New Delhi : भारत के सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने जजों द्वारा लंबे समय तक अदालती मामलों को रिजर्व रखे जाने पर चिंता जताई है. उन्होंने कहा कि ईमानदारी से कहूं तो इतने समय के बाद मौखिक दलीलें मायने नहीं रखती.
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मौखिक दलीलें मायने नहीं रखतीं, जज भी कई बातें भूल जाते हैं
कोर्ट की सुनवाई और फैसलों पर रिपोर्ट करने वाली बार एंड बेंच के मुताबिक सीजेआई चंद्रचूड़ ने सोमवार को कहा, चिंता का विषय यह है कि जज बिना फैसलों के 10 माह से भी अधिक समय तक मामलों को रिजर्व रखते हैं. मैंने सभी हाई कोर्ट को इस बाबत लिखा है. पत्र लिखे जाने के बाद भी मैंने देखा है कि कई जज केवल मामलों को रिजर्व कर रहे हैं और सूचीबद्ध कर रहे हैं. वे आंशिक सुनवाई भी कर रहे हैं. सीजेआई ने कहा, इतने लंबे समय के बाद केस पर दोबारा सुनवाई हो तो पिछली सुनवाई के दौरान रखी गयी मौखिक दलीलें मायने नहीं रखतीं. जज भी कई बातें भूल जाते हैं.
कोर्ट के बोझ से अवगत हैं
सीजेआई चंद्रचूड़ ने एक मामले की सुनवाई करते हुए उम्मीद जताई कि देश के ज्यादातर उच्च न्यायालयों में यह चलन नहीं है. कहा कि हम मानते हैं कि किसी भी मामले की पर्याप्त अवधि तक सुनवाई होने के बाद उसे इस स्तर पर जारी करने से देरी, दुर्दशा और वादकारियों की कानूनी फीस बढ़ जाती है. सीजेआई के नेतृत्व वाली बेंच ने हाई कोर्ट से मामले का शीघ्र निपटारा करने और पहले संक्षिप्त सुनवाई के लिए कार्यवाही को फिर से सूचीबद्ध करने का आदेश दिया . हालांकि, CJI चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने यह भी कहा कि हम हाई कोर्ट के बोझ से अवगत हैं.
संविधान के प्रति रहें वफादार रहने को कहा
पिछले दिनों नागपुर हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के शताब्दी वर्ष समारोह में सीजेआई चंद्रचूड़ ने वकीलों को अहम संदेश दिया था. सीजेआई ने वकीलों से कहा था कि वे किसी राजनैतिक दल के लिए नहीं, बल्कि संविधान के प्रति वफादार रहें. कहा था कि वकीलों को कोर्ट और भारतीय संविधान को अपने राजनीतिक झुकाव और विश्वास से ऊपर रखना चाहिए.
मनुष्य राजनीतिक प्राणी हैं, वकील कोई अपवाद नहीं हैं
समारोह में सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा, `हमारे जैसे जीवंत और तर्कशील लोकतंत्र में, अधिकतर व्यक्तियों की एक राजनीतिक विचारधारा और झुकाव होता है. अरस्तू के शब्दों में, मनुष्य राजनीतिक प्राणी हैं. वकील कोई अपवाद नहीं हैं. हालांकि, बार के सदस्यों के लिए, किसी की सर्वोच्च निष्ठा पक्षपातपूर्ण हित के साथ नहीं बल्कि अदालत और संविधान के साथ होनी चाहिए. [wpse_comments_template]
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