- अब तक अपने लॉजिक का भी कोई ठोस जवाब नहीं दिया
- डीएफओ के बचाव में उतरे पीसीसीएफ के पास सबूत ही नहीं
Ranchi : वन विभाग की कथनी और करनी में शुरू से काफी अंतर रहा है. विभाग के कई अफसरों का विवादों से गहरा नाता भी रहा है. पूर्व पीसीसीएफ एके रस्तोगी बोकारो में सहारा इंडिया की 70 एकड़ जमीन मामले में जांच की जद में हैं. वहीं वर्तमान पीसीसीएफ संजय श्रीवास्तव अपने कनीय अधिकारी डीएफओ आरएन मिश्र को बचाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे. मामला हाईप्रोफाइल है. एनपीटीसी ने 100 एकड़ से अधिक वन भूमि में अवैध खनन कर ली है. शुभम संदेश अखबार इसका परत-दर परत राज खोल रहा है. पेश से है ब्यूरो प्रमुख प्रवीण कुमार की रिर्पोट...
वन विभाग के अफसरों ने ऐसे किया खेला
एनटीपीसी के पंकरी बरवाडीह कोल परियोजना (हजारीबाग) में किए गये अवैध खनन का दोषी वन विभाग किसी को नहीं मानता. सुप्रीम कोर्ट के 6 जून 2022 को मेसर्स बालासोर अलॉयज लिमिटेड बनाम ओडिशा राज्य मामले में सुनवाई करते हुए जस्टिस शाह ने अपने आदेश में कहा था कि "फॉरेस्ट क्लीयरेंस के आवेदन लंबित हैं तो इसे फॉरेस्ट क्लीयरेंस नहीं माना जा सकता, अगर फॉरेस्ट क्लीयरेंस के आदेश के बिना खुदाई की जाती है तो वह अवैध है. लेकिन वन विभाग इस आदेश से भी ऊपर है. तत्कालीन डीएफओ आरएन मिश्रा ने वन संरक्षक, प्रादेशिक अंचल हज़ारीबाग़ को जो रिपोर्ट भेजी थी, उसमें एनटीपीसी को फ़ॉरेस्ट क्लीयरेंस की शर्तों में संशोधन की अनुशंसा कर दी. दुमुहाना नाला (नदी) को नष्ट कर सौ एकड़ में अवैध खनन के दोषियों को बचाने के लिए तत्कालीन डीएफओ आरएन मिश्रा ने एनटीपीसी के दिए पक्ष के अनुसार रिपोर्ट को बदल दिया. उसके बाद भी अवैध खनन होता रहा और वन विभाग के आला अफसर मामले की लीपापोती करते रहे.
पीसीसीएफ ने जो तर्क दिया, उसका सबूत भी पेश नहीं किया
इस मामले में हजारीबाग के तत्कालीन डीएफओ आरएन मिश्रा के पक्ष में मुख्य वन संरक्षक (सतर्कता) की रिपोर्ट के आधार पर प्रधान मुख्य वन संरक्षक (हॉफ) ने अपर मुख्य सचिव, वन पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग को जो रिपोर्ट भेजी, उसके कंडिका तीन में कहा है कि आरएन मिश्रा द्वारा यह भी स्पष्ट किया गया है कि इस मामले में दुमुहानी नाला का यह स्थल अधिसूचित वन भूमि नहीं है. अतः इस मामले में सीधे-सीधे भारतीय वन अधिनियम 1927 के अन्तर्गत वनवाद नहीं किया जा सकता है. जबकि आरएन मिश्रा ने उक्त खनन स्थल अधिसूचित वन भूमि अंतर्गत नहीं है या उसके बाहर है. जिसका कोई प्रमाणिक साक्ष्य नहीं दिया है. साथ ही आरएन मिश्रा द्वारा यह भी स्पष्ट किया गया कि भारतीय वन अधिनियम 1927 के तहत वनवाद नहीं किया जा सकता है तथा उनके द्वारा कृत कार्रवाई वन संरक्षण अधिनियम की पुस्तिका एवं वन संरक्षण नियम 2003 नियम एवं दिशा-निर्देश दिनांक 28.03.2019 का हवाला दिया है, लेकिन उससे संबंधित कोई साक्ष्य नहीं दिया गया. जिससे यह साबित हो सके कि फॉरेस्ट क्लीयरेंस की शर्तों का उल्लंघन करने पर वन अधिनियम के तहत कार्रवाई नहीं हो सकता. इस तथ्य का जिक्र प्रधान मुख्य वन संरक्षक ने बिना कोई दस्तावेज लगाए आरएन मिश्रा के पक्ष में दलील कैसे और क्यों किया ? यह अपने आप में बड़ा सवाल है.
अवैध खनन पर पर्दा डालने के लिए रिर्पोट ही बदल दी
पीसीसीएफ ने आरोपी डीएफओ आरएन मिश्रा के पक्ष में राज्य सरकार को जो रिपोर्ट सौंपी है, उसमें एक रिपोर्ट को बदल कर दूसरी रिपोर्ट बनाने का कारण वन संरक्षक, प्रादेशिक अंचल हजारीबाग के द्वारा आरएन मिश्रा को एनटीपीसी का पक्ष अंकित कर दूसरा रिपोर्ट मांगने को बताया गया. लेकिन मुख्य वन संरक्षक (सतर्कता) और पीसीसीएफ ने यह नहीं देखा कि जब वन संरक्षक ने डीएफओ से प्रयोक्ता अभिकरण का पक्ष अंकित करने को कहा था न कि कार्रवाई की बिंदु पर अनुशंसा करने को कहा गया था. जिसका निर्णय भारत सरकार लेती है. इसके अलावे आरएन मिश्रा ने दूसरा रिपोर्ट वन संरक्षक प्रादेशिक अंचल हज़ारीबाग को भेजा, उसमें उनके द्वारा पूर्व में वन संरक्षक प्रादेशिक अंचल, हज़ारीबाग को भेजे रिपोर्ट और वन संरक्षक, प्रादेशिक अंचल हजारीबाग के कार्यालय द्वारा एनटीपीसी के पक्ष के साथ रिपोर्ट मांगा गया था, उसका जिक्र दूसरी रिपोर्ट में क्यों नहीं किया ? इस बिंदु पर मुख्य वन संरक्षक(सतर्कता) और पीसीसीएफ द्वारा जांच नहीं किया गया और इसको नजरअंदाज क्यों किया गया ?
जांच अधिकारी की अनुशंसा को डीएफओ ने अपनी रिपोर्ट में छुपाया
पीसीसीएफ ने आरोपी डीएफओ आरएन मिश्रा के पक्ष में राज्य सरकार को जो रिपोर्ट सौंपी है, उसमें अविनाश कुमार परमार और शैलेन्द्र सिंह की जांच रिपोर्ट पर मार्च 2022 को पश्चिमी वन प्रमंडल पदाधिकारी को भेजे गए विभागीय जांच रिपोर्ट की कंडिका दो में यह लिखा था कि प्रयोक्ता एजेंसी द्वारा एफसी एक्ट की धारा 3ए एवं 3 बी के तहत कार्रवाई की जा सकती है, लेकिन आरएन मिश्रा ने इस तथ्य को छुपा दिया था. इस बिंदु को भी जांच में नहीं लाया गया.
डीएफओ ने तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया
तत्कालीन डीएफओ आरएन मिश्रा ने वन संरक्षक, प्रादेशिक अंचल को भेजे पहली रिपोर्ट में बनाए गए नामजद आरोपियों को एफसी एक्ट की धारा 3 ए और 3 बी से बचाने के लिए अपनी दूसरी रिपोर्ट में झारखंड सरकार के जल संसाधन विभाग का हवाला दिया था. जबकि उसी पत्र में यह स्पष्ट किया गया था कि यह पत्र तभी प्रभावी होगा, जब पत्र में उल्लेखित चार शर्तों का पालन कर लिया जाएगा. लेकिन आरएन मिश्रा ने उस पत्र की शर्त संख्या (फोर) का उल्लेख करते हुए दोषियों को बचाने का रिपोर्ट बना दिया, लेकिन उसी अनुमति पत्र की शर्त संख्या (वन ) और (टू ) में लगाए गए शर्तों को आरोपियों से मिलीभगत कर छुपा लिया, जिसका पालन नहीं किया गया था और उसे विरोधाभाषी तथ्य-आदेश बताते हुए दोषियों को बचाने की रिपोर्ट बनायी है. डीएफओ ने दोषियों को बचाने के लिए झारखंड सरकार के जल संसाधन के उपरोक्त अनुमति का गलत व्याख्या किया और अपने पद का दुरुपयोग करते हुए दोषियों को लाभ पहुंचाया. पीसीसीएफ़ की तरफ से डीएफओ को क्लीन चिट दिया गया. इसके अलावे आरएन मिश्रा ने वन संरक्षक, प्रादेशिक अंचल हज़ारीबाग़ को परियोजना सन्निहित जंगल झाड़ी भूमि झारखंड सरकार के राजस्व निबंधन एवं भूमि सुधार विभाग द्वारा विमुक्त हुआ या नहीं के मंतव्य के संबंध में विमुक्त होना बताया गया, लेकिन उसी गजट नोटिफिकेशन की शर्त संख्या-14 में प्रयोक्ता एजेंसी द्वारा सार्वजनिक, उपयोग के लिए जमीन, जल स्रोत, श्मशान आदि को प्रभावित नहीं करने एवं उसका विकास स्वयं के खर्चे से करने की शर्त लगायी गयी थी. जबकि शर्त के विपरीत प्रयोक्ता अभिकरण द्वारा दुमुहानी नाला जिसकी औसत चौड़ाई 20 मीटर और 3.1 किलोमीटर लंबाई में अवैध खनन कर दिया गया. जिसकी पुष्टि जांच में हो चुकी है और इस तथ्य को आरएन मिश्रा द्वारा जानबूझ कर छुपा दिया गया है. ताकि आरोपियों को लाभ मिले. [wpse_comments_template]
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