Chandil (Dilip Kumar) : एक ओर जहां आदिवासी समुदाय में कला संस्कृति की परंपरा अनूठी है, वहीं शक्ति प्रदर्शन की परंपरा भी अनोखी
है. सेंदरा एक तरह से यह युद्धाभ्यास का प्रतीक
है. जिसमें पारंपरिक हथियारों के साथ जंगलों में रहने वाले जानवरों का शिकार किया जाता
है. वहीं गांव के नवयुवकों को युद्ध के तरीके व पारंपरिक हथियार चलाने के अलावा जंगलों में जानवरों के शिकार करने का प्रशिक्षण भी दिया जाता
है. ताकि लोगों के मन से डर हटे और दुश्मनों से
लड़ने का जज्बा कायम
रहे. युवाओं को आत्मरक्षा के गुर भी सिखाए जाते
हैं. इस दौरान शिकार करने के अलावा आदिवासी समाज अपनी अनूठी परंपरा का निर्वाह भी करते
हैं. शिकार के दौरान
ढोंगेड़ और वीर
सिंगराई नृत्य करने की भी परंपरा
है. मनोरंजन करना, वनभोज का आनंद लेना भी इसका दूसरा मकसद
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कोल डस्ट की सफाई के लिए लगाई गई स्वीपिंग मशीन, धमका कर हटवाया आदिवासी समाज में होता है तीन प्रकार का सेंदरा
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https://lagatar.in/wp-content/uploads/2023/04/Chandil-Sendra-1.jpg"
alt="" width="600" height="400" /> सेंदरा के लिए दलमा में चढ़ाई करते सेंदरा वीर. (फाइल फोटो)[/caption] झारखंड के जनजाति समुदाय में तीन तरह के सेंदरा यानि शिकार होते
है. इसमें 12 वर्ष में एक बार मनाई जाने वाली मुक्का सेंदरा यानि जनी शिकार, फागुन माह में होने वाली
फागु सेंदरा और चैत-वैशाख माह में मनाई जाने वाली
विशु सेंदरा शामिल
है. 12 वर्षों में एक बार मनाए जाने वाले जनी शिकार में जहां महिलाएं शिकार पर जाती हैं, वहीं
विशु सेंदरा में पुरुष शिकारी ही जंगल में शिकार करते
हैं. विशु सेंदरा के दौरान
बड़े इलाके में शिकार करना होता है, जिसमें गांव के पुरुष 15 दिनों तक जंगल में रहकर शिकार करने की परंपरा
है. इस वर्ष दलमा
पहाड़ में
विशु सेंदरा के लिए एक मई की तिथि निर्धारित की गई
है. आदिवासी समाज में इसको लेकर तैयारियां चरम पर
है. सेंदरा में झारखंड के अलावा पश्चिम बंगाल और
ओड़िशा के शिकारी पारंपरिक औजारों के साथ जंगल में प्रवेश करते
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: विभाग ने बीपीएम से मांगा स्पष्टीकरण, सिविल सर्जन ने कहा- की जाएगी ज़रूरी कार्रवाई कुत्तों को भी मिलता है बराबर हिस्सा
आदिवासी समाज में सामूहिकता व समानता एक महत्वपूर्ण बिंदू
है. शिकार सामूहिक रूप में किया जाता है और शिकार में मदद के लिए पालतू कुत्तों को भी लगाया जाता
है. सेंदरा के दौरान जंगल में जो खाने योग्य जानवर मिलते है उसका शिकार किया जाता
है. शिकार का बंटवारा हर व्यक्ति सहित साथ में गए कुत्ते के बीच में भी समान बंटवारा होता
है. अधिक शिकार करने वाले व्यक्ति को इनाम भी मिलता
है. वर्तमान में इस परंपरा का स्वरूप धीरे-धीरे बदल रहा
है. विशु शिकार अब 15 दिनों तक न होकर एक-दो दिन तक हो रहा
है. जंगलों में जानवर कम होने के कारण अब लोग जंगलों में जाकर चिंतन-मनन करते
हैं. प्राचीन काल से प्रारंभ
विशु सेंदरा जाने से पूर्व गांव के लोग हथियारों के साथ पूजा करते हैं और मन्नत मांगते हैं कि जंगल में अधिक शिकार मिले और किसी प्रकार की क्षति व जोखिम न
हो. [wpse_comments_template]
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