Chandil (Dilip Kumar) : चांडिल प्रखंड के चिलगु पुनर्वास स्थल के विस्थापित इन दिनों काफी परेशान और डरे-सहमे हैं. विस्थापित असमंजस की स्थिति में है कि कहीं फिर से उन्हें एक बार उजाड़ा तो नहीं जाएगा? बीते एक महीने से चिलगु पुनर्वास स्थल पर भूखंड का विवाद सुर्खियों में है. एक भूखंड के दो दावेदार सामने आए हैं, लेकिन अब तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि वास्तव में उक्त भूखंड है किसका. चांडिल अंचल के चिलगु पुनर्वास स्थल पर कुछ विस्थापितों ने घर और चारदीवारी का निर्माण किया है, जिसको लेकर चांडिल के अंचलाधिकारी ने तीन लोगों के नाम पर नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण और कागजात मांगा था. वहीं, 72 घंटे के भीतर कागजात नहीं दिखाने पर अंचलाधिकारी ने कार्रवाई करने की चेतावनी दी थी. इसे भी पढ़ें : Kiriburu">https://lagatar.in/kiriburu-survey-to-remove-problems-of-elephant-movement/">Kiriburu
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: गरीब परिवार का सहारा बने पूर्व विधायक कुणाल इसमें गैर मजरुआ, रैयत और वन विभाग की भूमि शामिल है. राजस्व अभिलेख में कुछ गड़बड़ी होने या नाम नहीं दर्ज होने पर वर्ष 1988-1989 में उसी भूखंड के कुछ हिस्से को कुछ गैर विस्थापित आदिवासियों को बंदोबस्ती पर दे दी. इसके कारण समय- समय पर विस्थापित और गैर विस्थापित आमने-सामने आ जाते हैं और उक्त भूखंड को लेकर अपना अपना दावा करते हैं. विगत वर्ष सेवानिवृत्त फौजी को भी चिलगु में जमीन बंदोबस्ती की गई थी. इसका विरोध विस्थापितों ने किया था. मामला कोर्ट भी पहुंचा था. इसके बाद सेवानिवृत्त फौजी की बंदोबस्ती रद्द कर दी गई थी. इस बीच दलमा वन्यप्राणी आश्रयणी वन विभाग के कर्मचारी भी चिलगु पुर्नवास स्थल का निरीक्षण कर रहे हैं और उसी भूखंड को वन विभाग की भूमि होने का अंदेशा जता रहे हैं. इसे भी पढ़ें : Adityapur">https://lagatar.in/adityapur-people-of-adityapur-muslim-colony-are-living-hellish-life/">Adityapur
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क्या है मामला
चांडिल अंचल के चिलगु में खाता संख्या 130, प्लॉट संख्या 578 में 69 एकड़ भूमि को वर्ष 1984 में तत्कालीन सिंहभूम जिले के उपायुक्त ने सुवर्णरेखा परियोजना को कार्य करने की अनुमति दी थी. उक्त 69 एकड़ भूखंड पर परियोजना द्वारा पुनर्वास स्थल निर्माण किया गया. वहां चांडिल डैम के विस्थापित परिवारों को आवासीय भूमि देने का प्रावधान किया गया है. परियोजना द्वारा जिला प्रशासन से चिलगु में कुल 148 एकड़ भूमि मांगी गयी थी, जिसपर तत्कालीन उपायुक्त ने 69 एकड़ भूमि पर कार्य करने की अनुमति दी थी, जो गैर मजरुआ सरकारी भूमि थी. इसके बाद विशेष भू-अर्जन द्वारा शेष 79 एकड़ भूमि अधिग्रहण किया गया है. इसे भी पढ़ें : Bahragora">https://lagatar.in/bahragora-former-mla-kunal-became-the-support-of-poor-family/">Bahragora: गरीब परिवार का सहारा बने पूर्व विधायक कुणाल इसमें गैर मजरुआ, रैयत और वन विभाग की भूमि शामिल है. राजस्व अभिलेख में कुछ गड़बड़ी होने या नाम नहीं दर्ज होने पर वर्ष 1988-1989 में उसी भूखंड के कुछ हिस्से को कुछ गैर विस्थापित आदिवासियों को बंदोबस्ती पर दे दी. इसके कारण समय- समय पर विस्थापित और गैर विस्थापित आमने-सामने आ जाते हैं और उक्त भूखंड को लेकर अपना अपना दावा करते हैं. विगत वर्ष सेवानिवृत्त फौजी को भी चिलगु में जमीन बंदोबस्ती की गई थी. इसका विरोध विस्थापितों ने किया था. मामला कोर्ट भी पहुंचा था. इसके बाद सेवानिवृत्त फौजी की बंदोबस्ती रद्द कर दी गई थी. इस बीच दलमा वन्यप्राणी आश्रयणी वन विभाग के कर्मचारी भी चिलगु पुर्नवास स्थल का निरीक्षण कर रहे हैं और उसी भूखंड को वन विभाग की भूमि होने का अंदेशा जता रहे हैं. इसे भी पढ़ें : Adityapur">https://lagatar.in/adityapur-people-of-adityapur-muslim-colony-are-living-hellish-life/">Adityapur
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आरोपियों ने दिया स्पष्टीकरण
चिलगु निवासी विस्थापित सह स्थानीय पत्रकार विश्वरूप पांडा ने चांडिल अंचलाधिकारी को लिखित रूप से स्पष्टीकरण दे दिया है. उन्होंने बताया कि उनके पिता निर्मल कुमार पांडा नीमडीह अंचल के कल्याणपुर गांव के विस्थापित हैं. उनके नाम पर विकास पुस्तिका निर्गत हुई है. विकास पुस्तिका के अनुसार साढ़े 12 डिसमिल आवासीय भूखंड देने का प्रावधान है. स्पष्टीकरण में यह भी कहा गया है कि जिस भूखंड को गैर मजरुआ सरकारी भूमि बताया गया है उसका सीमांकन सुवर्णरेखा परियोजना द्वारा किया गया है. अलग-अलग प्लॉट का डिजाइन तैयार किया गया है, जिसको आधार मानकर विस्थापित सदस्यों ने साढ़े 12 डिसमिल भूमि पर दखल किया है. आज तक कभी भी अंचल कार्यालय द्वारा निर्माण कार्य पर रोक लगाने या अन्य किसी तरह का नोटिस नहीं दिया गया है. इसे भी पढ़ें : वायनाड">https://lagatar.in/wayanad-landslide-rahul-gandhi-in-lok-sabha-said-government-should-declare-national-disaster/">वायनाडभूस्खलन : लोकसभा में राहुल गांधी ने कहा, सरकार राष्ट्रीय आपदा घोषित करे… इसके बावजूद यदि उक्त भूखंड गैर मजरुआ सरकारी भूमि प्रमाणित होता है और सुवर्णरेखा परियोजना द्वारा अपना दावा नहीं किया जाता हैं तो स्वयं उक्त भूमि को दखल मुक्त कर देने की बात कही है. वहीं, चिलगु निवासी विस्थापित सह आजसू पार्टी के प्रखंड अध्यक्ष दुर्योधन गोप ने अंचलाधिकारी को अपने स्पष्टीकरण में बताया है कि उक्त भूखंड से उनका कोई लेना-देना नहीं है. उनके द्वारा किसी तरह की घेराबंदी निर्माण या अवैध कब्जा नहीं किया गया है. अनंत गोप ने भी उनके द्वारा अवैध अतिक्रमण करने के आरोप को झूठा बताया है. पुनर्वास पदाधिकारी की नोटिस को लेकर सभी विस्थापित सदस्यों ने अपना-अपना स्पष्टीकरण सौंप दिया है. कई विस्थापित सदस्यों ने स्वीकार किया है कि उन्होंने पुनर्वासित भूखंड पर घर निर्माण किया है जो उनका अधिकार है. इसे भी पढ़ें : एअर">https://lagatar.in/400-people-were-brought-from-violence-hit-dhaka-to-delhi-by-air-india-and-indigo-aircraft/">एअर
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