alt="" width="300" height="134" /> बोकारो थर्मल में बाहा पर्व पर पूजा-अर्चना करते नायके हड़ाम[/caption] इस दौरान निकली शोभा यात्रा में `खद्दी मनदाय होले काला हो नायगस सीन मेना की बारा` का गायन किया गया. जबकि `होमरार का भैया चाला टाका केकर नीन भैया` के गीत पर आदिवासी महिलाओं ने भाई-बहन के रिश्तों को अटूट बताते हुए सरहुल का उत्सव मनाया. सरना स्थल पर पूजा संपन्न होने के बाद ढोल नगाड़े बजाकर पहान को अपने घर ले गये. महोत्सव में शामिल डीवीसी के प्रोजेक्ट हेड एनके चौधरी ने संबोधित करते हुए कहा कि बाहा पर्व आदिवासी व मूलवासियों का पवित्र पर्व है. प्रकृति की रक्षा करना हमारा प्रथम धर्म है. इस प्रकृति पर्व को उरांव भाषा में खद्दी, मुंडा व संथाल भाषा में बाहा और हिन्दी में सरहुल के नाम जाना जाता है. उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज शुरू से ही प्रकृति के उपासक रहे है. डीवीसी बोकारो थर्मल के डीजीएम बीजी होलकर ने कहा कि झारखंड के तीज त्योहार हमें प्रकृति की रक्षा करने का संदेश देता है. इसे संजो कर रखने मे आदिवासी समाज की अहम भूमिका रहीं है. [caption id="attachment_589305" align="alignnone" width="300"]
alt="" width="300" height="134" /> शोभायात्रा में शामिल श्रद्धालु[/caption] शोभा यात्रा भम्रणकर जोहारथान पहुंची. शोभा यात्रा में पूजा समिति के अध्यक्ष मणीराम मुर्मू, थाना प्रभारी शैलेश कुमार चौहान, हीरालाल मांझी, जय कुमार मुंडा, झरीलाल हांसदा, सौम्या खलखो, सुधीर हेम्ब्रम, जहरू उरां धुर्वा मांझी, इतवा किस्पोटा, जीजी लकड़ा, सीताराम मंराडी, रामकुमार मंराडी, मोतीलाल बेसरा, जोधन बास्के, रामचंद्र भगत, संदीप भगत, बिनोद सोरेन, मंजू देवी, सुशीला देवी, मणी देवी, सुनीता टोप्पो, निलेश एक्का, संजु सोरेन, कालेश्वरी भगत, बढन उरांव, सीताराम सोरेन सहित सैंकड़ों लोग उपस्थित थे. यह">https://lagatar.in/kasmar-khatian-agitators-did-chakka-jam/">यह
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