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चाईबासा : कृषि कार्य की सृष्टि का पर्व है करम, झारखंड में है इसकी अलग पहचान

करम पर्व पर विशेष : झारखंड की जनजातीय पर्व त्योहार भारतीय समाज की अमूल्य संपदा है. प्राचीन काल से ही यहां के भूमिपुत्रों ने अपनी अविरल भाषा-संस्कृति एवं पर्व त्योहार से पूरे विश्व को सदा प्रभावित करते आए हैं. इस प्रकार जनजातियों के जीवन में पर्व त्योहार एक अभिन्न अंग है, जिसके कारण साल भर यहां कई पर्व त्योहार मानये जाते हैं. वृहद झारखंड प्रदेश में करम पर्व यहां की जनजातियों का सबसे बड़ा पर्व है. यह प्रति वर्ष भाद्र महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाया जाता है. ज्ञात हो कि इसकी शुरुआत जाउआ उठाने के बाद से मानी जाती है. इसे भी पढ़ें : भारत">https://lagatar.in/america-is-worried-by-the-allegations-made-by-prime-minister-of-canada-on-india-antony-blinken/">भारत

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बारी पूजा के सांकराइत से ही जाउआ गीत व करम नाच हुई शुरू

इसके अलावा ग्रामांचलों में मान्यता है कि बारी पूजा के सांकराइत से ही जाउआ गीत एवं करम नाच की शुरुआत हो जाती है. व्यापक अर्थ में देखें तो ‘करम‘ को काम कहते हैं, परन्तु मूल परिभाषा को टटोलें तो करम समाज के लिए किया गया महान काम को करम कहा गया है. जहां काम से अपनी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति की जाती है. वहीं, करम से समाज, राष्ट्र और सम्पूर्ण विश्व को लाभ होता है. करम पर्व की आदिमता एवं शुरुआत कब हुई है, इसका कोई लिखित प्रमाण नहीं है, परन्तु मौखिक तौर पर इससे संबद्ध समुदायों में मान्यता है कि जब से यहां के भूमि पूत्रों ने धान की खोज की, तब से यह पर्व पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानांतरित होता आया है. इसके कारण ही इस पर्व के मूल संवाहक कुड़मी सह अन्य आदिवासी जनगोष्ठी में इसे सृजन पर्व के रुप में मान्यता प्राप्त है. इसे भी पढ़ें : ईडी">https://lagatar.in/security-arrangements-increased-near-ed-office/">ईडी

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कुंवारी लड़कियां विशेष रूप से करती हैं यह पर्व

इस पर्व को विशेष रूप से कुंवारी लड़कियां ही करती हैं. साथ ही गांव के बच्चे-बूढ़े, महिला-पुरुष की महत्वपूर्ण भागीदारी होती है. गांव की बुजुर्ग महिलाओं द्वारा छोटी-छोटी बच्चियों को जाउआ उठाने का नियम एवं पालन करने की भी सीख दी जाती है. इस पर्व में इन बच्चियों को जाउआ माय के नाम से पुकारते हैं. यहां पर इतनी छोटी सी लड़की को जाउआ माय क्यों कहा गया? साधारणतः जो स्त्री बच्चे को जन्म देती है उसे ही मां का दर्जा प्राप्त होता है. लेकिन यहां कुंवारी लड़कियों को माय कहने की वजह क्या है. मालूम हो कि झारखंड के आदिवासी की कोई भी रस्म, पर्व-त्योहार आदि करने के पीछे युक्ति, तर्क, धर्म एवं ईमान की भावना होती है. करम पर्व में भी इन सारी बातों का ध्यान रखा गया है. इसे भी पढ़ें : उद्घाटन">https://lagatar.in/mmchs-new-building-not-handed-over-even-after-10-months-of-inauguration/">उद्घाटन

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बीजों की पहचान लड़कियों ने किया

यह पर्व उस समय प्रारंभ हुआ होगा जिस समय यहां के भूमिपुत्र शिकार युग से कृषि युग में पदार्पण किये होंगे एवं विभिन्न प्रकार के बीजों की पहचान हुई होगी. जनजाति समाज में प्रचलित है कि सर्वप्रथम इन सभी की पहचान नदी किनारे बालू में खेलते हुए लड़कियों ने ही किया है. जब कुछ दिन बाद पुनः उस जगह पर जाने पर देखते हैं कि वहां उस दाने में सुन्दर पौधे उग आए हैं, तो वे खुशी के मारे झूम उठे. तदोपरांत उसे देख-देख कर चारों ओर घूमने लगे. उसी स्थान पर कुछेक दिनों में फल निकल पड़ता है. उसे खाकर उन्हें पेट की पीड़ा से छुटकारा मिलता है. इस प्रकार कालांतर में शिकार एवं पशुपालन के अलावा कृषि का प्रारंभ हुआ. इसे भी पढ़ें : किरीबुरू">https://lagatar.in/kiriburu-naxalites-are-trying-to-re-establish-their-foothold-in-saranda-top-leaders-are-searching-for-old-comrades/">किरीबुरू

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महिलाएं प्रकृति के अनुसार ही बच्चों को देती थीं जन्म

इसके अलावा ग्रामांचलों में उस समय आज की तरह महिला को मां बनने के लिए आधुनिक तकनीक नहीं था. वे प्रकृति के अनुसार ही अपने बच्चों को जन्म देती थीं. लड़की विवाह के बाद मां बनने में किसी तरह की असुविधा न हो, इसलिए एक गर्भवती महिला के लिए जितना कठोर नियम का पालन करना पड़ता है, उसी तरह करम पर्व में भी एक मां बनने के लिए कठोर नियमों का पालन करना होता है. इस कठोरता पालन करने वाली लड़कियों को सांचि जाउआ उठाने का विधान है. सांचि जाउआ के अलावे बहिरा जाउआ, बागाल जाउआ, बन जाउआ एवं जाहिरा जाउआ भी होता है, जिसका अपना-अपना नेगाचार है. इसे भी पढ़ें : लैंड">https://lagatar.in/seven-news-of-piparwar-including-threat-to-the-existence-of-the-pond-due-to-land-sliding/">लैंड

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नौ दिनों का होता है करम पर्व

करम पर्व मुख्यतः नौ दिन का होता है, परन्तु कहीं-कहीं सात दिन का जाउआ उठाया जाता है. एक बांस की बनी टुपा (टोकरी) में नदी का बालू डालकर नौ प्रकार के दलहनों का बीजारोपण किया जाता है. क्रमशः सांचि जाउआ के बाद ही अन्य जाउआ उठाने की परंपरा रही है. प्रतिदिन सुबह जाउआ माय आखड़ा में जाउआ बेड़हा करती है. इस जाउआ बेड़हा में विशेष प्रकार का गीत व नृत्य होता है, जो सिर्फ इसी परब में गायी एवं नाची जाती है. जनजातीय संस्कृति में करम परब को कृषि सृजन परब कहा गया है. सुभाष चंद्र महतो, सहायक प्राध्यापक, कुड़माली, जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग, कोल्हान विश्वविद्यालय, चाईबासा [wpse_comments_template]

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