alt="" width="500" height="600" /> निशांत कुमार[/caption] वहीं द्वितीय 3 वर्ष के लिए निर्धारित उम्र सीमा 8 वर्ष से 11 वर्ष है. तृतीय 3 वर्ष के लिए निर्धारित सीमा 11 वर्ष से 14 वर्ष की गई है. तो वही चौथा और अंतिम 4 वर्ष के लिए 14 से 18 वर्ष की आयु निर्धारित किया गया है. उपरोक्त नीति स्कूली शिक्षा के लिए निर्धारित है. इसमें शुरू के 3 वर्ष आंगनबाड़ी या प्री स्कूलिंग शिक्षा शामिल होगी. इस नीति से ये फायदा होगा कि इसकी सहायता से वैसे लोग जो किसी कारणवश बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं, वो दोबारा अपनी पढ़ाई फिर से शुरू कर सकते हैं. विश्वविद्यालय स्तरीय शिक्षा में विषयों के चयन को लेकर भी छात्र अपनी मर्जी से दो विषयों की पढ़ाई एक साथ कर सकते हैं. पहले की शिक्षा नीति में स्नातक शिक्षा पूरी करने के बाद प्रमाण पत्र दिया जाता था, जो अब प्रति वर्ष दिया जा सकेगा. यह वंचित क्षेत्रों और समूहों के लिए बेहतर विकल्प है. जिसके तहत पारिवारिक समस्याओं और जिम्मेवारी का वहन करने वाले लोग भी अपनी शिक्षा ग्रहण कर सकेंगे. इस नीति का मुख्य उद्देश्य NEP के माध्यम से भारत को वैश्विक ज्ञान की महाशक्ति बनाना है. इस शिक्षा नीति में कुछ कमियां भी हैं. निजी विद्यालय के छात्र सरकारी विद्यालय या संस्थागत विद्यालय के छात्रों की तुलना में जल्दी अंग्रेजी सीखना शुरू कर देंगे. जबकि संस्थागत विद्यालय के छात्रों के लिए पढ़ाई का माध्यम क्षेत्रीय भाषा में पढ़ाई करने की वजह से समाज मे उन छात्रों की संख्या में लगातार वृद्धि होती चली जायेगी, जो अंग्रेजी में बात करने में असहज महसूस करते हैं. NEP 2020 के अनुसार अगर कोई छात्र स्नातक की पढ़ाई पूरी करन चाहते हैं तो उन्हें 4 वर्ष का पाठ्यक्रम पूरा करना होगा. जबकि दूसरी ओर 2 वर्ष का पाठ्यक्रम पूरा करने पर डिप्लोमा का भी प्रावधान निर्धारित किया गया है. इस वजह से पढ़ाई को बीच में ही छोड़ने की प्रवृति को बढ़ावा मिलेगा. भारत मे एक समस्याग्रस्त छात्र व शिक्षक का अनुपात है. इस वजह से शैक्षणिक संस्थानों में प्रत्येक विषय के लिए मातृभाषा से शुरू करना भी एक बड़ी समस्या है. पहले की नीति के अनुसार अगर कोई पोस्ट ग्रेजुएट करना चाहता था तो 3 साल की बैचलर डिग्री करने के बाद ही वो पोस्ट ग्रेजुएट में नामांकन करवा सकता था. लेकिन अब नए शिक्षा नीति के अनुसार उन्हें 4 वर्ष की डिग्री लेनी होगी. [wpse_comments_template]
नई शिक्षा नीति से आया बदलाव : निशांत कुमार
Koderma: नई शिक्षा नीति पर काफी चर्चा हो रही है. हर किसी की अपनी राय है. शिक्षाविद अपने विचार से इसके फायदे और नुकसान बताने में लगे हैं. इसमें शिक्षाविद निशांत कुमार के अपने विचार हैं. उनका कहना है कि 21वीं सदी की पहली शिक्षा नीति को शिक्षा नीति 2020 के रूप में मान्यता दी गई. यह नीति 29 जुलाई 2020 को लागू कर दी गई. इस नए शिक्षा नीति ने भारतीय इतिहास में शिक्षा के क्षेत्र में विशिष्ट बदलाव लाया है. पहले की शिक्षा नीति में 10+2 के तर्ज पर पढाई होती थी. जिसे बदल कर प्रथम 5 वर्ष के लिए निर्धारित उम्र सीमा 3 वर्ष से 8 वर्ष कर दिया गया है. [caption id="attachment_352435" align="aligncenter" width="500"]
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alt="" width="500" height="600" /> निशांत कुमार[/caption] वहीं द्वितीय 3 वर्ष के लिए निर्धारित उम्र सीमा 8 वर्ष से 11 वर्ष है. तृतीय 3 वर्ष के लिए निर्धारित सीमा 11 वर्ष से 14 वर्ष की गई है. तो वही चौथा और अंतिम 4 वर्ष के लिए 14 से 18 वर्ष की आयु निर्धारित किया गया है. उपरोक्त नीति स्कूली शिक्षा के लिए निर्धारित है. इसमें शुरू के 3 वर्ष आंगनबाड़ी या प्री स्कूलिंग शिक्षा शामिल होगी. इस नीति से ये फायदा होगा कि इसकी सहायता से वैसे लोग जो किसी कारणवश बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं, वो दोबारा अपनी पढ़ाई फिर से शुरू कर सकते हैं. विश्वविद्यालय स्तरीय शिक्षा में विषयों के चयन को लेकर भी छात्र अपनी मर्जी से दो विषयों की पढ़ाई एक साथ कर सकते हैं. पहले की शिक्षा नीति में स्नातक शिक्षा पूरी करने के बाद प्रमाण पत्र दिया जाता था, जो अब प्रति वर्ष दिया जा सकेगा. यह वंचित क्षेत्रों और समूहों के लिए बेहतर विकल्प है. जिसके तहत पारिवारिक समस्याओं और जिम्मेवारी का वहन करने वाले लोग भी अपनी शिक्षा ग्रहण कर सकेंगे. इस नीति का मुख्य उद्देश्य NEP के माध्यम से भारत को वैश्विक ज्ञान की महाशक्ति बनाना है. इस शिक्षा नीति में कुछ कमियां भी हैं. निजी विद्यालय के छात्र सरकारी विद्यालय या संस्थागत विद्यालय के छात्रों की तुलना में जल्दी अंग्रेजी सीखना शुरू कर देंगे. जबकि संस्थागत विद्यालय के छात्रों के लिए पढ़ाई का माध्यम क्षेत्रीय भाषा में पढ़ाई करने की वजह से समाज मे उन छात्रों की संख्या में लगातार वृद्धि होती चली जायेगी, जो अंग्रेजी में बात करने में असहज महसूस करते हैं. NEP 2020 के अनुसार अगर कोई छात्र स्नातक की पढ़ाई पूरी करन चाहते हैं तो उन्हें 4 वर्ष का पाठ्यक्रम पूरा करना होगा. जबकि दूसरी ओर 2 वर्ष का पाठ्यक्रम पूरा करने पर डिप्लोमा का भी प्रावधान निर्धारित किया गया है. इस वजह से पढ़ाई को बीच में ही छोड़ने की प्रवृति को बढ़ावा मिलेगा. भारत मे एक समस्याग्रस्त छात्र व शिक्षक का अनुपात है. इस वजह से शैक्षणिक संस्थानों में प्रत्येक विषय के लिए मातृभाषा से शुरू करना भी एक बड़ी समस्या है. पहले की नीति के अनुसार अगर कोई पोस्ट ग्रेजुएट करना चाहता था तो 3 साल की बैचलर डिग्री करने के बाद ही वो पोस्ट ग्रेजुएट में नामांकन करवा सकता था. लेकिन अब नए शिक्षा नीति के अनुसार उन्हें 4 वर्ष की डिग्री लेनी होगी. [wpse_comments_template]
alt="" width="500" height="600" /> निशांत कुमार[/caption] वहीं द्वितीय 3 वर्ष के लिए निर्धारित उम्र सीमा 8 वर्ष से 11 वर्ष है. तृतीय 3 वर्ष के लिए निर्धारित सीमा 11 वर्ष से 14 वर्ष की गई है. तो वही चौथा और अंतिम 4 वर्ष के लिए 14 से 18 वर्ष की आयु निर्धारित किया गया है. उपरोक्त नीति स्कूली शिक्षा के लिए निर्धारित है. इसमें शुरू के 3 वर्ष आंगनबाड़ी या प्री स्कूलिंग शिक्षा शामिल होगी. इस नीति से ये फायदा होगा कि इसकी सहायता से वैसे लोग जो किसी कारणवश बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं, वो दोबारा अपनी पढ़ाई फिर से शुरू कर सकते हैं. विश्वविद्यालय स्तरीय शिक्षा में विषयों के चयन को लेकर भी छात्र अपनी मर्जी से दो विषयों की पढ़ाई एक साथ कर सकते हैं. पहले की शिक्षा नीति में स्नातक शिक्षा पूरी करने के बाद प्रमाण पत्र दिया जाता था, जो अब प्रति वर्ष दिया जा सकेगा. यह वंचित क्षेत्रों और समूहों के लिए बेहतर विकल्प है. जिसके तहत पारिवारिक समस्याओं और जिम्मेवारी का वहन करने वाले लोग भी अपनी शिक्षा ग्रहण कर सकेंगे. इस नीति का मुख्य उद्देश्य NEP के माध्यम से भारत को वैश्विक ज्ञान की महाशक्ति बनाना है. इस शिक्षा नीति में कुछ कमियां भी हैं. निजी विद्यालय के छात्र सरकारी विद्यालय या संस्थागत विद्यालय के छात्रों की तुलना में जल्दी अंग्रेजी सीखना शुरू कर देंगे. जबकि संस्थागत विद्यालय के छात्रों के लिए पढ़ाई का माध्यम क्षेत्रीय भाषा में पढ़ाई करने की वजह से समाज मे उन छात्रों की संख्या में लगातार वृद्धि होती चली जायेगी, जो अंग्रेजी में बात करने में असहज महसूस करते हैं. NEP 2020 के अनुसार अगर कोई छात्र स्नातक की पढ़ाई पूरी करन चाहते हैं तो उन्हें 4 वर्ष का पाठ्यक्रम पूरा करना होगा. जबकि दूसरी ओर 2 वर्ष का पाठ्यक्रम पूरा करने पर डिप्लोमा का भी प्रावधान निर्धारित किया गया है. इस वजह से पढ़ाई को बीच में ही छोड़ने की प्रवृति को बढ़ावा मिलेगा. भारत मे एक समस्याग्रस्त छात्र व शिक्षक का अनुपात है. इस वजह से शैक्षणिक संस्थानों में प्रत्येक विषय के लिए मातृभाषा से शुरू करना भी एक बड़ी समस्या है. पहले की नीति के अनुसार अगर कोई पोस्ट ग्रेजुएट करना चाहता था तो 3 साल की बैचलर डिग्री करने के बाद ही वो पोस्ट ग्रेजुएट में नामांकन करवा सकता था. लेकिन अब नए शिक्षा नीति के अनुसार उन्हें 4 वर्ष की डिग्री लेनी होगी. [wpse_comments_template]

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