लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने तीन दिनों के दौरान दो बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खुली बहस की चुनौती दी है. राहुल गांधी की इस चुनौती पर पीएम मोदी की फिलहाल कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है. लेकिन बीजेपी के कई नेता राहुल गांधी की आलोचना करते हुए उन पर निशाने साध रहे हैं. दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, झारखंड से बीजेपी के सांसद निशिकांत दुबे समेत कई नेता राहुल गांधी के साथ बहस के लिए जगह बता रहे हैं. केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह समेत बीजेपी शासित कई राज्यों के मुख्यमंत्री भी पीएम मोदी को पेश राहुल की चुनौती पर पलटवार कर रहे हैं.
राहुल गांधी जिन बातों को केंद्र में रखते हुए पीएम मोदी को खुली बहस की चुनौती दे रहे हैं, वह उनके विदेशी कनेक्शन और विपक्ष के देशद्रोही जैसे आरोपों से जुड़े मालूम पड़ते हैं. वैसे सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी लगातार राहुल गांधी पर आरोप लगाती रही है कि वो विदेश में भारत की छवि ख़राब कर रहे हैं. उनकी विदेश यात्राओं पर भाजपा की तरफ से आलोचनात्मक टिप्पणियों की लंबी फेहरिस्त रही है. कई मौके पर पीएम मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने भी राहुल गांधी पर देश की छवि खराब करने के आरोप लगाये हैं.
पिछले महीने नरेंद्र मोदी ने एक निजी चैनल के कार्यक्रम में कहा था कि जब दुनिया 'नई व्यवस्था' की तलाश कर रही है, तब कुछ लोग 'अव्यवस्था' का सपना देख रहे हैं और भारत की वैश्विक छवि को ख़राब करना चाहते हैं. हाल के दिनों में कई मौके पर बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन, राहुल गांधी पर विदेश से संचालित देश विरोधी ताकतों के टूल किट के रूप में काम करने के आरोप लगाये हैं. प्रधानमंत्री ने 31 अक्तूबर को गुजरात के एकता नगर में राष्ट्रीय एकता दिवस कार्यक्रम पर लोगों को संबोधित किया था. इसमें मोदी ने 'देश को बांटने की साज़िश करने वाली ताक़तों' का ज़िक्र करते कहा, "हमें पहचानना होगा कि विदेश में कौन किससे छिपकर मिल रहा है, भारत-विरोधी ताक़तें किसका समर्थन कर रही हैं और कौन भारत के दुश्मनों की भाषा बोल रहा है. हमें इन तरीक़ों को पहचानना होगा. हमें एकजुट होकर इनका सामना करना होगा."
संकेत साफ हैं कि इन आरोपों को सुनते-सहते राहुल ने पीएम मोदी को खुली बहस की चुनौती देने का जो टाइम और टोन चुना, वह पीएम मोदी और बीजेपी के पाले में गेंद डालने जैसी है. एक नवंबर को दिल्ली में विपक्ष की रैली में राहुल गांधी ने रामलीला मैदान से कहा था, "देश को सही रास्ते पर लाने के लिए पहला कदम ज्ञानेश कुमार को हटाना है. ज्ञानेश कुमार के बाद अब वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ भी खड़े होंगे..”
सोमवार, 2 नवंबर को राहुल गांधी ने आरोप लगाया, “ मोदी विदेशी मदद से प्रधानमंत्री बने और विदेशी मदद से ही इस पद पर बने हुए हैं. आपकी आर्थिक व्यवस्था पूरी तरह विदेशियों के नियंत्रण में और समर्थन से है.” इसके साथ ही उन्होंने पीएम मोदी को बहस की चुनौती दी. इसके अगले दिन, तीन नवंबर को राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक वीडियो में वही चुनौती दोहराई और कहा, "24 घंटे हो गए मोदी जी. मैंने आपको चैलेंज दिया है. आप कहते हो कि विपक्ष देशद्रोही है. किसी भी स्टेज पर आप जगह चुनिए, मेरे साथ डिबेट कीजिए. देशद्रोही कौन है? विदेशी फोर्सेस का कनेक्शन किसका है और किस तरह का कनेक्शन है? जल्दी से जल्दी कीजिए, डरिए मत."
चुनाव आयुक्त के इस्तीफे को लेकर
एसआइआर की प्रक्रिया पर उठते सवालों के बीच मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर राहुल गांधी के तेवर लगातार तल्ख हैं. उन्होंने राजनीतिक बहस में ‘वोट चोरी’ का एक नैरेटिव भी सेट कर दिया है. इन सवालों पर जारी विरोध प्रदर्शनों को लेकर भी वे बीजेपी के निशाने पर रहे हैं. भारतीय जनता पार्टी चुनाव आयोग का बचाव करती रही है और राहुल गांधी और विपक्ष पर लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमज़ोर करने का आरोप लगाती है. चुनाव आयोग के खिलाफ चल रहे आंदोलनों को विदेशी फंडिग के आरोप भी लगाये जाते रहे हैं.
जाहिर तौर पर सरकार और भाजपा दोनों दबाव में दिखती है. साथ ही राहुल गांधी, नरेंद्र मोदी के ‘पॉलिटिकल राइवल’ हैं. यह दीगर बात है कि बीजेपी राजनीतिक पटल पर इस तरह का माहौल तैयार करती रही है कि राहुल गांधी एक नॉन सीरियस नेता हैं. और वे जिन आरोपों, सवालों को उठाते रहे हैं, वे सिर्फ राजनीतिक स्टंट के हिस्से हैं. तो क्या राहुल गांधी वाकई में नॉन सीरियस नेता हैं.
क्या यह सच नहीं है कि राहुल जिन सवालों पर मुखर रहे हैं और केंद्र सरकार की नीति, निर्णय को लेकर वे अड़ते हैं, वह भाजपा और केंद्र सरकार दोनों को परेशान करते हैं. दूसरा- इंडिया गठबंधन की रैलियों, मार्च, बैठकें यह संदेश दे रही है कि राहुल गांधी गठबंधन के बीच स्वीकार्य लीडर के तौर पर उभरने की कोशिशों में जुटे हैं. पहले बीजेपी के लिए राहुल गांधी को विपक्ष का चेहरा बने रहना फायदेमंद माना जाता था, लेकिन अब इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि तस्वीर बदल रही है. अलबत्ता एक नवंबर की विपक्ष के मार्च और रामलीला मैदान में सभा को लेकर बीजेपी के नेता जुटी भीड़ पर सवाल खड़ा करना उनकी अंदर की बेचैनी बयां करती हैं. तभी तो इंडिया गठबंधन की रैलियों और चुनाव आयोग के खिलाफ विपक्ष के हमलों के जवाब में बीजेपी ने "लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ" अभियान शुरू किया है.
वैसे, बीजेपी चुनावों को लेकर रणनीतिक तौर पर फोकस्ड पार्टी रही है. चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग और विपक्ष के वोट चोरी के नैरटिव के बीच भी भाजपा उत्तर प्रदेश, पंजाब में होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर अपनी मुहिम पर धार चढ़ाने में जुटी है. एक नवंबर को इंडिया गठबंधन के मार्च के दिन दिल्ली, पंजाब, हरियाणा में अलग-अलग कार्यक्रम करके बीजेपी ने इस तारीख़ के इतिहास को 1984 के सिख विरोधी दंगों की शुरूआत से जोड़ने की जो कोशिश की, इसी रणनीति का हिस्सा हो सकता है.
