Chandil (Dilip Kumar) : रहिन पर्व झारखंड के लगभग सभी जनजातियां बड़े ही उत्साह और उल्लास के साथ मनाते हैं. रहिन यानी नष्ट होने से बचा रह जाना. इस दिन खेतों में पहला बीजारोपण करने की परंपरा है. रहिन जनजातीय संस्कृति को धरा पर प्रतिष्ठित करने का एक महापर्व है जो जेठ महीने के 13वें दिन से आरंभ हो सात दिनों तक मनाया जाता है. इस वर्ष 28 मई रविवार को रहिन पर्व मनाया जाएगा. रहिन दिन की शुरूआत पौ फटने से पहले ही घरों एवं चहारदीवारी के चारों और गोबर की लकीर से रहिन की धाइर-बेढ़ि देकर की जाती है. यह काम घर के बाकी लोगों के जगने से पूर्व ही महिलाएं कर लेती हैं. इसकी धारणा ऐसी है कि सोकर उठने पर रहिन दाग को लांघ कर बाहर निकलने से उस दिन से घर के लोगों पर किसी दुर्घटना का प्रकोप नहीं हो सकता है. इसे भी पढ़ें : चाईबासा">https://lagatar.in/chaibasa-completion-of-ten-day-pig-farming-training-at-pnb-rseti/">चाईबासा
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शुरू होगा कृषि कार्य
किसानों का कृषि से संबंधित मूल काम काज इसी दिन से अनवरत चलना शुरू हो जाता है. प्रकृति की वंदना, बीजारोपण करना, संपूर्ण खेतों की पहली जोत, खेतों में गोबर डालना, वर्षा आवाहनी, जांत-गित गायन, विषैले जीवों से रक्षा के लिए मंत्र-अध्ययन, पशुओं को रहिन दाग देना और घर बांधना आदि अनेक विशिष्ट आदिम परंपराएं इसी दिन संपन्न व आरंभ किए जाते हैं. सुबह घर का मुखिया या उनका बड़ा पुत्र स्नान कर नौ मुट्ठी धान निकालकर गुंड़ी सिंदूर लगाए गए टोकरी या कांसे के पात्र में भर कर उसे सिर पर रखकर दूसरे हाथ में एक कुदाल लेकर मौन धारण करके अपने खेत जाता है. वहां पहले से जोते हुए खेत के भंडार कोण में भूमि को प्रणाम करके कुदाल से खोद कर क्यारी बनाता है और अढ़ाई मुट्ठी धान डालकर उसपर मिट्ठी से ढंक देता है. बाकी बचा धान अपने बैलों को खिला देता है और टोकरी में थोड़ी मिट्टी लेकर पुनः मौन स्वरूप घर लौटता है. घर में अपने भुतपिंढ़ा पर मिट्टी चढ़ाता है और पूजा-अर्चना करता है. इसे भी पढ़ें : धनबाद:">https://lagatar.in/dhanbad-go-to-two-and-a-half-lakh-houses-and-tell-the-achievements-of-the-modi-government-gyanranjan-sinha/">धनबाद:ढ़ाई लाख घरों में जा कर मोदी सरकार की उपलब्धि बताएं : ज्ञानरंजन सिन्हा
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