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बीएमसी चुनाव : बिना वोटिंग सत्तासीन दल के 68 जीते, लोकतंत्र जिंदाबाद!

यह सब सामने आया है दो जनवरी को, जब नामांकन वापसी की अंतिम तारीख थी. यानी वोट चोरी तो दूर की बात है यहां तो उम्मीदवार ही चुरा लिया गए हैं. और इसके लिए साम दाम दंड भेद जैसे तरीकों का इस्तेमाल किया गया है. जिसमें बीजेपी पारंगत है,
 

Girish Malviya
भारत में लोकतंत्र लगभग खत्म होने को है. यकीन न हो तो जरा बीएमसी यानी बृहन्मुंबई महानगरपालिका और महाराष्ट्र के नगरीय निकाय के इलेक्शन पर नजर दौड़ा लीजिए. देश के इतिहास में ये पहला ऐसा इलेक्शन है जहां बिना वोटिंग के 227 सीटों में सत्तासीन दल के 68 उम्मीदवार निर्विरोध जीत गए हैं.


इन 68 सीटों में से बीजेपी को 44 सीटें, एकनाथ शिंदे गुट की शिवसेना को 22 सीटें और अजित पवार की एनसीपी को 2 सीटें मिली हैं. जबकि बीएमसी के चुनाव में मतदान की तारीख 15 जनवरी है.


यह सब सामने आया है दो जनवरी को, जब नामांकन वापसी की अंतिम तारीख थी. यानी वोट चोरी तो दूर की बात है यहां तो उम्मीदवार ही चुरा लिया गए हैं. और इसके लिए साम दाम दंड भेद जैसे तरीकों का इस्तेमाल किया गया है. जिसमें बीजेपी पारंगत है, कहीं पैसा देकर विरोधी पार्टी के उम्मीदवार को बैठा दिया गया, कही उसे डराया धमकाया गया है और कहीं तो उसे नामांकन स्थल तक पहुंचने ही नहीं दिया गया. 


महाराष्ट्र के बड़े अखबार सपकाल के अनुसार कुलाबा विधानसभा क्षेत्र के वार्ड क्रमांक 225, 226 और 227 से विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर के भाई मकरंद नार्वेकर, बहन गौरवी शिवलकर और भाभी हर्षदा नार्वेकर बीजेपी से नामांकन दाखिल किया.

 

 इनके नामांकन दाखिल करते समय नार्वेकर ने पुलिस के माध्यम से नामांकन दाखिल करने आए विपक्षी दलों के उम्मीदवारों को धमकाया और उन्हें नामांकन दाखिल करने से रोका गया
.

इन आठ उम्मीदवारों ने बंबई उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर आरोप लगाया है कि बृहन्मुंबई महानगरपालिका चुनाव के लिए उनके नामांकन फॉर्म को निर्वाचन अधिकारी ने भाजपा विधायक और महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर के इशारे पर स्वीकार नहीं किया.


पहले कभी कभार एक-दो सीटों पर ऐसा होता था. एक साथ 68 सीट पर ऐसा होना एक बड़ी घटना है. लेकिन हमारा मीडिया इस विषय पर बिल्कुल खामोश बना हुआ है. यह घटना बता रही है कि देश की राजनीति किस ओर जा रही है, कैसे पूरी चुनाव प्रक्रिया की धज्जियां उड़ाई जा रही है और कैसे तानाशाही की ओर देश को धकेला जा रहा है.


सबसे बड़ी बात तो यह है कि ऐसे प्रत्याशी जो बिना चुनाव लड़े जीत गए हैं उन्हें निर्वाचित प्रतिनिधि इलेक्टेड कैंडिडेट कैसे माना जा सकता है? क्योंकि इलेक्शन तो हुआ ही नहीं जब सामने कोई उम्मीदवार ही नहीं तो कैसा इलेक्शन ? अगर आप फ्री एंड फेयर इलेक्शन नहीं करा सकते तो चुनाव कराने का नाटक कर ही क्यों रहे हैं.

 

डिस्क्लेमरः यह लेखक के निजी विचार हैं और यह उनके सोशल मीडिया एकाउंट से साभार लिया गया है.

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