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चाईबासा : कोई भी राजनीतिक पार्टी मूल भावना के अनुरूप नियोजन नीति का निर्धारण नहीं कर पाई : सिंकु

[caption id="attachment_540828" align="aligncenter" width="600"]https://lagatar.in/wp-content/uploads/2023/01/Chaibasa-Sanni-Sinku.jpg"

alt="" width="600" height="577" /> सन्नी सिंकु.[/caption] Chaibasa (Sukesh Kumar) : झारखंड के लिए नियोजन नीति और स्थानीय नीति राजनीतिक एजेंडा बनकर रह गया है. राज्य के सत्ता पर राज करने वाला कोई राजनीतिक दल 22 वर्षों में झारखंड की मूल भावना के अनुरूप नियोजन नीति का निर्धारण नहीं कर सका. यह प्रतिक्रिया झारखंड पुनरूत्थान अभियान के संयोजक सन्नी सिंकु ने झारखंड सरकार द्वारा विधानसभा से पारित 1932 की खतियान आधारित नियोजन नीति विधेयक को राज्यपाल द्वारा वापस करने पर दी है. ऐसा लगता है कि झारखंड राजनीतिक प्रयोगशाला का केंद्र बन गया है. जहां सभी राजनीतिक दल अपने-अपने मतदाताओं को लुभाने योग्य नियोजन नीति का निर्धारण करने पर केंद्रित है. इसे भी पढ़ेंभारत">https://lagatar.in/aim-bharat-jodo-yatra-was-to-connect-people-end-hatred-rajesh-thakur/">भारत

जोड़ो यात्रा का लक्ष्य लोगों को जोड़ना व नफरत खत्म करना था – राजेश ठाकुर

झारखंड अलग राज्य की मूल भावना पूरी तरह से पीछे रह गया

झारखंड अलग राज्य की मूल भावना पूरी तरह से पीछे रह गया है. मरांग गोमके, जयपाल सिंह मुंडा के सपनों वाली झारखंड के अनुरूप न तो नियोजन नीति का निर्धारण हो पाया और न ही झारखंड की भाषा संस्कृति और परंपरा को सरकार संरक्षित और संवर्द्धित कर रही है. न जाने झारखंड सरकार और भारतीय प्रशासनिक पदाधिकारीगण क्यों ऐसे नियोजन नीति का प्रारूप तैयार करते हैं जो बार-बार कोर्ट में चुनौती दी जाती है और सरकार के वकील उस प्रारूप को वैधानिक ठहराने में विफल साबित होते हैं. जिससे झारखंड की नियोजन नीति बार-बार रद्द की जाती है. जिसका सबसे अधिक नुकसान 22 वर्षों में शिक्षित बेरोजगारों को हुआ है. चाहे 2002 की नियोजन नीति की बात करें या 2015 की नियोजन नीति जो कोर्ट में खारिज की जाती रही है. इसे भी पढ़ेंधनबाद">https://lagatar.in/dhanbad-married-woman-committed-suicide-by-hanging-herself-in-munidihs-gopinathdih/">धनबाद

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झारखंड के लोग एक बार फिर हुए निराश

अब फिर झारखंड सरकार द्वारा पारित 1932 की खतियान आधारित विधेयक को राज्यपाल ने समीक्षा के लिए सरकार को वापस कर दिया. जिससे फिर एक बार झारखंडियों को निराशा ही हुई है. न जाने राज्य को किन उपनिवेशवादियों का नजर लग गया. जो अंग्रेजों से भी अधिक तीक्ष्ण है. अब तो लगता है झारखंड सरकार को आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के तर्ज पर अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष उपबंध के तहत राष्ट्रपति के आदेश द्वारा साम्यपूर्ण नियोजन नीति का निर्धारण करना अपेक्षित होगा. जिससे झारखंड राज्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए राज्य के विभिन्न भागों के लोगों के लिए लोक नियोजन के विषय में और शिक्षा के विषय में अवसरों और सुविधाओं का भिन्न-भिन्न उपबंध कर सकेंगे. [wpse_comments_template]

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