
बैजनाथ मिश्र
अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावा चोरी से दुनिया भर के सनातनी आहत हैं. यह चोरी उन महानुभावों की मौजूदगी या निगरानी के बावजूद हुई है जिनकी निष्ठा और ईमानदारी पर किसी को शक नहीं था. यदि शक होता तो उन्हें राम जन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में रखा ही क्यों जाता. बावजूद इसके चोरी हुई है तो जवाबदेही तय होनी चाहिए.
सरकार कह रही है कि कोई भी दोषी बचेगा नहीं. एसआईटी जांच कर रही है. आठ लोग गिरफ्तार किये जा चुके हैं. किसी के घर से नोटों की गड्डियां मिल रही हैं तो कहीं सोना-चांदी और उनके जेवर. इस चोरी के आरोपितों की जमीन जायदाद की भी पड़ताल हो रही है. लेकिन कोई यह नहीं बता पा रहा है कि यह चोरी कब से चल रही थी.
मीडिया की खबरों के विश्लेषण से ऐसा लगता है कि बचाने और फंसाने का खेल भी चल रहा है. टीवी चैनलों की बहसों से ऐसा लगता है कि सरकार जांच की लीपापोती में लगी है. कुछ दूरंदेशी लोग चंदा चोरी में मुख्यमंत्री आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी घसीट रहे हैं. लेकिन ट्रस्ट के कर्णधारों ने अब तक यह साफ नहीं किया है कि चढ़ावे की गिनती और उसे बैंक में जमा कराने के जो नियम पहले बने थे, उन्हें किसके दबाव में किसके सहयोग से बदला गया और क्यों?
पहले इस काम में लगे लोगों की मंदिर में घुसने और निकलते समय तलाशी ली जाती थी. इससे ये लोग खुद को अपमानित महसूस करने लगे. वे कहने लगे कि उनकी निष्ठा और ईमानदारी पर सवाल उठाया जा रहा है. उनकी कातर पुकार से ट्रस्ट के अधिकारी द्रवित हो गये और तलाशी कार्यक्रम बंद हो गया.
ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविंद गिरि कह रहे हैं कि वह दो-तीन महीने में अयोध्या जाते थे और बैलेंस सीट जानते-समझते थे. नोट और चढ़ावा गिनने-रखने की ड्यूटी उनकी नहीं थी. वह तो देशभर में घूमते रहते हैं, प्रवचन करते रहते हैं और अपनी ज्ञान गंगा में श्रद्धलुओं को डुबकी लगवाते रहते हैं. उन्होंने यह भी स्वीकार किया है कि चढ़ावे की देखरेख का जिम्मा ट्रस्ट के बंधुओं का था. लेकिन ये बंधु थे कौन? चंपत राय, अनिल मिश्र और गोपाल राव या कोई अन्य भी?
बहरहाल, छह जुलाई को संपन्न हुई ट्रस्ट की बैठक में महासचिव चंपत राय और अनिल मिश्र का इस्तीफा मंजूर कर लिया गया है. इन दोनों ने चंदे पर चपत की खबर पसरते ही नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दे दिया था. गोपाल राव को हटा दिया गया है. ट्रस्टियों ने चंपत राय की जगह कृष्ण मोहन को अंतरिम महासचिव नियुक्त कर दिया है. कृष्ण मोहन भी ट्रस्ट के सदस्य हैं. उन्हें सितंबर 2025 में कामेश्वर चौपाल के निधन के बाद ट्रस्ट का सदस्य बनाया गया था.
इस बदलाव से ऐसा लगता है कि ट्रस्ट की नजर में चढ़ावे पर चपत चंपत राय की लापरवाही की वजह से ही लगी है. उनकी हैसियत इतनी थी कि मंदिर क्षेत्र में उनकी मर्जी के बगैर कुछ हो ही नहीं सकता था. संभव है कि गिरफ्तार लोग उनकी पसंद के हों और उनसे गहरे संबंधों के कारण उन्हें किसी ने रोका-टोका न हो.
संभव यह भी है कि उन्होंने तलाशी प्रक्रिया के खिलाफ करुण क्रंदन किया हो और चंपत राय ने पसीज कर तलाशी पर रोक लगवा दी हो. यह सब निष्पक्ष जांच के बाद ही प्रकाश में आएगा. लेकिन इतना तय है कि चढ़ावे पर चपत की जवाबदेही से चंपत राय चंपत नहीं हो सकते.
आरोप है कि उन्होंने नियम के बदले सिस्टम की अनदेखी की और अपने चेले चपाटियों को लूट की छूट दे दी. इसी को कहते हैं क्रिमिनल निगलेंसी. हालांकि अभी प्रमाण के साथ यह नहीं कहा जा सकता कि चंपत राय की भी उस चोरी में हिस्सेदारी थी. हो सकता है कि वह निर्दोष हों और चोरों ने उनकी भलमनसाहत का फायदा उठा लिया हो या उनके विश्वास का खून कर दिया हो.
लेकिन प्रभु राम के विधान में जब माता सीता को अग्नि परीक्षा देनी पड़ सकती है, एक नागरिक के संदेह करने पर गर्भावस्था में उनको जंगल भेजा जा सकता है तब राम की मर्यादा की रक्षा के लिए चंपत राय से पूछताछ क्यों नहीं हो सकती है और उन्हें अपने प्रियजनों की तरह कृष्ण की जन्म भूमि का दर्शन क्यों नहीं कराया जा सकता है? इसके लिए सबको एक साथ बैठाकर आमने-सामने पूछताछ होनी चाहिए. ऐसा नहीं हुआ तो संघ, विहिप और भाजपा पर मंडरा रहे संदेह के बादल छंटेंगे नहीं.
अंतरिम महासचिव कृष्ण मोहन ने स्पष्ट कर दिया है कि चोरों ने प्रबंधन की खामियों का फायदा उठाया है. यानी चंपत राय के इंतजाम में खामियां थीं. जांच कमेटी को यही जांचना है के ये खामियां जानबूझकर छोड़ दी गयीं थी या इस भरोसे में कि राम के कार्य में लगे लोग चोरी-चकारी नहीं करेंगे. लेकिन जेल में बंद आरोपित न गृहत्यागी हैं न जीवनदानी, वे वेतनभोगी थे और उनकी नीयत बदलते देर नहीं लगी. जब उन्हें यकीन हो गया कि न कोई जांच-पड़ताल है, न कोई रोक-टोक तो वे निरंकुश हो गये.
चंपत राय की लापरवाही या मिलीभगत से जन विश्वास को भारी धक्का लगा है और ट्रस्ट की विश्वसनीयता पर गहरी खरोंचें आयी हैं. ट्रस्ट की बैठक के बाद गोविंद गिरि ने जरूर अफवाहों का बाजार ठंडा कर दिया है. उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि चरण पादुका से लेकर स्वर्णांकित रामचरित मानस की प्रति सहित अट्ठाईस सौ वस्तुएं सुरक्षित हैं. उन्होंने पत्रकारों को कुछ वस्तुएं दिखायी भी.
बाईस जुलाई को ट्रस्ट की फिर बैठक होगी. तब तक एसआईटी की जांच रिपोर्ट की दूसरी किस्त भी आ जाएगी. उसके बाद ट्रस्ट कुछ नये निर्णय लेगा. लेकिन अभी तो उसका पहला दायित्व यही है कि राम-धन की चोरी का सिलसिला पूरी तरह बंद हो. संभव है इसके लिए किसी सक्षम समर्थ सीइओ की नियुक्ति की जाय. यह काम पहले ही होना चाहिए था, क्योंकि साधुओं-संन्यासियों को इतनी बड़ी व्यवस्था के संचालन और उसे संभालने की ट्रेनिंग नहीं दी जाती है. ज्ञानी, त्यागी होने और प्रोफेशनल होने में फर्क होता है. ट्रस्ट के सदस्य यहीं गच्चा खा गये.
आम तौर पर देखा गया है कि जब भी जन मानस को झकझोर देनेवाला अपराध होता है तो अपराधियों के पकड़े जाने से पहले और बाद में भी मनगढंत कहानियां खूब गढ़ी जाती है. इस प्रकरण में भी राजनीति, धर्म और संगठनों पर सवाल उठाये जा रहे हैं. अब तक विशिष्ट जानकारियों से परिपूर्ण अनेक खोजी कागजात सोशल मीडिया और चैनलों के जरिये परोसे जा चुके हैं.
चोरों ने चोरी करने में जितनी मेहनत की होगी या सतर्कता बरती हो, उससे अधिक परिश्रमी और मेघावी हमारे चैनल वाले हैं. उन्हें लग रहा है कि यही समय है अब भगवा ब्रिगेड को नंगा किया जा सकता है. पहले भी कई मंदिरों और उपासना स्थलों में चोरी की घटनाएं हो चुकी हैं, लेकिन राम के मंदिर में चोरी शर्मनाक हैं.
इस चोरी से उनकी भी छाती फटी जा रही है जो राम मंदिर निर्माण के प्रबल विरोधी थे. वे भी कातर स्वर में विलाप कर रहे हैं जिन्होंने रामभक्तों के खून से सरयू को लाल कर दिया था. वे भी बेजार हैं, जो मंदिर के स्थान पर शौचालय तक बनवाने का विकल्प दे रहे थे. जो अयोध्या में राम को घुसपैठिया बता रहे थे, वे भी अचानक रामवादी हो गये हैं.
मर्माहत वे भी हैं जो लगातार राम के अस्तित्व को ही नकारते रहे हैं. ऐसा इसलिए हुआ है कि राम धर्म से अधिक राजनीति का विषय हो गये हैं. एक पुराने राम विरोधी शिव मंदिर निर्माण में लगे हैं. उनके चेले कह रहे हैं कि राम भी शिव की आराधना करते थे. इसलिए राम की पूजा से श्रेयस्कर शिव की आराधना है. यह भी कि शिवजी ने ही उन्हें सपने में बताया कि राम मंदिर में चोरी हो रही है. तभी उन्होंने इस पर ट्वीट किया, फिर बयान दिया और संघियों की पोल खोल दी.
एक बड़े नेता को जन्म दिवस पर परशुराम के रूप में पेश कर दुग्धाभिषेक तक करा दिया गया. शायद यह सोचकर कि राम दो अक्षर के हैं परशुराम पांच अक्षर वाले हैं. 2027 में उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव है और ऐसा लग रहा है कि तब तक राम ही राजनीतिक विमर्श के केंद्र में रहेंगे. परिणाम क्या होगा, राम जानें. लेकिन तब तक राम ओढ़ना बिछौना और तकिया सब बनाये जाएंगे.
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