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चांडिल : सेनापति जिरपा लाया के शहादत दिवस पर दी गई श्रद्धांजलि

Chandil (Dilip Kumar) : आजादी के आंदोलन में ब्रिटिश हुकुमत के खिलाफ चांडिल अनुमंडल और इससे सटे क्षेत्र में भी कई ऐतिहासिक विद्रोह हुए. इस क्षेत्र में जल, जंगल व जमीन पर अधिकार जमाते ब्रिटिश हुकुमत के खिलाफ पहला संगठित विद्रोह था भूमिज विद्रोह. पारंपरिक व्यवस्था को तार-तारकर अपना हुकुमत जमाते ब्रिटिश सरकार के खिलाफ वीर शहीद गंगानारायण सिंह के नेतृत्व में भूमिज विद्रोह हुआ था. ब्रिटिश हुकूमत के अन्यायपूर्ण शासन प्रथा के विरोध में भूमिज विद्रोह का आरंभ नीमडीह प्रखंड स्थित बांधडीह गांव से शुरू हुआ था, जो पूरे जंगल महल में फैल गया था. उस सेनावाहिनी का मुख्य सेनापति वीर पराक्रमी जीरपा लाया (जीलपा लाया) थे, जिन्होंने अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए थे. अंग्रेजी हुकुमत को जीरपा लाया से इतना खौफ था कि उसे जिंदा या मुर्दा पकड़ने के लिए एक हजार रुपये का इनाम रखा था. इसे भी पढ़ें :बिहार">https://lagatar.in/politics-intensifies-from-bihar-to-delhi-jitan-ram-manjhi-will-meet-amit-shah/">बिहार

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रण कौशल में निपुण थे जिरपा लाया

जीरपा बचपन से ही साहसी और पराक्रमी थे. उन्हें पारंपरिक हथियार चलाने में महारथ हासिल थी. भूमिज विद्रोह के नेतृत्वकर्ता गंगा नारायण सिंह ने 1832-33 में जंगल महल में पांच हजार लोगों का सेनावाहिनी गठन किया था. उन्होंने ने अपने सेनावाहिनी के मुख्य सेनापति जीरपा लाया को नियुक्त किया था. इस संग्राम में जीरपा लाया के युद्व कौशल व सैन्य संचालन से अंग्रेजी फौज भयभीत था. सेनावाहिनी दल एक रणनीति के तहत ब्रिटिश फौज पर बरसात के मौसम में हमला करते थे. विपरीत मौसम में अंग्रेजी सेना मोटर वाहन का इस्तेमाल नहीं कर पाती थी. ऐसे में जीरपा लाया के नेतृत्व में सेनावाहिनी के सदस्य पहाड़, नदी, जंगल को लांघते हुए अंग्रेजी सेना को मार गिराते थे और छावनी से बंदूक, राशन सामग्री समेत अन्य सामान लूट लेते थे. इसे भी पढ़ें :बहरागोड़ा">https://lagatar.in/bahragoda-daylight-robbery-of-sand-at-nagudsai-panipada-ghat/">बहरागोड़ा

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जिस दिन पकड़ा उसी दिन दे दी फांसी

आजादी के आंदोलन के सेनानी जीरपा लाया का जन्म तत्कालीन जंगल महल व वर्तमान के नीमडीह प्रखंड के बाड़ेदा गांव में तीन जून 1774 को हुआ था. इनकी मां का नाम तरुलता सिंह व पिता का नाम पेंड़ाई सिंह लाया था, जो बाड़ेदा मौजा के पारंपरिक पुजारी थे. जीरपा लाया से आजिज ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें जिंदा या मुर्दा पकड़ने के लिए एक हजार रुपये का इनाम तय कर दिया था. ब्रिटिश सेना ने कुटनीति के तहत 13 अप्रैल 1833 को पश्चिम बंगाल के बेड़ादा गांव से जीरपा लाया को गिरफ्तार कर लिया. ब्रिटिश अफसरों को जीरपा लाया से इतना खौफ था कि उन्हें उसी दिन बेड़ादा गांव के बरगद पेड़ पर फांसी दे दी. इसे भी पढ़ें :चाईबासा">https://lagatar.in/chaibasa-police-seized-nine-bikes-in-vehicle-investigation/">चाईबासा

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