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चांडिल : विभिन्न नदी घाटों से जावा उठाकर बहनों ने दिया करम राजा काे निमंत्रण

Chandil (Dilip Kumar) : चांडिल अनुमंडल क्षेत्र में करम परब को लेकर उत्साह चरम पर है. रविवार को करम उपवास करने वाली बहनों ने नदी, जुडिया और पवित्र जलाशयों से करम पूजा को लेकर जावा उठाया और करम राजा को आमंत्रित किया. जावा उठाने के बाद कुंवारी बहने नाचते-गाते अखड़ा तक पहुंची और जावा को स्थापित किया. इसके साथ ही चारों दिशाओं में करम गीत गूंजने लगी. `आज तो रे करम राजा घरे दुवारे, घरे दुवारे. काइल तो रे करम राजा शांख नदीर पारें` जैसे गीतों से गांवों की गलियां गुंजायमान हैं. वहीं, बहने बांस की टोकरी में जावा लेकर गांव की गलियों में नृत्य करते हुए अखड़े तक पहुंची. [caption id="attachment_410726" align="aligncenter" width="600"]https://lagatar.in/wp-content/uploads/2022/09/karam-puja.jpeg"

alt="" width="600" height="400" /> जावा उठाती कन्याएं.[/caption] इसे भी पढ़े : चाईबासा">https://lagatar.in/chaibasa-gujarati-society-took-out-a-grand-procession-on-the-birth-anniversary-of-ramdev-pir-maharaj/">चाईबासा

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15 दिन पहले से ही पूजा की तैयारी हो जाती है शुरू

भाई-बहन का प्रेम अटूट रहे, अपने भाईयों की सभी मुरादें पूरी हो इसलिए बहने करम का उपवास करती है. इसके लिए करम पूजा के 15 दिन पहले से ही बहने इसकी तैयारी शुरू कर देती हैं. वैसे भादो शुरू होते ही करम पर्व की तैयारी प्रारंभ हो जाती है. वहीं, करम पूजा बुधवार छह सितंबर को पारंपरिक रीति-रिवाज के साथ की जाएगी. खेतों में काम समाप्त होने के बाद बहनें उत्साहित होकर व्रत करती हैं कि अब अनाज की कोई कमी नहीं होगी. वहीं, शादी-शुदा बहनें भी करम परब करने के लिए भाई के घर पहुंचती है. भादो में मनाए जाने वाले इस पर्व में बहनें भाई की लंबी उम्र की कामना करती हैं. चांडिल के साथ ही समस्त झारखंड में इस पर्व का खास महत्व है. इसे भी पढ़े : किरीबुरू">https://lagatar.in/kiriburu-teachers-day-celebrated-with-great-pomp-at-little-angel-school/">किरीबुरू

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जावा डाली में बोते हैं नौ प्रकार के अन्न

करम परब के लिए नदी घाटों से उठाए जाने वाले जावा डाली में नौ प्रकार के अन्न के बीज बोये जाते हैं. इनमें धान, गेंहू, मकई, जौ, चना, कुरथी, मूंग, उरद और बाजरा शामिल है. आदि काल से चली आ रही परंपरा के तहत वर्तमान समय में भी करम के सारे नियम बरकरार रखे गए हैं. कहते हैं कि धान की प्रधानता के साथ नौ अनाज ही मुख्य है. इसलिए जावा डाली में धान बीज को मध्य में डाला जाता है. ब्रह्मांड में नौ ग्रह प्रमुख है, नौ तक की संख्या में सभी अंक समा जाते हैं. नौ अनाज सारे अनाजों का प्रतिनिधित्व करते हैं. इसलिए करम परब के दौरान जावा डाली में नौ प्रकार के अन्न के बीज बोये जाते हैं. डाली में जिसका जावा अधिक बड़ा होता है यानि बोया गया बीज अंकुरित होकर जितना अधिक पौधा का रूप लेता है, उसे अधिक भाग्यशाली माना जाता है. इसे भी पढ़े : बंदगांव">https://lagatar.in/bandgaon-after-three-months-in-chatma-power-transformer-installed-with-the-help-of-mla/">बंदगांव

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कैसे मनाया जाता है करमा पर्व

उरांव समाज के लाया शुभराज उरांव  ने बताया कि भादो माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को कुंवारी कन्याएं नदी घाटों से जावा उठाकर करम राजा को आंमत्रित करती हैं. अमूमन करम पूजा के सात-पांच या दिन पहले जावा उठाया जाता है. इसके बाद जावा को स्थापित कर रोज जागरण किया जाता है. करम पूजा के दिन भाई जंगल जाकर करम डाली लाता है और अखड़ा में पारंपरिक रीति-रिवाज के साथ स्थापित करता है. उसी रात को करम राजा की पूजा की जाती है. युवतियां उपवास रखकर शाम को धान का पत्ता, झिंगाफूल से करम डाली के समक्ष जावा की आराधना करती हैं. मौके पर लाया, पाहन और पुजारी व्रतियों के साथ श्रद्धालुओं को करम-धरम की कथा सुनाते हैं. इसके बाद रात भर डाली को जगाया जाता है. इस दौरान ढोल-नगाड़ा के साथ करम गीतों पर लोग रात भर झूमते हैं. इसमें गांव के लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं. एकादशी के दूसरे दिन युवतियां नाचते-गाते नदी घाटों में जावा डाली का विसर्जन करती हैं. इसे भी पढ़े : ">https://lagatar.in/chaibasa-in-the-present-times-there-has-been-a-moral-decline-in-the-relationship-of-guru-disciple-dr-murari-lal/">

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पूजा-अर्चना के बाद खेत में गाड़ते है करम डाली

पूजा-अर्चना के बाद जहां जावा डाली को नदी घाटों में विसर्जन कर दिया जाता है, वहीं करम डाली को खेतों में और घर के मुख्य दरवाजे के किनारे गाड़ा जाता है. मान्यता है कि इससे फसल और मकान सुरक्षित रहता है और फसल की पैदावार भी अधिक होती है. दूसरी ओर कहा जाता है कि खेत में गाड़े जाने वाले करम डाली पर पक्षी बैठते हैं, जो खेत के कीट-पतंगों को अपना आहार बनाते हैं, जिससे फसल कीट-पतंगों से मुक्त रहता है. वैसे झारखंड के आदिवासी व मूलवासियों का हर पर्व-त्योहार कृषि से ही जुड़ा हुआ है. इसे भी पढ़े : सरायकेला">https://lagatar.in/seraikela-tomatoes-increased-by-rs-80-per-kg-prices-of-other-vegetables-also-increased/">सरायकेला

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