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दिखावा बनता जा रहा है स्वच्छता अभियान

Srinivas यह महात्मा गांधी को झाड़ू तक सीमित करने का उपक्रम तो नहीं! तमाम असहमतियों के बावजूद मैं मोदी जी को कम से कम दो अच्छे काम या अच्छी पहल का श्रेय देता हूं. एक- साफ सफाई या स्वच्छता को महत्व देने; और दूसरा घरों में शौचालय निर्माण को प्रोत्साहन और उसके लिए आर्थिक सहायता. हालांकि प्रारंभ में इन दोनों कामों में जो उत्साह दिखा था, बाद में वह ठंडा पड़ गया; और अंततः भारतीय समाज के संस्कार के अनुरूप वह दिखावा और लगभग कर्मकांड जैसा बन कर रह गया है. जैसे कांग्रेसी दो अक्टूबर को चरखा कातने का कर्मकांड करते रहे हैं, अब भाजपाई झाड़ू लगाने का कर्मकांड करते हैं! इसके लिए कहीं न कहीं खुद मोदी जी भी जिम्मेदार हैं, जो हर मौके को ‘ईवेंट’ बना देने की कला में माहिर हैं. देखादेखी पार्टी के लोग भी वही करने लगे हैं. और अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करने के लिए पूरा प्रशासन भी इसमें शामिल दिखता है. ‘वीआईपी’ लोग ऐसी जगहों पर झाडू लगाते हुए फ़ोटो खिंचाते हैं, जहां असल में कोई गंदगी होती ही नहीं. ऐसा भी हुआ है कि साहब के लिए बाहर से थोड़ा ‘कचरा’ लाकर डाल दिया गया, ताकि वे कैमरे में सचमुच ‘सफाई’ करते दिखें. इस दिखावे की शुरुआत भी प्रारंभ से ही हो गयी थी. एक संस्मरण साझा कर रहा हूं. दो अक्टूबर, 2014. हम शिमला में थे. कनक (अब दिवंगत) और किरण जी के साथ. विशुद्ध पर्यटन के मकसद से. पहली बार हिमाचल प्रदेश गये थे. प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी की ताजपोशी हो चुकी थी. इस कारण मन खिन्न भी था. मगर लगातार सफर, हिमाचल की खूबसूरती, सेब के बगानों और कहीं कहीं कड़कड़ाती ठंड ने मेरे दिमाग को राजनीतिक पचड़े से लगभग दूर रखा था. फिर भी सफर का प्रारंभ ही राजनीति से जुड़े एक रोचक- हास्यास्पद नजारे से हुआ था. हम शिमला सुबह पहुंचे थे. एक होटल में टिके. सुबह नाश्ते के बाद शहर का केंद्रीय आकर्षण स्थल- ‘मॉल’ (यह अमूमन हर पहाड़ी शहर में होता है) घूमने गये. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गांधी जयंती को स्वच्छता दिवस के रूप मनाने का ऐलान किया था. शिमला में हेमा मालिनी (सांसद) को उस कार्यक्रम की शुरुआत करनी थी. हमारे ‘मॉल’ पहुंचने तक कार्यक्रम हो चुका था. लोगों ने बताया कि हेमा मालिनी `सफाई` कर सकें, इसके लिए कहीं से लाकर वहां कुछ कचरा डाल दिया गया था. इस तरह शिमला की सबसे साफ सुथरी जगह पर `स्वच्छता अभियान` की औपचारिकता पूरी हुई. अगले दिन के अखबारों में खबर इसी रूप में छपी भी. वहां गांधी की प्रतिमा भी थी. हमने भी उनको नमन किया! तब से लेकर आज तक दिखावे और औपचारिकता का सिलसिला जारी है. शौचालय निर्माण की योजना कुछ बेहतर चली, काफी हद तक सफल भी हुई. उसमें भी भ्रष्टाचार और खानापूरी का खेल चला. पानी की व्यवस्था नहीं हुई, तो बहुतेरे शौचालय बेमानी भी हो गये. कुछ का उपयोग दुकान, स्टोर या बकरी बांधने में भी होने लगा. वाहवाही लूटने के लिए गांव, प्रखंडों और राज्य तक को `खुले में शौच से मुक्त` घोषित कर दिया गया, जबकि सच कुछ और है! भाजपा या मोदी का आलोचक होने के नाते नहीं, बिना किसी दुराग्रह के, एक जिम्मेवार नागरिक के तौर पर महसूस करता हूं कि तमाम शोर शराबे और स्वच्छता अभियान की सफलता के दावों के बावजूद समाज में सफाई का संस्कार नहीं बन सका है. कम से कम मेरे शहर (रांची) में तो कोई फर्क नहीं पड़ा है, बल्कि स्थिति बदतर हुई है. राज्य सरकार और नगर निगम सफाई के मामले में अक्षम साबित हुए हैं; और अब नागरिक के स्तर पर भी जागरूकता का कोई एहसास नहीं दिखता. अपने मोहल्ले यहां वहां गंदगी पसरी रहती है, किसी को फर्क नहीं पड़ता. मुझे याद है कि बचपन में गांव (बिहार) में 26 जनवरी और 15 अगस्त को सारे लड़के मिल कर गांव की सफाई करते थे. उसे भी कर्मकांड कह सकते हैं, लेकिन हम पूरी ईमानदारी और मेहनत से सफाई करते थे. अब वह भी बंद है. 2 अक्टूबर, जिसे ‘स्वच्छता दिवस’ कहा जाता है, को भी सिवाय सरकारी संस्थानों, दफ्तरों में, झाड़ू लगाते राज्यपाल और मुख्यमंत्री आदि के फोटो के अलावा और कहीं स्वेच्छा से अपनी प्रेरणा से सफाई करते हुए लोग नहीं दिखते हैं. इसके साथ एक चिंताजनक बात यह भी है कि प्रधानमंत्री ने गांधी के ‘सत्याग्रह’ को गैरजरूरी घोषित कर दिया है. अब ‘स्वच्छाग्रह’ को ही गांधी की पहचान बताने का प्रयास हो रहा है! कहीं यह जानबूझ कर तो नहीं किया जा रहा! क्या सचमुच भारत की स्थिति ऐसी हो गयी है कि देश के किसी समुदाय और तबके को अपनी उचित मांगों के लिए विरोध प्रदर्शन या ‘सत्याग्रह’ की जरूरत नहीं है? सरकार और उसके समर्थकों का रवैया तो यही है. सरकार और प्रधानमंत्री की आलोचना तक को वे देश का विरोध से बता देते हैं. इन्हीं स्थितियों में तो गांधी और प्रासंगिक हो जाते हैं; और उनका सत्याग्रह भी. झाड़ू तो एक पार्टी का चुनाव चिह्न ही है. गांधी के व्यक्तित्व से सत्य के प्रति निष्ठा और उसका आग्रह हटा दिया जाये, तो गांधी में बचेगा क्या? यह संदेह अकारण नहीं है कि कहीं यह गांधी और गांधीवाद पर झाड़ू फेरने की कोशिश तो नहीं है? साथ के फोटो पर गौर करें. एक में मोदी जी किसी मंदिर में पोछा लगा रहे हैं! जरूरत थी या शौकिया? दूसरे में झाड़ू लगा रहे हैं. यदि सड़क पर ऐसी गंदगी इसलिए पड़ी थी कि प्रधानमंत्री ही साफ करेंगे, तो लानत है इस व्यवस्था पर! कमाल यह भी कि दोनों अवसरों पर कोई उनके साथ नहीं है! इसलिए कि कोई और फोटो में न दिख जाये! डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. [wpse_comments_template]

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