Faisal Anurag साल 1970. गेब्रिएल गार्सिया मार्केज के उपन्यास ``वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलिट्यूड`` के अंग्रेजी अनुवाद का प्रकाशन साहित्य के इतिहास में लैटिन अमेरिकी साहित्य के लिए यह बहुत बड़ी घटना मानी जाती है. मार्केज के उपन्यास ने न केवल साहित्य का मुहावरा प्रभावित किया बल्कि जादुई याथार्थ को राजनैतिक, समाजिक, सांस्कृतिक विमर्श का हिस्सा भी बना दिया. बाद में उन्हें नोबेल पुरस्कार भी मिला और दुनिया के पिछड़े देशों के साहित्य के संघर्ष,जज्वे , वैकल्पिक समाज और इतिहास दृष्टिबोध को दुनिया की बहस का हिस्सा बना दिया. साल 2022 में पहली बार दक्षिण एशिया के किसी भी भाषा के लेखक को पहला बुकर पुरस्कार मिला. वह भी हिंदी की लेखिका गीतांजलिश्री को. दुनिया ने देखा कि किस तरह मार्केज के उपन्यास के प्रकाशन के बाद लातिनी अमेरिकी और अफ्रीकी सहित्य की धूम दुनिया में मची. हिंदी साहित्य गीतांजलिश्री के उपन्यास ``रेत समाधि`` के साथ ही सारी दुनिया के आकर्षण और चर्चा का केंद्र बन गया है. 1913 में रविंद्रनाथ टैगोर यानी रवि ठाकुर को मिले नोबेल साहित्य पुरस्कार ने एशिया के साहित्य के दरवाजे के रोशनदान से दुनिया को परिचित कराया था. भारतीय विचार,दर्शन, इतिहास और समाजिक यथार्थ को टैगोर के साहित्य के बहाने दुनिया ने जाना और समझा. भारत की स्वतंत्रता के संघर्ष को इससे नया तेवर,राष्ट्रीय गौरव और भविष्य के भारत की चेतना का आधार विकसित हुआ. अब बारी हिंदी की है.हिन्दी की लेखिका को बुकर पुरस्कार मिलना एक ऐसी परिघटना साबित होने जा रही है जिसमें भारतीय समाज को यूरोप और दुनिया के अन्य देश एक नए साहित्य उत्स के नजरिए से देखेंगे. हिंदी ने वह मुकाम हासिल करने के सफर की शुरूआत इस पुरस्कार के साथ कर दी है, जो प्रेमचंद के जमाने में ही उसे मिल जाना चाहिए था. गीतांजलिश्री दिल्ली में रहती हैं. उन्होंने अब तक पांच उपन्यास लिखे हैं और कहानियों के अनेक संग्रह भी हैं. इसके साथ ही वे हिंदी और अंग्रेजी में सामयिक सवालों पर ज्वलंत आलेख लिखती रही हैं. भारतीय मूल के सलमान रशदी, बीएस नयपाल को भी अंग्रेजी में लेखन के लिए यह पुरस्कार मिला है. इसके अलावे अरूंधति राय,अरविंद अडिगा, किरण देसाई को भी अंग्रेजी में लेखन के लिए इस पुरस्कार से नवाजा जा चुका है. हिंदी साहित्य की विश्व स्वीकृति की यह एक बड़ी परिघटना है. पुरस्कार धन्यवाद समारोह में बोलते हुए गीतांजलिश्री ने विनम्र बयान दिया. उन्होने कहा, "मैंने कभी बुकर प्राइज़ जीतने की कल्पना नहीं की थी. कभी सोचा ही नहीं था कि मैं यह कर सकती हूं. यह एक बड़ा पुरस्कार है. मैं हैरान हूं, प्रसन्न हूं, सम्मानित महसूस कर रही हूं और बहुत कृतज्ञ महसूस कर रही हूं." चयन समिति ने इस उपन्यास के संदर्भ में कहा है कि "टूंब ऑफ़ सैंड`` रेत समाधि का अंग्रेजी अनुवाद इंटरनेशनल बुकर पुरस्कार जीतने वाली किसी भी भारतीय भाषा में मूल रूप से लिखी गयी पहली किताब है और हिंदी से अनुवादित पहला उपन्यास. टूंब ऑफ़ सैंड उत्तर भारत की कहानी है जो एक 80 वर्षीय महिला के जीवन पर आधारित है. यह किताब ऑरिजिनल होने के साथ-साथ धर्म, देशों और जेंडर की सरहदों के विनाशकारी असर पर टिप्पणी है." "टूंब ऑफ सैंड`` के नाम से रेत समाधि का अनुवाद मशहूर अनुवादक डेजी रोजबेल हैं.रेत समाधि की समीक्षा करते हुए हिंदी समीक्षक रवींद्र त्रिपाठी ने लिखा है कि गीतांजलिश्री का उपन्यास `रेत-समाधि’ ऐसी रचना है जो दिखाती है कि गद्य में कविता की उपस्थिति हो सकती है या होती है. कई बार गद्य में कविता का सघन रूप दिखता है. हालांकि हर किसी का गद्य काव्यात्मक नहीं होता. लेकिन हर अच्छा गद्य शायद काव्यात्मक होता है. वैसे तो ये ठेठ उपन्यास है और इसमें एक मुख्य कथा है जिससे जुड़ी कई आनुषंगिक कथाएं भी हैं. पर जिस तरह से ये कथाएं कही (या लिखी गयी हैं) उसमें कथालोक के साथ विस्तीर्ण काव्यलोक भी है. इसमें एक नायाब किस्म की किस्सागोई भी है. घुमावदार और कुछ जगहों पर आकस्मिकताओं को समेटे हुए. इन किस्सों का भरपूर और सघन स्वाद आप तभी ले पाएंगे जब इसे आहिस्ता आहिस्ता पढ़ें. हर लफ्ज और हर वाक्य पर ठहरें और उनका भरपूर रस ले. उपन्यास का एक उदाहरण लेकर कहें तो `हर कतरा हर तिनका हर रेशा पूरा-एहसास है.‘ काव्यात्मकता के अलावा भाषिक प्रयोग की अन्य छटाएं भी यहां हैं. बुकर प्राइज मनी के रुप में 50 लाख रुपये दिए जाते हैं. यह राशि गीतांजलिश्री और अनुवादक रोजबेल के बीच बराबर बंट जाएगी. लेकिन सवाल राशि से ज्यादा बड़ा है. हिंदी दुनिया की एक बड़ी आबादी की भाषा है लेकिन यह आबादी अभी भी अंग्रेजी के व्यामोह से ग्रस्त है. हिंदी साहित्यकार को वह सम्मान नहीं मिलता है जो भारत के ही बंगला,मराठी,तमिल, मलयाली लेखकों को समाज देता है. बुकर प्राइज के बाद यह धारणा बदलेगी कि हिंदी भी एक ऐसी भाषा है जिसमें विश्व स्तर के साहित्य का सृजन होता है. [wpse_comments_template]
गीतांजलिश्री को मिले बुकर प्राइज ने साबित किया कि हिंदी में भी विश्वस्तरीय लेखन होता है
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