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गुजरात के चौहान ने धनबाद में आजादी की अलख जगा दी, हर लाठी का जवाब- अंग्रेजों भारत छोड़ो

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Niraj Kumar Dhanbad:  वे युवा थे. परिवार भी सुखी-संपन्न. पर वे आजादी के दीवाने थे. उन्हें आजाद देश की चाहत थी. इसलिए सुख-सुविधा का त्याग कर स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े. अंग्रेजों की लाठियां खाई. जेल गए. यातना सही. लेकिन, तब तक चैन की सांस नहीं ली, जब देश आजाद नहीं हुआ. ये पुरुषोत्तम खिमजी चौहान थे. कोयलांचल में भारत छोड़ो आंदोलन को गति देने वाले पुरुषोत्तम खिमजी चौहान. अविस्मरणीय चौहान.

पिता कोयला खदान मालिक, बेटा आजादी का मतवाला 

पुरुषोत्तम खिमजी चौहान के पिता गुजरात के कच्छ से धनबाद आए थे. पिता कोयला खदान के मालिक थे. पुरुषोत्तम खिमजी चौहान ने 1930 में कोलकाता में कानून की पढ़ाई के दौरान महात्मा गांधी से प्रभावित होकर स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेना शुरू कर दिया. 17 अगस्त 1942 को धनबाद जिले में आयोजित विशाल रैली का नेतृत्व करने वालों में पुरूषोत्तम खिमजी चौहान सबसे आगे थे. अंग्रेजों ने आंदोलन कुचलने के लिए लाठी चार्ज किया. गोलियां चलाई. पुरूषोत्तम खिमजी चौहान ने भी लाठियां खाई. हर लाठी के जवाब में कहा-अंग्रेजों भारत छोड़ो. आंदोलन धीरे-धीरे तेज़ होता गया. अंग्रेजों डरे तो आसनसोल से तोप वाली सेना की टुकड़ी कैप्टन इलिस के नेतृत्व में मंगाई. जिसे कोयलांचल के विभिन्न चौक-चौराहों पर तैनात किया. अंग्रेजी हुकूमत ने पुरुषोत्तम खिमजी चौहान को जेल में डाल दिया.

झरिया और रामगढ़ राजा को चुनाव में धूल चटा दी 

देश आजाद हुआ. अब वे मजदूरों की स्थिति सुधारने में लग गए. बिहार विधानसभा के चुनाव में धनबाद सीट से 1952 में झरिया के राजा काली प्रसाद सिंह और 1957 में रामगढ़ के राजा कामाख्या नारायण सिंह को पराजित किया. वे महात्मा गांधी, राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद से लेकर जयप्रकाश नारायण तक के चहेते रहे. पुरुषोत्तम खिमजी चौहान का जन्म 1905 में गुजरात के कच्छ में हुआ था. उनके पिता खिमजी वेलजी चौहान मिस्त्री समुदाय से थे. उनकी  शिक्षा-दीक्षा, राजनीतिक जीवन, स्वतंत्रता आंदोलन की कर्मस्थली धनबाद रही.  1957 में चुनाव जीतने के एक वर्ष बाद ही 1958 में उनकी मृत्यु हो गई. 53 साल में उन्होंने एक युग जी लिया. यह भी पढ़ें : कोयला">https://lagatar.in/dhanbad-attack-on-cisf-jawans-who-went-to-raid-against-coal-smugglers/">कोयला

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