Search

बूढ़ा पहाड़ः सरकार पर पूरा भरोसा है...बस दे दे रोजगार

सीआरपीएफ कैंप से मिलता है पानी, ग्रामीण आज भी झरनों के भरोसे जमीनी हकीकत- पार्ट 2 बूढ़ा पहाड़ से लौट कर प्रवीण कुमार Ranchi: बूढ़ा पहाड़ जहां चार दशकों से माओवादियों की समानान्तर सरकार चला करती थी. वहां अबुआ सरकार की झलक भी मिलनी शुरू हो गई है. लोग बेबाक तरीके से कहते हैं कि सरकार इलाके में बुनियादी सुविधाओं का विस्तार करे, रोजगार उपलब्ध करवा दे, तो सारी समस्या ही खत्म हो जाएगा. बूढ़ा पहाड़ में 10 आदिम जनजाति परिवार रहते हैं. वो आज भी झरनों के पानी से ही अपनी दैनिक जरूरतों को पूरा करते हैं. वहीं सीआरपीएफ और झारखंड पुलिस का संयुक्त कैंप के लिए ओडिशा के पुंदाग से पानी लाया जाता है. पानी लाने के लिए सात सोलर मोटर पहाड़ों में लगाये गये हैं. गर्मी के दिनों में पहाड़ से बहने वाला झरना सूख जाता है. जिससे वहां रहने वाले परिवारों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है. पुराने दिनों का खौफ और दर्द लोगों के जेहन में आज भी है जब कभी नक्सली लोग मीटिंग बुलाते थे, तो सभी बाल बच्चों सहित बैठक में उपस्थित होना हमारी मजबूरी थी. किसी परिवार ने घर में रहते बैठक में शामिल नहीं हुआ, तो उसे संगठन के सदस्यों द्वारा बेरहमी से सार्वजनिक दंड स्वरूप लाठी डंडों से पीटा जाता था, जब न तब दिन हो या रात कभी भी संगठन के लोग आते तो उनको खाना बना कर खिलाने के लिए बाध्य किया जाता था. किसी को भी पुलिस मुखबिरी के नाम पर उनकी हत्या कर देना उन दिनों आम बात थी. बूढ़ा पहाड़ में रहने वाली फूल कुमारी बिरजिया अपने पुराने दिनों को याद करते हुए डरते हुए कहती है कि हम का खाना बनाया करते थे. माओवादी गांव के लोगों से जबरन काम करवाते थे. यहां पर कई जनअदालतें लगायी गईं. जिसमें लोगों को पीटा भी जाता था. अब भी मन में यह डर लगा रहता है कहीं फिर से वही दिन ना आ जाएं. मुझे माओवादियों के लिए काम करने के आरोप में जेल भी जाना पड़ा था. जेल से छूटने के बाद हम लोग अपने गांव लौटे हैं, अभी सीआरपीएफ कैंप में काम करते हैं. बहेराडीह बिफा बिरजिया कहते हैं कि चार साल पहले अपने कुछ पैसों से छत्तीसगढ़ से एक पुरानी मोटरसाइकिल खरीदी थी. जिससे बाजार आना-जाना करते थे. माओवादियों ने उनकी मोटरसाइकिल ले ली और उन्हें पुलिस के मुखबिरी के तौर पर चिन्हित कर जनअदालत में में पिटाई की. उस दौर में जन आदलत आम बात थी. सरकारी राशन लाने के लिए खर्च करना पड़ता है 200 बूढ़ा पहाड़ के बिरजिया, कोरबा परिवारों को अपने 35 किलो राशन प्राप्त करने के लिए प्रत्येक बार 200 रुपये खर्च करने पड़ते हैं , क्योंकि सरकारी परिभाषा के हिसाब से ये परिवार अब भी मदगड़ी (च) में निवास करते हैं. उन्हें नक्सल उन्मूलन अभियान के दौरान बूढ़ा पहाड़ से हटा कर मतगाड़ी (च) में बसाया गया था, लेकिन आजीविका की कोई व्यवस्था नहीं होने के कारण करीब 10 परिवार वापस लौट गये. इनका डाकिया योजना का अनाज मतगाड़ी (च) वितरण किया जाता है. और ये लोग ट्रैक्टर से 200 रुपए प्रतिव्यक्ति भाड़ा लेकर गांव तक अनाज लाते हैं. यदि जिला प्रशासन चाहे तो बहेराडीह में अनाज वितरण कर इस बेवजह हो रहे खर्चे को कम कर सकती है. साप्ताहिक बाजार के लिए यहां के लोग बरगढ़ या भंडरिया जाते हैं. इसके लिए उनको गाड़ी भाड़ा के रूप जाने-आने में 200 रुपये खर्च करने पड़ते हैं. बूढ़ा पहाड़ के मजदूरों का मनरेगा रोजगार कार्ड आज भी मदगड़ी निवासी अब्दुल मियां रखे हुए हैं. अर्जुन बिरजिया (11274) के नाम से तो बिचौलिया लोग हरेक साल 100 दिनों का काम दिखा कर पैसे भी गबन कर रहे हैं. लड़के आज भी रोजगार के लिए कर रहे पलायन गांव के रिहुल बिरजिया, सुहैल बिरजिया, दिनेश बिरजिया, दीपक बिरजिया, निर्मल बिरजिया, महेंद्र बिरजिया, दीपक कोरवा, प्रभु कोरबा, अशोक कोरबा, मनोहर कोरबा सरीखे युवाओं को आज भी मजदूरी के लिए केरल और बेंगलुरु का रुख करना पड़ रहा है. पहले ये सभी मओवादियों के डर से रोजगार के लिए पलायन चोरी- चुपके करते थे. आज मजबूरी में काम नहीं होने के कारण पलायन करने को मजबूर हैं. बच्चे को पढ़ता देख खुशी होती है 20 वर्षीय गंगोत्री पिता बलदेव बिरजिया कहती हैं कि 10 लड़कियां बूढ़ा पहाड़ में हैं, जो कभी स्कूल नहीं गयीं. एक साल पहले तक कोई बच्चा भी स्कूल नहीं गया था. अब बच्चों को स्कूल जाता हुआ देख, अच्छा लगता है. हम लोग पढ़े-लिखे नहीं हैं. नोमिया कुमारी कहती हैं कि मैं भी स्कूल नहीं गई .पहले बूढ़ा पहाड़ में लोगो का जीवन कैदियों की तरह था. हमलोग बहुत कष्ट में रहते थे. सरकार हम लोग को प्रशिक्षण देकर अपने पैरों पर खड़ा करे. अभी कैंप में काम मिल रहा है, लेकिन जब कैंप का निर्माण कार्य पूरा हो जाएगा, तो हम लोग बेरोजगार हो जाएंगे. [wpse_comments_template]

Comments

Leave a Comment

Follow us on WhatsApp