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मोदी को बाइडन की ‘मेड इन इंडिया’ गांधी सौगात !

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Shrawan Garg इस बात को ज़्यादा तवज्जो नहीं दी जानी चाहिए कि नरेंद्र मोदी को नये अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने मुंह दिखाई  की रस्म अदायगी में ही महात्मा गांधी की अहिंसा और सहिष्णुता का महत्व समझाने की कोशिश कर दी और भारतीय मूल की मां की कोख से जन्मी उस देश की पहली महिला और अश्वेत उपराष्ट्रपति कमला हैरिस ने भी उम्र में उनसे बड़े हमारे प्रधानमंत्री को खड़े-खड़े लोकतंत्र की अहमियत समझा दी. जो बातें बाइडन और हैरिस ने कहीं उनसे कहीं अधिक और काफ़ी साफ़ लफ़्ज़ों में मोदी जी के ‘माय फ़्रेंड बराक‘ भारत की ज़मीन पर पहले ही बोल चुके थे. वे तो नयी दिल्ली से स्वदेश लौटने के ठीक पहले भारत में धार्मिक स्वतंत्रता का मुद्दा भी उठा गये थे. कम से कम बाइडन और हैरिस ने इस बाबत कोई भी ज़िक्र नहीं किया.

अहिंसक डांडी मार्च  हिंसक डंडा मार्च  में बदल गया है 

भारत का राजनीतिक नेतृत्व महात्मा गांधी और उनके विचारों से काफ़ी आगे बढ़ चुका है. उसके लिए अब ज़रूरत सिर्फ़ गांधी के आश्रमों (सेवाग्राम और साबरमती) के आधुनिकीकरण या उन्हें भी ‘सेंट्रल विस्टा’ जैसा ही कुछ बनाने की बची है. सत्ता की राजनीति ने गांधी के ऐतिहासिक अहिंसक ‘डांडी मार्च‘ को हिंसक ‘डंडा मार्च’ में बदल दिया है. अमेरिका और योरप में स्थित तमाम अंतर्राष्ट्रीय संस्थान मानवाधिकार, धार्मिक सहिष्णुता,  नागरिक-स्वतंत्रता, मीडिया की आज़ादी और लोकतंत्र आदि विषयों को लेकर दुनिया भर के देशों की जो प्रावीण्य सूची (मेरिट लिस्ट ) हर साल जारी करते हैं उनमें भारत के प्राप्तांक (नम्बर) लगातार कम होते जा रहे हैं पर हमारे नेतृत्व को महात्मा गांधी की क़ाबिलियत से ज़्यादा भरोसा अपने प्रतिबद्ध मतदाताओं के विवेक पर है.

गोडसे की मूर्ति की धूमधाम से प्राण-प्रतिष्ठा की जाती है

इसीलिए जब ग्वालियर में गोडसे की मूर्ति की धूम-धाम से प्राण-प्रतिष्ठा की जाती है या गांधी की पुण्यतिथि पर अलीगढ़ में राष्ट्रपिता के पुतले पर सार्वजनिक रूप से गोलियां चलाकर तीस जनवरी 1948 की घटना का गर्व के साथ मंचन किया जाता है तब कहीं कोई छटपटाहट नहीं नज़र आती. दूसरी ओर, जब अपने ऊपर गोरे सवर्णों द्वारा किये जा रहे अत्याचारों के ख़िलाफ़ अमेरिका के अश्वेत ‘ब्लैक लाइव्ज़ मैटर’ आंदोलन चलाते हैं और उस दौरान वाशिंगटन स्थित गांधी जी की प्रतिमा को थोड़ी क्षति पहुंच जाती है तो भारतीय अधिकारियों  द्वारा औपचारिक तौर पर विरोध दर्ज करवा दिया जाता है और अज्ञात अपराधियों की पहचान के लिए अमेरिका में जांच बैठ जाती है.  हमारे यहां गांधी की लगातार की जाने वाली हत्या के ‘ज्ञात’ अपराधी भी खुले आम घूमते रहते हैं.

अमेरिका में भारतीय मूल के नागरिकों की संख्या  42  लाख है

अमेरिका में इस समय निवास कर रहे भारतीय मूल के नागरिकों की संख्या कोई बयालीस लाख है.  चीनी नागरिकों के बाद यह सबसे बड़ी संख्या बताई जाती है. इनमें अधिकांश मध्यम वर्ग (वहां के लखपति) या उच्च मध्यम वर्ग (वहां के करोड़पति) हैं जो योग्यता और मेहनत के दम पर गोरों के बीच अपनी जगह बना पाये हैं. भारतीय या एशियाई मूल के नागरिक ग़ाहे-बग़ाहे अपने होने वाले ऊपर नस्ली हमले भी चुपचाप सहते रहते हैं और इनमें लूट और हत्याएं भी शामिल होती हैं. ये भारतीय वहां के मानवाधिकार आंदोलनों जैसे ब्लैक लाइव्ज़ मैटर आदि में भी कभी भाग लेते नज़र नहीं आते और न ही किसी से किसी तरह का अहिंसक या गांधीवादी पंगा ही लेते हैं. हां,  छह जनवरी को जब कैपिटल हिल पर ट्रम्प-समर्थक सवर्णों ने हमला किया था तब एक-दो भारतीय मूल के नागरिकों के चेहरे ज़रूर कथित रूप से वीडियो क्लिपिंस में नज़र आ गये थे.

रिपब्लिकन पार्टी के नेता अश्वेतों  के प्रति बैर भाव रखते हैं 

अमेरिका में रहने वाले (या योरप,हांगकांग,थाईलैंड, म्यांमार आदि में भी) भारतीयों की महत्वाकांक्षाएं और संबद्धताएं वहां के सवर्णों के साथ रहती हैं और उन्हें डॉनल्ड ट्रम्प जैसे राष्ट्रपति ही ज़्यादा पसंद आते हैं. मतलब कि जैसे ट्रम्प या उनकी रिपब्लिकन पार्टी के नेता वहां के अश्वेतों ,दलितों और मुसलमानों के प्रति बैर भाव रखते हैं वैसे ही इन भारतीय मूल के नागरिकों में अधिकांश को बाइडन की यह नीति (यहां गांधी के ट्रस्टीशिप के सिद्धांत को ढूंढ़ सकते हैं) कि उनकी सम्पन्नता को भारी करों के रूप में वसूल करके अश्वेतों या आर्थिक-सामाजिक रूप से पिछड़ों को बराबरी पर लाया जाये, कतई मंज़ूर नहीं है.  (चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग इस समय अपने देश में व्यक्तिगत सम्पन्नता को बराबरी के स्तर पर लाने का ही काम कर रहे हैं.

गांधी की जरूरत इस समय कहीं नहीं है

संक्षेप में कहा जा सकता है कि दक्षिण अफ़्रीका की 7 जून 1893 की घटना की तरह आज की तारीख़ में कोई सवर्ण किसी मोहनदास करमचंद गांधी को अगर ट्रेन से उतारकर प्लेटफ़ार्म पर पटक दे तो कितने लोग उसकी मदद के लिए आगे आयेंगे, कहा नहीं जा सकता.  अमेरिका में रहने वाले भारतीयों ने शायद इस बात को ज़्यादा पसंद नहीं किया होगा कि व्हाइट हाउस में मोदी की अगवानी उतनी गर्मजोशी या धूमधाम से नहीं हुई जैसी कि ट्रम्प के कार्यकाल में हुई थी. और यह भी कि यह अवसर ‘हमारे’ प्रधानमंत्री को गांधी की ज़रूरत को समझाने का भी नहीं था.  हक़ीक़त यह है कि गांधी की ज़रूरत इस समय कहीं नहीं है, न भारत में और न भारत के बाहर. गांधी की प्रासंगिकता चाहे आज पहले के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा बढ़ गयी हो.

प्रधानमंत्री देशवासियों के लिए क्या भेंट लेकर लौटे हैं

महात्मा गांधी का विचार और उनकी ज़रूरत वर्तमान की साम्प्रदायिक और विभाजनकारी राजनीति के लिए मशीनी सूत से बने खादी के मास्क की तरह हो गया है जिसके नीचे सहिष्णुता ,अहिंसा और लोकतंत्र का मज़ाक़ उड़ाने वाले क्रूर और हिंसक चेहरे छुपे हुए हैं.  ये चेहरे देश में गांधी विचार की किसी लहर को भी एक महामारी के संकट की तरह ही देखते हैं और अपने अनुयायियों को उसके प्रति लगातार आगाह करते रहते हैं.  इसे प्रधानमंत्री की विनम्रता ही कहा जायेगा कि उन्होंने बाइडन और हैरिस के कहे को शांत भाव से ग्रहण कर लिया और मेज़बान का अपने घर में विशेषाधिकार का सम्मान करते हुए यह जवाब नहीं दिया कि भारत में गांधी की सहिष्णुता और लोकतंत्र के होने, न होने की ज़रूरत को अमेरिकी राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति नहीं तय कर सकते. बहुत सारे लोग यह जानना चाहते हैं कि गांधी जयंती के ठीक पहले समाप्त हुई अपनी पांच-दिनी वाशिंगटन और न्यूयॉर्क यात्रा से वापसी पर प्रधानमंत्री देशवासियों के लिए क्या भेंट लेकर लौटे हैं ? इन सब लोगों को यही दिलासा दिया जा सकता है कि वे राष्ट्रपति बाइडन द्वारा भेंट में दिये गये ‘मेड इन इंडिया ‘ गांधी विचार को अमेरिका से प्राप्त करके लौटे हैं. [wpse_comments_template]

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