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भारत में रोजगार के बदलते स्वरूप

Dr. Kaushlendra "Batohi" राज्यसभा में प्रधानमंत्री ने महामहिम राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बहस का जवाब देते हुए रोजगार एवं नौकरी के बीच अंतर के मुद्दे को उन्होंने उठाया. यह एक विचारणीय विषय है, क्योंकि प्रौद्योगिकी के विकास के साथ-साथ रोजगार एवं नौकरियों का स्वरूप भी तीव्र गति के साथ बदल रहा है. नौकरी एवं रोजगार दोनों का मुख्य उद्देश्य आर्थिक रूप से व्यक्ति को सशक्त बनाते हुए आर्थिक प्रवाह में निरंतरता बनाये रखते हुए सामाजिक पहचान दे, परंतु दोनों का स्वरूप भिन्न है. नौकरी एक संस्थागत एवं नियमित रूप से रोजगार का रूप है, जो निश्चित वेतन के साथ सामाजिक सुरक्षा प्रदान करता हो. भारतीय समाज में विशेषकर सरकारी नौकरियों के साथ ही अधिक लोकप्रिय एवं आधारभूत संरचना से सम्पन्न सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के अंतर्गत नौकरियां अत्यधिक लोकप्रिय हैं, जो अत्यधिक सामाजिक सुरक्षा के साथ-साथ समाज में प्रतिष्ठा भी प्रदान करती हैं और सामान्यत: लोग इसी श्रेणी के नौकरियों के लिए प्रयासरत रहते हैं. सरकारें भी लोकप्रियता के लिए इस क्षेत्र की नौकरियों की अलग से घोषणा करती है, परंतु आबादी के अनुरूप इसके अवसर नगण्य हैं. ब्रिटिश शासनकाल के अंतर्गत सर्वप्रथम 1775 में फोर्ट विलियम, कोलकाता में प्रथम भारतीय आयुध निर्मात्री कारखाना की स्थापना ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा की गयी एवं वहां से इस तरह संस्थागत नौकरियों का प्रचलन समाज में बढ़ा. उससे पहले सेवा क्षेत्र प्रमुख रूप से रोजगार का साधन नहीं था, अपितु ब्रिटिश शासन व्यवस्था से पहले भारतीय समाज में रोजगार के विशाल अवसर थे. विश्व अर्थतंत्र के अनुसार उस समय, भारत में शहरी हस्तशिल्प आधारित उद्योग प्रमुख रूप से रोजगार पाने के माध्यम थे. कृषि क्षेत्र उस समय भी सबसे ज्यादा रोजगार देने वाला क्षेत्र था, परंतु उस समय की व्यवस्था अपने उत्कृष्ट शिल्प कौशल के लिए जाना जाता था. इसके अतिरिक्त सभी गांव आत्मनिर्भर थे और गांव के समुदाय इन उत्पादों का सीधे उपयोग करते थे. परंतु ब्रिटिश शासन व्यवस्था के अंतर्गत खेती-किसानी एक आय आधारित रोजगार नहीं रह कर केवल जीवित रहने का साधन बन गया. उस समय कृषि पर आधारित रोजगार एवं परिस्थिति पर तत्कालीन बंगाल प्रेसीडेंसी के लेफ्टिनेंट गवर्नर सर सीए इलियट ने कहा “मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि हमारी आधी कृषक आबादी वर्ष के प्रारंभ से लेकर वर्ष के अंत तक यह नहीं जानती है कि अपनी भूख को पूरी तरह से संतृष्ट करना क्या होता है”. इस कथन से स्पष्ट है कि उस समय कृषि रोजगार का माध्यम नहीं था, अपितु जीवन जीने का जरिया मात्र था. आजाद भारत में भी कमोबेश वे ही हालात हैं. कृषि संपन्नता का प्रतीक है, परंतु रोजगार के रूप में नहीं. जैसे-जैसे भारतीय अर्थतंत्र का दायरा बढ़ रहा है, प्रौद्योगिकी के विकास के साथ-साथ परंपरागत नौकरियों के स्वरूप बदल रहे हैं, रोजगार के स्वरूप बदल रहे हैं. यह एक प्रतिस्पर्धात्मक स्वस्थ परंपरा की शुरुआत करेगी, जो सरकारी नौकरी के वर्तमान स्वरूप से भिन्न होगा. ऐसे ही निम्नवर्गीय सरकारी नौकरियां आउटसोर्स के माध्यम से संविदा आधारित हो गई हैं. इस स्थिति में सरकारी नौकरियों में प्राप्त सामाजिक सुरक्षा का भी ह्रास हो रहा है, जो सरकारी कर्मचारी को भी एक सामान्य रोजगारयुक्त व्यक्ति के समकक्ष ला रहा है. दोनों की सामाजिक स्थिति भी लगभग बराबर की है. प्रौद्योगिकी के अत्यधिक प्रयोग से इसपर आधारित गैर परंपरागत रोजगार के अपार अवसर बाजार में उपलब्ध हो रहे हैं, परंतु वर्तमान भारतीय समाज में जो युवा कौशल युक्त, शिक्षित एवं प्रौद्योगिकी के अनुकूल हैं, उनके लिए तो प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रोजगार के अवसर हैं और वे आर्थिक रूप से सशक्त भी हो रहे है, परंतु चुनौतियां तो अशिक्षित, अकुशल अथवा परंपरागत रूप से शिक्षा प्राप्त किये हुए व्यक्ति के लिए हैं. रोजगार के नए अवसर सॉफ्टवेयर क्षेत्र में अच्छे खासे पैसों के साथ उपलब्ध है. कोरोना काल के बाद वर्क फ्रॉम होम का प्रचलन बढ़ा, जिससे उत्पादकता के साथ-साथ एक नए सर्विस क्षेत्र का विकास हुआ. परंतु क्या इसे रोजगार या नौकरी की श्रेणी में रखेंगे ? आज के समय में ऐसे रोजगार की अपार संभावना है, जिसमें किसी एक खास कंपनी के साथ नहीं जुड़कर फ्रीलांसर के रूप में, बहुतेरे प्लेटफार्म पर काम करके अर्थोपार्जन करना शामिल है. इस तरह जॉब को क्या रोजगार के श्रेणी में रखेंगे? ये पैसे तो अर्जित कर रहे हैं, परंतु भविष्य की गारंटी नहीं है. निम्न कार्बन उत्सर्जन, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर आधारित अर्थव्यवस्थाएं भी समावेशिता के साथ-साथ आर्थिक विकास के नए दृष्टिकोण को स्वीकार करती हैं और समस्त सीमाओं के भीतर धन प्राप्त करने की समस्या से निपटती हैं. इनमें मुख्यतः जल संरक्षण, सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, स्थायी वन का विकास आधारित रोजगार के नित्य नए अवसर उत्पन्न हो रहे हैं और इसके अंतर्गत हमारी परंपरागत प्रकृति आधारित दिनचर्या के साथ-साथ प्रौद्योगिकी के उपयोग पर आर्थिक रूप से सशक्त होने के द्वार खोल रहे हैं, जो आर्थिक संपन्नता गैर परंपरागत रोजगार के रूप में देंगे. 1990 के औद्योगीकरण के दौर के बाद अपने देश में सॉफ्टवेयर आधारित नौकरियों का विकास हुआ और आज भी सर्विस सेक्टर में इस क्षेत्र का योगदान सबसे ज्यादा है, परंतु जो पीढ़ी 1990 के दशक में इस क्षेत्र में आये, वे उम्र के बीच पड़ाव में किसी शारीरिक, मानसिक समस्या के कारण नौकरी खोते गये या छोड़ते गये, अथवा उच्चतम पैकेज के कारण कंपनियां, उन्हें रखना नहीं चाहती हैं. वे समस्त लोग उच्च तकनीक से युक्त होते हुए भी बेरोजगारी की मार झेलते हैं. उनके पास अच्छी पूंजी भी होती है. गैर परंपरागत रूप से वे आमदनी भी करते हैं, परंतु क्या उन्हें हम रोजगार की श्रेणी में रखेंगे? समाज इनके कौशल का कैसे उपयोग करेगा, यह भी सोचने का विषय है. गैर परंपरागत रूप से आर्थिक संपन्नता पाने वाले व्यक्तियों को हम सामाजिक सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं क्या? बदलती व्यवस्था में प्रौद्योगिकी आधारित समाज में सरकारों को भी इन गैर परंपरागत श्रेणी से अपने कौशल पर आर्थिक गतिविधियां चलाने वाले व्यक्ति को सामाजिक सुरक्षा के साथ-साथ मुख्य धारा के रोजगार की तरह मान्यता देने के लिए कदम उठाने चाहिए. डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. 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