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बोकारो थर्मल : कुआं का दूषित पानी पीना ही पांच सौ आदिवासियों की बनी नियति

Bokaro Thermal : नावाडीह प्रखंड के ऊपरघाट अंतर्गत काछो पंचायत के शिशवा गांव में आदिवासी हितों के तमाम सरकारी और सियासी दावों को डूब मरने के लिए चुल्लू भर पानी भी नसीब नहीं है. आदिवासियों के इस गांव में लगभग सौ घर हैं. पांच सौ आदिवासियों की पूरी आबादी सिर्फ एक कच्ची डांड़ी यानी कुआं पर निर्भर है. ये डांड़ी भी गांव से लगभग आधा किलोमीटर दूर है. जहां जाने के लिए आदिवासी महिलाओं को पथरीली और उबड़-खाबड़ रास्तों से होकर गुज़रना पड़ता है.

                   ‘डांड़ी का पानी भी दूषित

आधा किलोमीटर का पैदल सफ़र तय कर शिशवा गांव की आदिवासी महिलाएं पानी तो अपने घर में ले आती हैं. लेकिन पानी के साथ वो परिवार के सदस्यों को ग्लास में अदृश्य बीमारी भी परोसती है. महिलाएं कहती हैं कि डांड़ी का दूषित पानी पीना ही उनकी नियति है.

           महिलाओं को ज़्यादा होती है परेशानी

सबसे अधिक कठिनाई महिलाओं को होती है. गांव की एक महिला तेजिया देवी कहती हैं कि गांव में एक चापानल जरूर है, लेकिन गर्मी के मौसम में जलस्तर गिरने से पानी निकलना बंद हो जाता है. संझली देवी कहती हैं कुआं का पानी स्वच्छ नहीं हैं, लेकिन जीने के लिए और कोई विकल्प भी नहीं है. सुरुजमुनी देवी ने कहा कि गर्मियों में यह कुआं सूख जाता है. तो दिन में दो-दो बार दूसरे क्षत्रों की खाक छाननी पड़ती है. इसकी वजह से महिलाओं को बहुत परेशानी होती है. बच्चों को भी कभी-कभी स्कूल छोड़कर पानी लाना पड़ता है. यह">https://lagatar.in/bokaro-thermal-three-tractors-carrying-illegal-sand-caught-driver-absconding/">यह

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