
बैजनाथ मिश्र
संत कबीरदास की उलटबासियां व्यंग्यात्मक होने के साथ ही सारगर्भित भी होती हैं. इन्हीं में से एक है- बरसे कम्बल भीगे पानी. यह लगता तो असंभव है लेकिन देश में राजनीति जिस तरह बरस रही है और लोकतंत्र जिस तरह भींग रहा है, उससे उपर्युक्त उलटबासी चरितार्थ हो रही है.
दो संविधान संशोधनों के बाद भी दलबदल कानून अपने मकसद में कामयाब नहीं हो रहा है. ये दोनों संशोधन राजीव गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी की सरकारों ने क्रमशः 1985 और 2003 में किया था. ये संशोधन विधानमंडलों और संसदीय दलों में दलबदल रोकने के उद्देश्य से किये गये थे.
राजीव गांधी की सरकार ने दल बदलने के लिए एक तिहाई सांसदों-विधायकों की संख्या को जरूरी कर दिया था. वाजपेयी की सरकार ने इसे दो तिहाई कर दिया था. लेकिन हमारे सांसदों-विधायकों ने बार-बार साबित किया है कि केवल कानून से उनकी पतनशीलता और निर्लज्जता नहीं रोकी जा सकती.
ताजा उदाहरण बंगाल और महाराष्ट्र के हैं. बंगाल के सांसदों ने जिस तरह लोकतंत्र और संविधान को पानी-पानी किया, उसमे उद्धव ठाकरे के सांसद उत्प्रेरित हो गये. वे घर वापसी यानी असली शिवसेना (शिंदे गुट) की ओर लपक लिये. खबर तो यह भी उड़ी है कि सपा के भी सांसदों को साइकिल की सवारी सुहा नहीं रही है और वे गिनती जुटाने में लगे हैं. यह एक बीमारी है जिसका मुख्य कारण भविष्य की चिंता है. जब सांसदों, विधायकों को यह चिंता सताने लगे कि अगली बार उनका जीत पाना मुश्किल है तो वे वहां जाने के लिए व्याकुल हो उठते हैं जहां सुखमय भविष्य की संभावना प्रबल दिखाई देती है.
बंगाल के जो सांसद एक अनाम सी पार्टी में जाने वाले हैं, वे अंततः भाजपा में ही आयेंगे. अभी भाजपा उनसे दूरी बनाए रखने का दिखावा कर रही है. इसका कारण यह है कि उसने तृणमूल वालों के लिए अपने दरवाजे घोषित रुप से बंद कर रखे हैं. इसी को कहते हैं "भरे भवन में करत हौं नैनन ही सों बात." लेकिन उसकी कपटलीला सार्वजनिक रुप से चल रही है. उधर शिंदे गुट तो भाजपा का आशीर्वादी दल है. भाजपा ने ही उद्धव ठाकरे, शरद पवार की पार्टियां तोड़कर अपनी बैटिंग बोलिंग के लिए चौरस मैदान बना लिया है.
कमाल यह है कि ये टूटे हुए गुट ही ओरिजनल पार्टी हैं और ओरिजनल डुप्लीकेट हो गये हैं. यह सब कुछ हुआ है दल बदल कानून के रहते, निर्वाचन आयोग की निगरानी में और सुप्रीम कोर्ट की जानकारी में. ऐसा नहीं है कि ये क्रीड़ाएं पहले नहीं हुई हैं. अशोक गहलोत ने राजस्थान और बिहार में तेजस्वी यादव ने बसपा और ओवैसी के विधायकों को निगल लिया था. ममता को तो कांग्रेस का इकलौता विधायक तक बर्दाश्त नहीं हुआ. उन्होंने कुछ भाजपा विधायकों को भी खींच लिया जबकि वे कुल संख्या के दो तिहाई नहीं थे. भाजपा ने उन्हें जाने दिया. आज वे करुण क्रंदन कर रहे हैं.
इंदिरा गांधी ने तो अंतरात्मा की आवाज की दुहाई देकर अपनी ही पार्टी तोड़ दी थी और अपनी अलग पार्टी इंदिरा कांग्रेस बना ली थी. नेहरू के जमाने के दो बैलों की जोड़ी चुनाव चिह्न फ्रीज हो गया. नया चुनाव चिह्न गाय-बछड़ा आया और 1977 में गाय-बछड़ा दोनों के रायबरेली-अमेठी से हार जाने के बाद से वही कांग्रेस "पंजा" दिखा रही है.
इंदिरा गांधी ने चरण सिंह को पटाकर जनता पार्टी तोड़ डाली और सरकार गिर गयी. राजीव गांधी ने भी चंद्रशेखर को प्रधानमंत्री बनाकर जनता दल तोड़ डाला था. मध्य प्रदेश में भाजपा ने ज्योतिरादित्य सिंधिया के माध्यम से उनके समर्थक विधायकों को तोड़ कर कमलनाथ की सरकार गिरायी थी.
अपने झारखंड में ही 2006 में बाबूलाल मरांडी ने भाजपा तोड़ कर झारखंड विकास मोर्चा बनाया था. लेकिन उनके पास वैधानिक टूट के लिए आवश्यक विधायक नहीं थे. इसलिए उनके समर्थक विधायक सदन में भाजपा के साथ बैठते थे और बाहर झाविमो के कार्यक्रमों में भाग लेते थे.
1990 में बिहार भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष इंदर सिंह नामधारी ने लालू प्रसाद से मिलकर पार्टी तोड़ दी थी. और सरकार में मंत्री बन गये थे. उन्हें शायद यह मलाल था कि उनके बदले ललित उरांव विधायक दल के नेता चुन लिये गये थे. नामधारी-समरेश सिंह की जोड़ी ने तेरह विधायकों के समर्थन की चिट्ठी विधानसभा अध्यक्ष गुलाम सरवर को सौंप दी थी. सरवर ने टूट को मान्यता दे दी. यह संख्या भाजपा के कुल विधायकों की संख्या की एक तिहाई थी. लेकिन इनमें तीन के हस्ताक्षर फर्जी थे. ये तीनों सदन में नामधारी के संपूर्ण क्रांति दल के साथ बैठते थे और बाहर भाजपा जिंदाबाद के नारे लगाते थे. ये लौटे तब जब समरेश सिंह नामधारी से बिदक गये. गौर हरिजन (चंदनकियारी के विधायक) उनके साथ थे ही. इस प्रकार यह संख्या पांच हो गयी. यह संख्या तेरह के दल की एक तिहाई थी.
खैर, उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक देश के हर राज्य में दल बदल कानून को ठेंगा दिखाया गया है. हरियाणा और अरुणाचल में तो राज्य सरकारें तक पाला बदल चुकी हैं. बावजूद इसके हमारे रहनुमा लोकतंत्र और संविधान की कसमें खाते रहते हैं, लेकिन अघाते कभी नहीं हैं. इसका मतलब यह है कि दल बदल रोकने के लिए दोनों संविधान संशोधन न पहले कारगर थे, न अब हैं.
संविधान संशोधनों में इस बात का उल्लेख नहीं किया गया है कि विभाजित गुट की संख्या भले ही दो तिहाई हो, लेकिन वह उसी पार्टी में विलय कर सकता है जो मान्यता प्राप्त हो, जिसका अपना सिम्बल हो, जो निरंतर चुनाव लड़ती हो और निश्चित फीसदी वोट भी पाती हो. अपने देश में सैंकड़ों पंजीकृत पार्टियां हैं. इसलिए बंगाल स्टाइल में टूटिये और ऐसी किसी भी पार्टी में शामिल हो जाइए. कानून कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा.
भाजपा इस पलटबाजी को प्रश्रय शायद इसलिए दे रही है कि उसे कुछ जरुरी या अधूरे काम पूरे करने हैं. हो सकता है वह नेता प्रतिपक्ष के उस बयान का मुंहतोड़ जवाब देना चाहती हो जिसमें कहा गया था कि यह सरकार सालभर में गिर जाएगी. हो सकता है विपक्ष के हौसले पस्त करने के लिए नये-नये उपक्रम रचे जा रहे हों. सवाल यह है कि जब कानून के बावजूद दल बदल हो ही रहे हैं तब संविधान में संशोधन किये ही क्यों गये?
दरअसल, सभी दलों के सांसद-विधायक अपनी पार्टी के ह्विप के अधीन होते हैं. ह्विप के उल्लंघन के साथ ही उनकी मेंबरी चली जाती है जबकि वे कई मुद्दों पर पार्टी लाइन के खिलाफ चलना, बोलना और वोट करना चाहते हैं. ह्विप की यह तानाशाही भी लोकतंत्र की भावना के विरूद्ध है. इसीलिए यह व्यवस्था की गयी थी कि यदि पार्टी नेतृत्व की नीतियों, कार्यक्रमों और कार्यशैली से विधायक-सांसद क्षुब्ध हैं तो वे दूसरी पार्टी में जा सकते हैं. लेकिन यह प्रतिकार सामूहिक होना चाहिए और यह समूह कुल सदस्य संख्या का कम से कम दो तिहाई हो. लेकिन अब यह कानून मजाक बन गया है.
दुष्यंत के शब्दों में कहें तो "हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए." यानी इस घिनौने खेल को रोकने के लिए नया संविधान संशोधन होना चाहिए. आखिर यह व्यवस्था क्यों नहीं होनी चाहिए कि दल बदल करने वाले को सदन से त्यागपत्र देना होगा. क्या हमारे राजनीतिक दल इसके लिए एकमत होंगे या किसी दल या नेता की तरफ से ऐसी कोई मांग उठेगी? नहीं तो क्या छूत की यह बीमारी फैलती ही जाएगी, दुनिया का हमारा विशाल लोकतंत्र बेबस ही बना रहेगा? और हमारे सांसद-विधायक जरूरी संख्या जुटाकर पलटी मारते रहेंगे?
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