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भैया, बिहार महाराष्ट्र नहीं है

Dr. Pramod Pathak  एक बड़े अंतरराष्ट्रीय राजनेता का कथन था कि राजनीति में तो एक हफ्ता भी लंबा अरसा होता है. पुरानी बात हो गई. अब तो लगता है कि एक हफ्ता तो बहुत ही लंबा अरसा है. यहां तो एक दिन में खेला हो जाता है. जैसे कि बिहार में हो गया. कुछ लोगों को लगता था कि राजनीति के खेल में जीतने के नुस्खे का कॉपीराइट उन्हीं के पास है. खुद को चाणक्य समझने वाले शायद यह बुनियादी सच्चाई भूल गए कि बिहार तो ओरिजिनल चाणक्य का प्रदेश है. जाहिर सी बात है ओरिजिनल डुप्लीकेट पर भारी पड़ गया. राजनीति तो रणनीति का खेल है और रणनीति की सफलता या विफलता निर्भर करती है एक कला पर जिसे टाइमिंग कहा जाता है. यानी सही समय पर सही चाल.  एक ही झटके में शह और मात :  तो नीतीश कुमार ने सही समय पर सही चाल चल कर भारतीय जनता पार्टी के रणनीतिकारों को एक ही झटके में शह और मात दोनों दे दी. जोर का झटका जोर से लगा. जो लोग राजनीति में शुचिता की दुहाई देते हुए काम उसके ठीक विपरीत करते रहे हैं, उन्होंने ऐसा नहीं सोचा था. एक और भी बात समझने वाली है. एक ही चाल बार-बार सफल नहीं होती. गोवा और महाराष्ट्र की बात अलग है. बिहार की अलग. वैसे भी पूरब और पश्चिम का हिसाब किताब थोड़ा अलग होता है. थोड़ा पहले यह बंगाल में भी दिखा था. अब बिहार में ठीक से दिख गया. अब तो करो या मरो वाली स्थिति : महाराष्ट्र में तो भाजपा ने उद्धव ठाकरे की सरकार गिरा दी. लेकिन वही खेल बिहार में सफल नहीं हुआ. इस तरह के प्रयास तो झारखंड में भी हो रहे हैं, लेकिन अब तक दाल नहीं गली. मगर जो मूल बात है वह  विपक्ष के सारे नेताओं को समझ लेना चाहिए कि अब तो करो या मरो वाली स्थिति है. चूके तो गये. फिर अब तो जयप्रकाश नारायण जैसे कोई कद्दावर नेता भी नहीं हैं जो संपूर्ण विपक्ष को एक कर सकें. इसलिए अब तो सब खुद ही करना होगा. यदि लोकतंत्र को कायम रखना है तो आपसी भेदभाव भुलाकर एकजुट होना होगा. हर विपक्षी दल को अपना दिल बड़ा करना होगा. किसी को यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सचमुच में जनतांत्रिक है. राजग तो एक मुखौटा है. वास्तविकता तो यह है कि धीरे धीरे पूरे देश में एक पार्टी की सरकार कायम हो रही है. दूसरे दलों को परिवार वादी बताने वाले लोग कितने लोकतांत्रिक हैं यह अब धीरे-धीरे स्पष्ट हो रहा है. मंशा विपक्ष मुक्त भारत की है : मंशा कांग्रेस मुक्त भारत नहीं बल्कि विपक्ष मुक्त भारत है. यह बयान कि क्षेत्रीय पार्टियों के दिन अब गिने हुए हैं, इसी मानसिकता को दर्शाते हैं. रूस या चीन की तरह एक पार्टी की स्थाई सरकार कायम करने का लक्ष्य अब स्पष्ट दिख रहा है. कुल मिलाकर यह लोकतंत्र की भावना के लिए घातक है. यदि बिहार वाली घटना के एक दो दिन पहले के एक चैनल के कुछ अति उत्साही लोगों की बातों पर गौर करें तो उन्होंने तो एलान कर दिया था कि बिहार में भी महाराष्ट्र वाली संभावना तय है. शायद उन्होंने कुछ लोगों को खुश करने के लिए ऐसा कहा था या फिर उनसे ऐसा कहलाया गया था. ऐसे लोग जो स्वयं को राजा से ज्यादा वफादार साबित करना चाहते हैं वह भी लोकतंत्र को कमजोर करने का काम कर रहे हैं. ये लोग शायद इस बात को भूल जा रहे हैं कि यदि लोकतंत्र ही नहीं रहेगा तो कल को वह भी नहीं रहेंगे. राष्ट्रीय परिदृश्य में यह बड़ा संकेत : इस नाते बिहार की राजनीतिक उलटफेर की घटना एक शुभ संकेत देती है कि अभी भी बहुत कुछ करने की संभावना है. यानी राष्ट्रीय परिदृश्य में यह एक बड़ा संकेत है. पटना तो झांकी है. खेल तो अब शुरू हुआ है. एक व्यक्ति तो खड़ा हुआ जिसकी राष्ट्रीय पहचान है. और यह खेल जरूरी भी था. हालांकि आगे की राह बहुत आसान नहीं होगी क्योंकि विपक्षी एकता में बाधाएं हैं. सबसे बड़ी बाधा तो यह है कि आज कोई उस तरह का व्यक्तित्व नहीं है जो विपक्ष को एक मंच पर ला सके. नीतीश कुमार को राष्ट्रीय पटल पर आगे आना होगा. लेकिन विपक्ष के नेताओं को भी थोड़ा-थोड़ा उदार होना पड़ेगा. निजी लाभ हानि और राग द्वेष से ऊपर उठ कर बड़े संदर्भ में सोचना होगा. और यह सब के हित के लिए तो जरूरी है ही, लोकतंत्र के हित के लिए सबसे जरूरी है. जब लोकतंत्र ही नहीं रहेगा तो राजनीति कहां करेंगे यह लोग. लेकिन कई तरह की चुनौतियां आयेंगी.  चुनौतियों का करना होगा मुकाबलासबसे बड़ी चुनौती तो सोशल मीडिया के उस तबके की होगी, जो अब तमाम तरह के भ्रम फैलाने का काम करेंगे. नैतिकता, चरित्र, ईमानदारी की दुहाई देंगे. झूठ का भ्रम जाल फैलाएंगे. नीतीश कुमार को दोषी ठहरायेंगे. कैसी विडंबना है कि झूठ बोलने वाले ईमानदारी की बात करेंगे. लेकिन इनका सामना करना होगा. नीतीश कुमार ने बिल्कुल न्याय सम्मत और धर्म सम्मत काम किया है. वर्तमान परिस्थिति में नीतीश कुमार के पास यही मार्ग था. रामचरितमानस के सुंदरकांड में  समुद्र बांधने के समय बड़ी सटीक बात भगवान राम द्वारा कही गई है- सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीति, सहज कृपन सन सुंदर नीति. ममता रत सन ज्ञान कहानी, अति लोभी सन बिरति बखानी अर्थात मूर्ख से विनय, कुटिल के साथ प्रीति, कंजूस के साथ उदारता का उपदेश, ममता में फंसे हुए मनुष्य को ज्ञान की बातें, लोभी से वैराग्य का वर्णन व्यर्थ के प्रयास है. राजनीति संभावित की कला है और जो संभव था वही नीतीश कुमार ने किया. संभव है लोगों को एक विकल्प दिखने लगे. डिस्क्लेमर : लेखक स्तंभकार और आईआईटी -आइएसएम  के रिटायर्ड प्रोफेसर हैंये उनके निजी विचार हैं. [wpse_comments_template]

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