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चाकुलिया : खेमाशुली स्टेशन- कभी नक्सली उड़ाते थे रेलवे ट्रैक, आज सामाजिक संगठन करते हैं ट्रैक जाम

Chakulai : झारखंड सीमा से सटे पश्चिम बंगाल का "खेमाशुली" स्टेशन देश के चर्चित स्टेशनों में शुमार हो गया है. साल जंगलों के बीच और राष्ट्रीय उच्च पथ संख्या 49 के करीब स्थित इस स्टेशन के आसपास कभी नक्सली रेलवे ट्रैक उड़ाते थे और ट्रेनों पर फायरिंग करते थे. आज इस स्टेशन पर विभिन्न सामाजिक संगठनों के लोग अपनी मांगों को लेकर रेलवे ट्रैक जाम करते हैं. 28 मई 2010 की रात खेमाशुली और सरडीहा स्टेशन के बीच नक्सलियों ने रेलवे ट्रैक उड़ाई थी और ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस दुर्घटनाग्रस्त हुई थी.148 यात्रियों की मौत हुई थी और 200 यात्री घायल हुए थे. 20 सितंबर 2022 से कुड़मी समाज के लोगों ने खेमाशुली स्टेशन पर "रेल छेंका" आंदोलन के तहत पांच दिनों तक रेलवे ट्रैक और हाईवे जाम रखा था. 400 ट्रेनें रद्द हुई थीं. कुल मिलाकर यह स्टेशन विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक संगठनों के लिए चक्का जाम करने के लिए सबसे सुगम स्टेशन बन गया है. यानी कि अपनी मांगों को सरकार से मनवाने के लिए रेल चक्का जाम करना है तो खेमाशुली स्टेशन चले आएं. इसे भी पढ़ें : रांची">https://lagatar.in/ranchi-girls-body-found-hanging-from-tree-in-guthia-forest-police-engaged-in-investigation/">रांची

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2012 के पूर्व नक्सलियों का था दबदबा

[caption id="attachment_553240" align="aligncenter" width="600"]https://lagatar.in/wp-content/uploads/2023/02/Khemshuli-Naxali.jpg"

alt="" width="600" height="400" /> 28 मई 2010 को नक्सली घटना का फाइल फोटो.[/caption] 2012 के पूर्व तक इस इलाके में नक्सलियों का दबदबा था. झाड़ग्राम से लेकर खेमाशुली तक नक्सली ट्रेनों को अपना निशाना बनाते थे. राजधानी एक्सप्रेस समेत कई ट्रेनों पर नक्सलियों ने फायरिंग की थी. नक्सलियों के कारण ही रेलवे प्रशासन को ट्रेनों की रफ्तार धीमी करनी पड़ी थी. 28 मई 2010 की रात नक्सलियों द्वारा उड़ायी गई रेल लाइन के कारण अप ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस बेपटरी होकर डाउन लाइन पर मालगाड़ी से टकराई थी. छह डब्बों के परखच्चे उड़ गए थे और 148 यात्रियों के मौत हो गई थी. 200 यात्री जख्मी हुए थे. इस हृदय विदारक घटना ने हर किसी को झकझोर कर रख दिया था. इसे भी पढ़ें : रांची">https://lagatar.in/ranchi-girls-body-found-hanging-from-tree-in-guthia-forest-police-engaged-in-investigation/">रांची

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ज्ञानेश्वरी कांड नक्सलियों के लिए अभिशाप साबित हुआ

ज्ञानेश्वरी कांड नक्सलियों के लिए अभिशाप साबित हुआ और धीरे-धीरे नक्सली संगठन सीपीआई माओवादी का प्रभाव कम होने लगा. घटना में शामिल कई बड़े नक्सली पकड़े गए. वर्ष 2012 तक इस इलाके से नक्सलियों का प्रभाव खत्म हो गया. नक्सलियों के मास्टरमाइंड अग्रणी नेता किशन जी भी पुलिस के साथ हुई बुढ़ीझोर जंगल में एक मुठभेड़ में मारे गए. नक्सलियों का प्रभाव कम होते ही इस स्टेशन पर विभिन्न सामाजिक संगठनों द्वारा अपनी मांगों को लेकर रेल चक्का जाम करने का दौर शुरू हुआ. इसे भी पढ़ें : पूर्णिया">https://lagatar.in/purnia-temperature-dropped-due-to-westerly-wind-increased-cold/">पूर्णिया

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10 साल से सामाजिक व राजनीतिक संगठन कर रहे रेल चक्का जाम

[caption id="attachment_553243" align="aligncenter" width="600"]https://lagatar.in/wp-content/uploads/2023/02/Khemshuli-Naxali-2.jpg"

alt="" width="600" height="400" /> कुड़मियों द्वारा रेलवे ट्रैक जाम का फाइल फोटो.[/caption] पिछले 10 साल के दौरान विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक संगठनों द्वारा खेमाशुली स्टेशन पर आंदोलन कर कई बार रेलवे ट्रैक को जाम किया गया. खासकर आदिवासी संगठनों और कुड़मी संगठनों ने कई मौकों पर रेलवे ट्रैक जाम किया. इस स्टेशन पर कुड़मी संगठन द्वारा विगत 20 सितंबर से पांच दिनों तक किए गए रेलवे ट्रैक जाम के कारण 400 ट्रेनों को रद्द करना पड़ा था. संगठन के लोगों ने स्टेशन से सटे हाईवे को भी जाम कर दिया था और 25 किलोमीटर तक वाहनों की कतार खड़ी हो गई थी. इस स्टेशन पर किया गया यह सबसे बड़ा आंदोलन था. इसे भी पढ़ें : कौन">https://lagatar.in/which-policy-is-needed-encounter-in-deoghar/">कौन

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आदिवासी सेंगल अभियान ने किया रेलवे ट्रैक जाम

[caption id="attachment_553238" align="aligncenter" width="600"]https://lagatar.in/wp-content/uploads/2023/02/KHEMASHOLI-JAM-3.jpg"

alt="" width="600" height="400" /> आदिवासी सेंगेल अभियान द्वारा जाम किया गया रेलवे ट्रैक (फाइल फोटो).[/caption] 12 फरवरी की सुबह अपनी विभिन्न मांगों को लेकर आदिवासी सेंगल अभियान के तहत सैकड़ों लोगों ने खेमाशुली स्टेशन पर 3 घंटे तक रेलवे ट्रैक को जाम रखा. इसके कारण कई ट्रेनों को रद्द करना पड़ा और कई ट्रेनों को मार्ग बदल कर चलाना पड़ा. रेल पुलिस को आंदोलनकारियों को समझा बुझाकर हटाने में कड़ी मशक्कत करनी पड़ी. [wpse_comments_template]

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