Lagatar Desk
अंग्रेजी दैनिक हिन्दुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट से केंद्र सरकार के अधिकारी और अर्द्धसैनिक बलों के अधिकारियों की चिंता बढ़ गई है. रिपोर्ट का शीर्षक है- "मीडिया को जानकारी लीक करने वाले सरकारी अधिकारियों पर आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम के तहत कार्रवाई हो सकती है." नई दिल्ली डेटलाइन से सुनेत्रा चौधरी के नाम से यह खबर प्रकाशित किया गया है. वरिष्ठ पत्रकार व टिप्पणीकार संजय कुमार सिंह ने इसे अनुवाद किया है. Lagatar ने उनके सोशल मीडिया एकाउंट से साभार लिया है. हिन्दी में आप भी पढ़ें पूरी रिपोर्ट...
नई दिल्ली : केंद्र सरकार ने अधिकारियों को चेतावनी दी है कि मीडिया के साथ क्लासिफाइड सेंसिटिव (विशेष संवेदनशील) जानकारी शेयर करने पर ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट (ओएसए) के तहत कार्रवाई हो सकती है. पिछले महीने गृह मंत्रालय ने सभी मंत्रालयों और विभागों के सचिवों को एक नोट भेजा. इसके जरिए 28 साल पहले के एक सर्कुलर को अपडेट किया गया है. इसमें ओएसए के तहत कार्रवाई की धमकी भी शामिल थी. मामले से परिचित लोगों ने हिन्दुस्तान टाइम्स को नोट के कंटेंट के बारे में बताया. सर्कुलर में बताया गया है कि यह “अनधिकृत या अनचाहे तत्वों को संवेदनशील जानकारी लीक करने की घटनाओं में वृद्धि के कारण है. इससे देश के हित और सुरक्षा को खतरा होने के साथ-साथ सरकार के लिए शर्मिंदगी का कारण बनने की संभावना थी.”
सर्कुलर में “मीडिया (वालों) के साथ किसी भी अनाधिकार बातचीत” को भी टारगेट किया गया है और कहा गया है कि ऐसा किया जाए तो “उचित कार्रवाई” की जानी चाहिए. स्पष्ट है कि यह नियम अधिकृत प्रवक्ताओं पर लागू नहीं होता है. अपने अधिकृत कार्य के दौरान उन्हें जो जानकारी होती है और दस्तावेज मिलते हैं, उन्हें सुरक्षित रखना, “सभी सरकारी कर्मचारियों का कर्तव्य है.” ऊपर बताए गए लोगों में से एक ने नाम न बताने की शर्त पर कहा- “मीडिया के साथ बिना इजाज़त किसी भी तरह के संचार (कम्युनिकेशन के लिए बातचीत ना करने लेकिन ईमेल से स्कैन कॉपी भेजने पर भी कार्रवाई होगी. भले ही यह बिना बातचीत किये दी जाए. इसका मकसद डराने के साथ-साथ अथाह अधिकार हासिल कर लेना है, ताकि किसी को कभी भी किसी तरह फंसाया जा सके) पर उपयुक्त कार्रवाई होनी चाहिए. यही नहीं, कोई भी क्लासिफाइड / सेंसिटिव जानकारी शेयर करने पर ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट के तहत कड़ी कार्रवाई करने पर विचार किया जाना चाहिए.
हिन्दुस्तान टाइम्स को पता चला है कि तीन पेज का यह सर्कुलर अर्धसैनिक बलों के प्रमुख को भी भेजा गया था. हिन्दुस्तान टाइम्स ने पीआईबी और गृह मंत्रालय के प्रवक्ता से बात करने की कोशिश की, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. इस नोट से ब्यूरोक्रेटिक सर्कल में भृकुटियां तन गई हैं, क्योंकि यह दिसंबर 1998 के ओरिजिनल वर्जन से अलग है. वह मोटे तौर पर एक एडवाइज़री जैसा था और उसमें ओएसए का कोई जिक्र नहीं था. 18 साल के अंतर पर, इनमें जो बात कॉमन है, वह है सरकार के अंदर से हाल ही में हुई लीक का जिक्र. यह बहुत साफ़ नहीं है कि किस खास लीक की वजह से यह नोट आया, जिसे जनवरी के दूसरे हफ़्ते में सर्कुलेट किया गया था.
सर्कुलर में कहा गया है- “यह दोहराया जाता है कि सरकारी कर्मचारी की तरफ से ऐसी गलती केंद्रीय सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1964 के नियम-II का साफ उल्लंघन है.
ऊपर बताए गए व्यक्ति के अनुसार, सेंट्रल सिविल सर्विसेज़ कंडक्ट रूल्स के रूल-II में कहा गया है- “कोई भी सरकारी कर्मचारी, सरकार के किसी आम या खास आदेश के अलावा या उसे सौंपे गए काम को अच्छी नीयत से पूरा करने के अलावा सीधे या परोक्ष तरीके से कोई भी ऑफिशियल डॉक्यूमेंट या उसका कोई हिस्सा या जानकारी किसी ऐसे सरकारी कर्मचारी या किसी ऐसे दूसरे व्यक्ति को नहीं देगा जिसे वह ऐसा डॉक्यूमेंट या जानकारी देने के लिए अधिकृत नहीं है.
ऊपर जिन लोगों का ज़िक्र किया गया है, उनके मुताबिक सरकारी नोट में अधिकारियों से कहा गया है कि वे पत्रकारों के किसी भी सवाल को प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (पीआईबी) को भेजें या जवाब देने से पहले सेक्रेटरी की इजाज़त लें. इसमें यह भी कहा गया है कि अधिकारी मीडिया के साथ बातचीत के लिए सरकारी ऑफिस में एक खास जगह तय कर सकते हैं.
नोट के कंटेंट से वाकिफ एक दूसरे व्यक्ति ने भी अपना नाम न बताने की शर्त पर कहा कि यह मीडिया की भूमिका को मानता है और मानता है कि “सरकार के कामकाज के बारे में सोच बनाने में इसकी अहम भूमिका है, लेकिन यह भी चेतावनी देता है कि “अनाअधिकृत सरकारी कर्मचारियों द्वारा कई मीडिया प्लेटफॉर्म पर जानकारी/गलत जानकारी को तेजी से और बिना वेरिफ़ाई किए फैलाने से रोकने की ज़रूरत है.” (इस सरकार ने पीआईबी को यह नया काम दे रखा है जो चुनाव आयोग से लेकर गलगोटिया तक के मामले मे सरकारी अधिकारी और सरकार के काम का बचाव करता रहता है.)
एचटी ने शनिवार को बताया था कि शुक्रवार की कैबिनेट मीटिंग में इस बात पर चर्चा हुई कि “सत्ता में बैठे लोगों के लिए किताबें या यादें लिखने से पहले 20 साल का कूलिंग ऑफ पीरियड हो सकता है, जो पूर्व आर्मी चीफ जनरल मनोज नरवणे की अप्रकाशित यादें ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ से पैदा हुए विवाद का नतीजा हो सकता है. अगस्त 2020 में पूर्वी लद्दाख में भारत-चीन सैनिक टकराव के दौरान सबसे नाजुक पलों में से एक पर उनके दावों ने पार्लियामेंट के बजट सेशन के पहले आधे हिस्से में हंगामा मचा दिया था.
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