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चांडिल : धूमिल होती जा रही टुसू पर्व की परंपरा, गली मोहल्लों में नहीं सुनाई दे रहे टुसू गीत

Chandil (Dilip Kumar) : झारखंड के प्रमुख त्योहार टुसू की पुरानी परंपरा अब धीरे-धीरे धूमिल होती जा रही है. अगहन संक्रांति से क्षेत्र के चारों और ढोल-मांदर की ताल पर सुनाई देने वाले टुसू गीत अब सुनाई नहीं दे रहे हैं. खेत-खलिहानों में काम करने वाले महिला-पुरुष टुसू गीतों का आनंद लेते हुए काम करते थे. टोली में कहीं जाने वाले भी टुसू गीत गुनगुनाते हुए चलते थे. लेकिन अब कहीं ऐसा दिखाई व सुनाई नहीं दे रहा है. इसे युवाओं की आधुनिकता के रंग में ढलने का परिणाम कहें या सरकार की उदासीनता. एक ओर युवा हैं कि अपनी परंपरा को अपनाने के प्रति दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं. वहीं, दूसरी ओर हमारी सरकार है जो परंपरा को संरक्षित रखने में उदासीन रवैया अपना रही है. इसे भी पढ़ें :जमशेदपुर">https://lagatar.in/jamshedpur-lakhs-stolen-in-bagbeda-residence-of-police-posted-in-ranchi/">जमशेदपुर

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बांग्ला भाषा के साथ लुप्त होते गए टुसू गीतों के गीतकार

टुसू गीतों को संरक्षित रखने के लिए सरकार दिलचस्पी नहीं दिखा रही है. गीतकारों को प्रोत्साहित भी नहीं किया जा रहा है. राज्य में बांग्ला भाषा की पढ़ाई बंद होने के साथ बांग्ला भाषा से जुड़ी संस्कृति भी धूमिल होती चली गयी. दरअसल, टुसू गीत बांग्ला भाषा में ही लिखे जाते रहे हैं. सरकारी स्तर पर बांग्ला भाषा की पढ़ाई बंद होने के कारण गांव-देहातों में इस भाषा को पढ़ने-पढ़ाने वालों की संख्या दिन पर दिन घटती जा रही है. ऐसे में टुसू गीत के नए गीतकार उभरकर सामने नहीं आ रहे हैं और इसे गाने वाले भी कम होते जा रहे हैं. वहीं अब जो भी टुसू गीत बाजार में आ रहे हैं उसमें भी आधुनिकता साफ झलकती है. इसे भी पढ़ें :चक्रधरपुर">https://lagatar.in/chakradharpur-theater-artist-late-in-chandmari-dramas-staged-on-the-death-anniversary-of-shivratan-devi/">चक्रधरपुर

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खुशहाली का प्रतीक के रूप में मनाया जाता है टुसू 

टुसू पर्व झारखंड की संस्कृति के पोषक स्वरूप है, जिसमें टुसू गीत, नृत्य, वाद्य यंत्रों की मधुर संगीत है. इसमें एक विशेष प्रकार की रस्म है, एक विशेष प्रकार की मान्यता है. इसमें ही नए वस्त्र पहनने का विशेष महत्व है. परिवार के सभी लोगों के लिए नए कपड़े लेने का रिवाज है. इस प्रकार यह पर्व धार्मिक विश्वास, पारंपरिक मान्यता, नए वर्ष के आगमन, अच्छे फसल की प्राप्ति और खुशहाली के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है. झारखंड के सभी पर्व, त्योहार प्रकृति और खेती-किसानी से जुड़े हुए हैं. इसलिए झारखंड के रीति-रिवाज व पारंपरिक पर्व-त्योहार अनोख हैं. राज्य के प्रमुख पर्व-त्योहारों में एक है मकर संक्रांति के अवसर पर मनाया जाने वाला टुसू परब. टुसू परब विशुद्ध रूप से कृषि से जुड़ा नारी शक्ति के सम्मान व स्वाभिमान के रूप में मनाया जाता है. टुसू पर्व एक महीने तक मनाए जाने वाला पर्व है. इसे झारखंड के सभी एसटी, एससी व ओबीसी सभी आपस में मिल-जुलकर पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं. इसे भी पढ़ें :चक्रधरपुर">https://lagatar.in/chakradharpur-congress-kamgar-nagar-vice-president-distributed-blankets-among-the-elderly/">चक्रधरपुर

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महीने भर तक मनाया जाता टुसू 

टुसू पर्व की शुरुआत अगहन संक्रांति से होती है. इस दिन टुसू की स्थापना की जाती है. इसी दिन से प्रतिदिन शाम को कुंवारी कन्याएं फूल देकर टुसू की आराधना करने के साथ टुसू गीत गाती है. इस दौरान प्रत्येक आठ दिनों में टुसू का महाभोग लगाया जाता है. इस महाभोग को आठ कलाइ कहा जाता है. पूस माह के अंतिम सप्ताह में मकर संक्रांति के दिन ही इस त्योहार का समापन टुसू भाषाण यानि टुसू के विसर्जन के साथ होता है. टुसू को आकर्षक रूप से सजी पालकी रूपी चौड़ल में घर से निकाल कर बहते पानी में विदा कर दिया जाता है, ताकि धान किसी स्थान पर किनारे लग फिर से पौधा बन किसी के पेट भरने का साधन बन सके. टुसू पर्व कृषि वर्ष का अंतिम त्योहार होता है. मकर संक्रांति के दिन टुसू का विसर्जन करने के बाद इसके दूसरे दिन आखाइन जातरा के रूप में नए साल का शुभारंभ होता है. इस दिन से किसान फिर से कृषि कार्य में जुट जाते हैं. इसे भी पढ़ें :जमशेदपुर">https://lagatar.in/jamshedpur-on-the-instructions-of-kolhan-dig-raid-of-excise-department-in-adityapur-sapda/">जमशेदपुर

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