जमायत-ए-इस्लामी ने बंगाल के सीमावर्ती इलाकों की करीब सभी सीटें जीत लीं. इससे सटे बंगाल की इलाकाई सीटों के मतदाताओं को समझाने में भाजपा कामयाब रही कि यदि टीएमसी आयी तो ये जमाती इधर आ जायेंगे और तब आपका धन-धर्म कुछ नहीं बचेगा. इसकी तस्दीक संदेशखाली की महिलाओं के उत्पीड़न और जमीन हड़पने की घटनाएं कर रही थी.
इस चुनाव में भाजपा की जीती सीटों पर ध्यान दें तो उसने बंग्लादेश से सटी सीटों पर किसी को हाथ नहीं रखने दिया है. भाजपा अमूमन शहरों से गांव की ओर बढ़ती है, लेकिन बंगाल में वह गांव से शहर की ओर बढ़ी है. टीएमसी इस गलतफहमी में थी कि दक्षिण बंगाल का उसका किला अभेद्य ही रहेगा, लेकिन आरजी कर की हृदय विदारक घटना ने भद्रलोक को खासतौर से शहरी महिलाओं को भी झकझोर दिया था. उसे लगने लगा था कि मालदा, मुर्शीदाबाद, 24 परगना वगैरह की लपटें उसके दरवाजे तक पहुंच गयी हैं. भाजपा ने आरजी कर पीड़िता की मां रत्ना देवनाथ को प्रत्याशी बनाकर ऐसा माहौल बनाया कि तृणमूल शहरों में ही स्वाहा हो गयी.
ममता बनर्जी खुद अपनी भवानीपुर सीट हार गयीं. सयानी बन रही सयोनी घोष अपना जादबपुर का किला तक नहीं बचा सकी. महुआ का नशा उतर गया. ध्रुवीकरण कितना तेज था, इसका अंदाज मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के बयान से समझा जा सकता है. एक पत्रकार ने सुवेंदु से सवाल किया कि आप अपने घर नंदीग्राम में सिर्फ दस हजार से जीते और भवानीपुर में पंद्रह हजार से, ऐसा क्यों? जवाब में सुवेंदु ने कहा कि नंदीग्राम में 65 हजार अल्पसंख्यक मतदाता थे और भवानीपुर में मात्र 25 हजार. ध्रुवीकरण ऐसा हुआ कि टीएमसी के अजेय समझे जाने वाले गढ़ भी ध्वस्त हो गये. टीएमसी को जनता से अधिक भरोसा अपने पालतू गुंडों और हफ्ता वसूली गैंग पर था. यह सब उन्होंने माकपा से ही हथियाया था. लेकिन निर्वाचन आयोग ने ऐसी व्यवस्था कर दी कि पार्टी बनी पुलिस और गुंडे मवाली सब सहम गये. सुरक्षा का भरोसा मिलने के बाद जो जन ज्वार उभरा उसमें टीएमसी का अहंकार डूब गया. 1967 के बाद यह पहला चुनाव हुआ जब एक कतरा भी खून नहीं बहा. न बूथ लूटे गये, न गोली-बम चले. कोई चाहे तो भारी बंदोबस्त के लिए निर्वाचन आयोग की आलोचना कर सकता है, लेकिन ऐसे लोगों से यह पूछना जरूरी है कि चुनावी लोकतंत्र के मायने क्या हैं? एक सवाल और उठ रहा है. वह है एसआईआर का. लेकिन हटाये गये नामों में से साठ लाख के लगभग तो हिन्दू ही थे और यह भी नहीं भूलना चाहिए कि अल्पसंख्यकों के प्रभाव वाले जिलों में भी ऐसा ध्रुवीकरण हुआ है कि यहां की पचास फीसदी सीटें भाजपा निकाल ले गयी है. सारांश यह कि भ्रष्टाचार, अपराध, बेरोजगारी, महिला सुरक्षा, सरकारी कर्मचारियों की नाराजगी और ऊपर से प्रचंड ध्रुवीकरण ने भाजपा को ऐतिहासिक सफलता दिला दी है.
बंगाल की परंपरा रही है कि जिसे वह निपटा देता है, उसे दोबारा सर माथे नहीं बैठाता है. यानी यदि भाजपा कोई बड़ी गलती नहीं करेगी तो जनता उसे लंबे समय तक अपनाये रखेगी. जब कांग्रेस गयी तो वामपंथी साढ़े तीन दशक तक जमे रहे. उनसे आजिज जनता ने टीएमसी को मौका दिया तो वो भी डेढ़ दशक तक सत्तासीन रही. अब भाजपा को मौका मिला है और जिम्मेदारी भी. यदि वह ठीक चली तो उसे हटाने की कुव्वत वर्तमान दलों में नहीं है.
अब लौटते हैं तमिलनाडु पर. वहां मुख्यमंत्री एमके स्टालिन तो खुद हार ही गये हैं, उनका द्रमुक गंठबंधन अपनी 91 सीटें हार गया है तो अन्नाद्रमुक गंठबंधन ने 25 सीटें गंवाई है. विजय ने 107 सीटें कमाई है. उन्होंने दोनों परंपरागत गंठबंधनों को धूल चटाई है. तमिलनाडु में करुणानिधि, एमजी रामचंद्रन और जयललिता जैसी फिल्मी हस्तियां राजनीति में झंडा गाड़ चुकी हैं. अब विजय की बारी है. लेकिन उन्हें बहुमत नहीं मिला है. सरकार बनाने के लिए चाहिए कम से कम 118 सीटें, हैं केवल 107. कांग्रेस के पांच विधायकों का समर्थन मिल गया है. तब भी जरूरी संख्या का जुगाड़ नहीं हो रहा था. पांच दलों के समर्थन से विजय ने बहुमत का जुगाड़ कर लिया है. उनकी शपथ ग्रहण भी पूरा हो गया है. लेकिन द्रमुक के साथ चुनाव लड़े वीसीके और मुस्लिम लीग ने समर्थन पत्र सौंपते स्पष्ट कर दिया है कि वे सरकार को बाहर से ही समर्थन देंगे और द्रमुक गंठबंधन में ही रहेंगे. वामपंथी विधायकों ने ऐसी घोषणा तो नहीं की है, लेकिन वो भी द्रमुक की डोर छोड़ने को तैयार नहीं हैं.
बाहरी समर्थन से चलने वाली जुगाड़ू सरकारों का हश्र हमने देखा है. सरकार के मुखिया का ज्यादा वक्त इन विधायकों को मनाने-पटाये रखने में ही चला जाता है. इसलिए इस सरकार के दीर्घायु होने की कामना तो की जा सकती है, परंतु इसकी गारंटी नहीं दी जा सकती. हालांकि संभव है अन्नाद्रमुक के विधायकों का एक समूह शक्ति परीक्षण के समय सरकार का प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष सहयोग कर दे. बहरहाल, तमिलनाडु में करीब साठ साल बाद गैर द्रविड़ दल का मुख्यमंत्री बना है. यह राज्य में नई राजनीति का प्रस्थान बिंदु है.
Leave a Comment