Khunti: नयी शिक्षा नीति से विद्यार्थियों को काफी उम्मीदें हैं. इस पर शिक्षाविदों के अपने विचार हैं. बिरसा कॉलेज खूंटी के इतिहास के प्रोफेसर डॉक्टर अभिषेक कुमार ने भी नयी शिक्षा नीति पर अपने विचार रखे हैं. उनका कहना है कि इसमें केन्द्र सरकार केन्द्रीय तौर पर भारत में एक समान शिक्षा नीति लागू करने का प्रयास कर रही है. इससे समावेशी विकास शिक्षा के स्तर पर होगा. नॉर्थ का राज्य हो या साउथ का राज्य हो, यहां तक कि उत्तर भारत का जो राज्य है, उनमें समान शिक्षा नीति विकसित होने से समान विचारधारा के साथ नवययुवा आगे बढ़ेंगे. [caption id="attachment_352495" align="aligncenter" width="500"]
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alt="" width="500" height="400" /> डॉ अभिषेक कुमार[/caption] कहते हैं कि उनमें जो वैचारिक विविधता है, वो लुप्त होगी. यह बहुत जरूरी है कि राज्य स्तर पर जो शिक्षा नीति लागू होती है और केन्द्रीय स्तर पर जो शिक्षा नीति पर विविधता रहती है, उसमें राज्य स्तर पर जो कुछ सिलेबस का बदलाव किया जाता और जोड़ा जाता है अब वह सारा केन्द्रीय स्तर पर होगा. इससे किसी क्षेत्र विशेष के पिछड़ने वाले छात्रों को लाभ होगा. नयी निक्षा नीति में आठवीं और बारहवीं बोर्ड का जो बोझ था, उसको कम किया गया है. ये छात्रों पर बोझ कम करेगा और बहुत कारगर होगा. लंबे अंतराल के बाद बोर्ड होगा. बच्चे अब अपनी पढ़ाई कभी भी ब्रेक कर सकते हैं और नये जगह पर मौका का फायदा उठाकर फिर से अपनी पढ़ाई को वहीं से शुरू कर सकते हैं. नयी शिक्षा नीति में कक्षा एक से लेकर पांचवीं क्लास तक क्षेत्रीय भाषा, शास्त्रीय भाषा, तामिल, तेलुगु और संस्कृत इन सब भाषाओं को सिलेबस में शामिल करने की बात कही गयी है. क्षेत्रीय स्तर की अन्य भाषाओं को भी शामिल किया गया है. बहुत जगह ऐसा होता है कि गांव में सुदूर प्रदेश के जो लोग हैं, जो जनजातीय लोग हैं या अविकसित क्षेत्र के लोग हैं, उनकी स्थानीय संस्कृति और स्कूल दोनों में बहुत अंतर होता है. बच्चों का जो घर का वातावरण होता है और स्कूल का वातावरण होता है, उसमें भिन्नता रहती है. इससे बच्चे स्कूल जाने से कतरने लगते हैं. वहीं अब घर की भाषा में पढ़ाई होगी तो बच्चे स्कूल जाने से कतरायेंगे नहीं. वे उत्साहित होकर पढ़ेंगे. हमारी पुरानी सभ्यता और पुरानी संस्कृति शास्त्रीय भाषा लुप्त हो रही है. वह नये पटल में आयेगा. हमारी धरोहर की भाषाएं संस्कृत, तमिल, तेलुगु और अन्य भाषओं को जानने का मौका मिलेगा. इनकी जानकारी के लिये एप्प का निर्माण होगा. वहीं नयी नीति का दूसरा पहलु यह है कि लोगों में क्षेत्रीयता का भाव बढ़ेगा. मतलब आज के समय में जिस तरह से कट्टरता का जो भाव बढ़ रहा है, ये भी एक समस्या और मुद्दा हो सकता है. वहीं भारत जैसे विशाल देश में विभिन्न भाषा और सांस्कृतिक देश में इसे लागू करना चुनौतीपूर्ण होगा. [wpse_comments_template]
alt="" width="500" height="400" /> डॉ अभिषेक कुमार[/caption] कहते हैं कि उनमें जो वैचारिक विविधता है, वो लुप्त होगी. यह बहुत जरूरी है कि राज्य स्तर पर जो शिक्षा नीति लागू होती है और केन्द्रीय स्तर पर जो शिक्षा नीति पर विविधता रहती है, उसमें राज्य स्तर पर जो कुछ सिलेबस का बदलाव किया जाता और जोड़ा जाता है अब वह सारा केन्द्रीय स्तर पर होगा. इससे किसी क्षेत्र विशेष के पिछड़ने वाले छात्रों को लाभ होगा. नयी निक्षा नीति में आठवीं और बारहवीं बोर्ड का जो बोझ था, उसको कम किया गया है. ये छात्रों पर बोझ कम करेगा और बहुत कारगर होगा. लंबे अंतराल के बाद बोर्ड होगा. बच्चे अब अपनी पढ़ाई कभी भी ब्रेक कर सकते हैं और नये जगह पर मौका का फायदा उठाकर फिर से अपनी पढ़ाई को वहीं से शुरू कर सकते हैं. नयी शिक्षा नीति में कक्षा एक से लेकर पांचवीं क्लास तक क्षेत्रीय भाषा, शास्त्रीय भाषा, तामिल, तेलुगु और संस्कृत इन सब भाषाओं को सिलेबस में शामिल करने की बात कही गयी है. क्षेत्रीय स्तर की अन्य भाषाओं को भी शामिल किया गया है. बहुत जगह ऐसा होता है कि गांव में सुदूर प्रदेश के जो लोग हैं, जो जनजातीय लोग हैं या अविकसित क्षेत्र के लोग हैं, उनकी स्थानीय संस्कृति और स्कूल दोनों में बहुत अंतर होता है. बच्चों का जो घर का वातावरण होता है और स्कूल का वातावरण होता है, उसमें भिन्नता रहती है. इससे बच्चे स्कूल जाने से कतरने लगते हैं. वहीं अब घर की भाषा में पढ़ाई होगी तो बच्चे स्कूल जाने से कतरायेंगे नहीं. वे उत्साहित होकर पढ़ेंगे. हमारी पुरानी सभ्यता और पुरानी संस्कृति शास्त्रीय भाषा लुप्त हो रही है. वह नये पटल में आयेगा. हमारी धरोहर की भाषाएं संस्कृत, तमिल, तेलुगु और अन्य भाषओं को जानने का मौका मिलेगा. इनकी जानकारी के लिये एप्प का निर्माण होगा. वहीं नयी नीति का दूसरा पहलु यह है कि लोगों में क्षेत्रीयता का भाव बढ़ेगा. मतलब आज के समय में जिस तरह से कट्टरता का जो भाव बढ़ रहा है, ये भी एक समस्या और मुद्दा हो सकता है. वहीं भारत जैसे विशाल देश में विभिन्न भाषा और सांस्कृतिक देश में इसे लागू करना चुनौतीपूर्ण होगा. [wpse_comments_template]
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