
बैजनाथ मिश्र
कांग्रेस अभी दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव में अपनी करारी हार की टीस सहला ही रही थी कि उसे अपने प्रिय मुद्दे चुनाव आयोग पर हमले का मौका मिल गया है. उसे यह मौका दिया है “इंडियन एक्सप्रेस” में प्रकाशित एक रिपोर्ट ने. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि एसआईआर को लेकर दो निर्वाचन आयुक्तों ने दस महीने में चौदह आपत्तियां की, पर सुनीं नहीं गईं. यानी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार निरंकुश हो गये हैं और वह चुनाव आयुक्त सुखबीर संधू और विवेक जोशी की सुन ही नहीं रहे हैं.
लगातार पराजय झेल रहे विपक्ष के लिए यह मसाला काफी जायकेदार था. इसलिए अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी, उद्धव ठाकरे ने ज्ञानेश कुमार को हटाने और उन्हें गिरफ्तार करने की मांग कर डाली. कुछ विघ्नसंतोषी पेशेवर आंदोलनजीवी भी मैदान में कूद गये. राहुल गांधी भी दाना-पानी लेकर चढ़ बैठे. उन्होंने ज्ञानेश कुमार को देशद्रोही की उपाधि से विभूषित करते हुए सरकार, आयोग पर आरोपों की झड़ी लगा दी.
ये सभी अपनी हार का कारण वोट चोरी बताते रहे हैं, लेकिन अब तक कोई ऐसा पुख्ता प्रमाण पेश नहीं कर पाये हैं जिसके आधार पर सुप्रीम कोर्ट इस बाबत आयोग से जवाब तलब कर सके.
इस नयी सनसनी के बाद मांग की जा रही है कि एसआईआर की प्रक्रिया शुरू होने के बाद संपन्न कराये गये विधानसभा चुनाव रद्द कर दिये जायें और नये सिरे से चुनाव करायें जायें. यह सब ख्याली पुलाव है, लेकिन इसमें पड़ रहे मसालों की सुगंध नथूनों में तो समा ही रही है. यह महक कुछ दिन तारी रहेगी और राजनीति भी जारी रहेगी.
सवाल यह है कि दो चुनाव आयुक्तों की आयोग में नहीं सुनी जा रही है और ज्ञानेश कुमार खुदमुख्तार बने हुए हैं तो ये दोनों महाशय संधू और जोशी कर क्या रहे हैं? इंडियन एक्सप्रेस में छपी रिपोर्ट में भी किसी नाराज चुनाव आयुक्त के हवाले से कुछ नहीं कहा गया है. सब कुछ सूत्रों के हवाले से बाहर आया है.
सूत्रों के हवाले से इसी अखबार ने 2012 में सेना के जरिये तख्तापलट की साजिश और सेना के मूवमेंट की खबर छापी थी, वह भी बैनर हेडलाइन में. तब जनरल वीके सिंह थल सेनाध्यक्ष थे और खबर के मुताबिक उन्होंने कुछ सैन्य टुकड़ियों को रायसीना हिल्स की ओर बढ़ने का आदेश दे दिया था. इस खबर से तहलका मच गया था. बाद में रक्षा मंत्री ने इस खबर को बेबुनियाद बताया था.
इसी प्रकार राफेल सौदे में भी सूत्रों के हवाले से सौदे के लिए संपन्न हुई बैठक में जो कुछ कहा-सुना गया था, उसकी खबर एक अंग्रेजी अखबार में छप गयी थी. उसी खबर के आधार पर “चौकीदार चोर है” का नारा लगवाया गया. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. कोर्ट ने आरोप निराधार पाया और राहुल गांधी को माफी मांगनी पड़ी थी.
बहरहाल, कथित रुप से नाराज दोनों चुनाव आयुक्त मुख्य सचिव रह चुके हैं. तो क्या उन्हें अपने अधिकार और कर्तव्य की जानकारी नहीं है? क्या उन्हें यह मालूम नहीं है कि आयोग में फैसले या तो बहुमत से होते हैं या फिर आम राय से? फिर मुख्य चुनाव आयुक्त मनमानी कैसे कर सकते हैं?
चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है और यदि वहां ही लोकतांत्रिक, संवैधानिक प्रक्रिया का अनुपालन नहीं हो रहा है तो “दोनों उपेक्षित” चुनाव आयुक्तों को राष्ट्रपति का दरवाजा खटखटाने या सुप्रीम कोर्ट में जाने से कौन रोक रहा है? यदि वे अपने सम्मान की रक्षा नहीं कर सकते तो निष्पक्ष निर्वाचन सुनिश्चित कैसे कर पायेंगे? यदि संधू और जोशी न राष्ट्रपति को वस्तुस्थिति बता सकते हैं न सुप्रीम कोर्ट में फरियाद कर सकते हैं तो कृपा करके इस्तीफा दे दें.
खबर तो तब भी बनेगी और विपक्ष को हमले का प्रामाणिक आधार भी मिल जाएगा. वैसे भी संविधान में यह नहीं लिखा है कि चुनाव आयोग में कितने सदस्य हो सकते हैं या होंगे. 1995 से पहले तो एक ही निर्वाचन आयुक्त होता था और वह भी प्रधानमंत्री का “नयनतारा”. उनमें से कुछ रिटायरमेंट के बाद राजदूत, राज्यपाल बनते थे या पद्म सम्मान से नवाजे जाते थे. एक मुख्य चुनाव आयुक्त तो न केवल राज्यसभा भेजे गये, बल्कि मंत्री भी बना दिये गये. नरेंद्र मोदी ने तो चुनाव आयुक्तों को अब तक ऐसा कोई पुरस्कार नहीं दिया है.
खैर, चुनाव आयोग को त्रिसदस्यीय नरसिंह राव ने ही बनाया. वह भी फायर ब्रांड मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन की अकड़ ढ़ीली करने के लिए. शेषन अपने दोनों सहयोगी आयुक्तों के प्रति इतनी अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते थे कि दोनों ने उनकी शिकायत राष्ट्रपति से की थी. तब मामला शांत हुआ था. हालांकि उसके कुछ ही महीने बाद शेषन रिटायर हो गए और अहमदाबाद से लाल कृष्ण आडवाणी के विरुद्ध कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़कर हार गए.
खैर, खबर है कि दोनों “उपेक्षित” चुनाव आयुक्तों ने अपनी पीड़ा का इजहार इस देश के सबसे बड़े अधिकारी यानी कैबिनेट सचिव से किया था. सवाल यह है कि जब चुनाव आयुक्त संवैधानिक पद पर बैठे हैं तो उन्होंने प्रशासनिक प्रमुख से शिकायत क्यों की? उन्होंने संवैधानिक या कानूनी प्रक्रिया का सहारा क्यों नहीं लिया? ये दोनों महानुभाव बहुमत में हैं और कैबिनेट सचिव के सामने रो रहे हैं तो इन्हें पद पर बने रहने का क्या कोई अधिकार है?
लेकिन मूल प्रश्न यह है कि जो खबरें प्रकाश में आयी हैं क्या वे सही हैं? चुनाव आयोग की सफाई से तो ऐसा लगता है कि बात का बतंगड़ बनाया जा रहा है. आयोग का कहना है कि मसौदा चरण में सदस्यों द्वारा सवाल उठाना या सुझाव देना सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य व्यवस्था को बेहतर बनाना है. आयोग का यह भी कहना है कि आंतरिक नोटों को संदर्भ से अलग देखना पूरी तस्वीर पेश नहीं करता. सभी अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिये गये हैं. आयोग तो यह भी कह रहा है कि आयुक्त ही नहीं, कोई अधिकारी भी सुझाव दे सकता है.
आयोग के इस स्पष्टीकरण के विरुद्ध अब तक उन दोनों चुनाव आयुक्तों ने मुंह नहीं खोला है, तो क्या यह मान लिया जाये कि जो अंतर्कथा परोसी गई है, उसके कथ्य तो सही हो सकते हैं, लेकिन तथ्य वह नहीं है जिसे लेकर विपक्ष आसमान सिर पर उठाये हुए है. दिलचस्प यह भी है कि जिस संधू और जोशी की नियुक्ति के तरीके को लेकर विपक्ष ने संसद नहीं चलने दी थी, वे आज उसे मनोहर और उपयोगी लगने लगे हैं.
इसका मतलब यह कतई नहीं है कि विपक्ष को इस विषय पर बोलना ही नहीं चाहिए. लेकिन उसे ज्ञानेश कुमार के साथ-साथ संधू और जोशी की नैतिकता को भी ललकारना चाहिए.
उसी प्रकार यदि बिहार, दिल्ली और पश्चिम बंगाल में फिर से चुनाव होने चाहिए तो आंध्र प्रदेश, केरलम, तमिलनाडु में भी दुबारा चुनाव क्यों नहीं होने चाहिए? यहां भी तो एसआईआर के बाद ही चुनाव हुए हैं. यह दलील कौन मानेगा कि जहां भाजपा जीत गई वहां दुबारा चुनाव हो और जहां विपक्ष जीत गया, वहां फिर चुनाव न हो. रही बात ज्ञानेश कुमार या अन्य आयुक्तों को हटाने की तो महाभियोग ले आइए. सही है कि महाभियोग गिर जाएगा, लेकिन विपक्ष इसी बहाने अपनी खीझ तो निकाल सकेगा.
गौरतलब यह भी है कि एसआईआर का पूरा मामला सुप्रीम कोर्ट देख रहा है और यदि उसे लगेगा कि आयोग इसमें इरादतन या शरारतन गड़बड़ी कर रहा है तो वह चुप नहीं रहेगा. लेकिन विपक्ष के कुछ नेताओं को तो सुप्रीम कोर्ट पर भी भरोसा नहीं है. राहुल गांधी चुनाव आयोग पर पक्षपाती होने का आरोप इसी आधार पर लगा रहे हैं कि भाजपा के विरुद्ध सत्ता विरोधी लहर दिखाई ही नहीं दे रही है. यह आरोप या सोच बचकाना है.
कांग्रेस तमिलनाडु में 1967 से गायब है, बंगाल में 1977 के बाद लौटी ही नहीं, बिहार, उत्तर प्रदेश में 1990 के बाद से वह हाथ मल रही है, ओडिशा में नवीन पटनायक ने पच्चीस साल तक कांग्रेस को जीतने नहीं दिया और त्रिपुरा में कांग्रेस अपनी वापसी का मानो सपना भी नहीं देख रही है. तो क्या उपर्युक्त राज्यों में अलग-अलग दलों की जीत का कारण तत्कालीन निर्वाचन आयुक्तों की पक्षधरता या बेईमानी थी? दरअसल, कांग्रेस हार रही है अपनी कारस्तानी और काहिली के कारण.
बहरहाल, इस पूरे प्रकरण में कहानी तो कमजोर है ही पटकथा भी लचर है और किरदार जो डायलॉग बोल रहे हैं, उनसे जनता ऊब चुकी है. अच्छी कहानी पर बनी फिल्म भी घटिया किरदार डुबो देते हैं. लेकिन यहां तो तोला-माशा से ज्यादा तमाशा है. जिस पर तालियां बजाते-बजाते हाथ थक चुके हैं.
निर्वाचन आयोग अपने ऊपर लगे आरोपों पर प्रेस कांफ्रेंस करेगा नहीं, विपक्ष उसे लानत भेजता रहेगा और भाजपा को लपेटता रहेगा तो भाजपा कांग्रेस का इतिहास कुरेदती रहेगी.
ज्ञानेश कुमार देशद्रोही हैं, गद्दार हैं, लेकिन सरजिल इमाम, उमर खालिद खांटी देशभक्त है. विपक्ष यहीं पिट जाता है. सरजिल, उमर के सवाल पर वह कहता है कि फैसला कोर्ट करेगा, लेकिन ज्ञानेश कुमार का फैसला कंगारु कोर्ट ही करेगा. इसलिए जितना हंगामा करना हो, कीजिए, ज्ञानेश कुमार तभी हटेंगे, जब वह खुद इस्तीफा दें या उन्हें महाभियोग से हटाया जाये. इस पूरे प्रकरण को संक्षेप में कहें तो अलादीन का चिराग घिसने से न जिन्न निकलता है, न गायब होता है. यहां तो विपक्ष के पास वह चिराग भी नहीं है. पहले उसे लाइए, घिसिए, फिर देखिए क्या होता है?