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जलवायु परिवर्तन-दोषी कौन

Dr. Pramod Pathak हर पिछले वर्ष की तुलना में आने वाला वर्ष ज्यादा गर्म होता जा रहा है और पर्यावरण विज्ञानी इसे जलवायु परिवर्तन की संज्ञा दे रहे हैं. बहुत से लोग इसकी गंभीरता को नहीं समझ पा रहे हैं, लेकिन आने वाले वर्षों में जलवायु परिवर्तन एक भयावह रूप लेगी इसमें संदेह नहीं. थोड़ी बहुत झलकियां तो हम देख भी रहे हैं. भारत जैसे घनी और बड़ी आबादी वाले देश में इसका प्रभाव और भी विकट हो सकता है, क्योंकि हमारी भौगोलिक स्थिति भी जलवायु परिवर्तन के खतरे को बढ़ाती है. इस लिहाज से जलवायु परिवर्तन हमारे लिए बड़ी चिंता का विषय है. मगर अधिक चिंता इस बात की है कि जितनी चिंता होनी चाहिए, उतनी चिंता और उसके समाधान हेतु प्रयास नहीं दिखाई पड़ रहे हैं. अभी वर्तमान वर्ष की गर्मी का शुरुआती दौर ही है और पारा ने अपना जोर दिखाना शुरू कर दिया है. कुछ वैज्ञानिकों का मत है कि इस वर्ष की गर्मी भयावह होगी. वैसे गर्मी की भयावहता दिनों-दिन बढ़ती ही जा रही है. इसका प्रकोप उन देशों में भी देखने को मिल रहा है, जो भौगोलिक कारणों से ठंडे देश हुआ करते थे. यूरोप के कई देश भी जलवायु परिवर्तन के चल रहे असर का प्रभाव झेल रहे हैं. समस्या सचमुच भयावह है. लेकिन उसकी तुलना में प्रयास कम हो रहे हैं. पर्यावरण की चिंता पर पहली बार सन 1972 में यूरोप में स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में दुनिया भर के राष्ट्राध्यक्ष जुटे थे, जिसमें हमारे देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी शामिल हुई थी, लेकिन पांच दशक से भी अधिक अरसा बीत जाने के बाद भी हम बहुत विश्वसनीय ढंग से आगे नहीं बढ़ रहे हैं. देरी घातक साबित हो सकती है. अर्थ डे या पर्यावरण दिवस जैसे आयोजन काफी नहीं है. हमें जागरूकता से आगे निकलना होगा. ठोस प्रयास करने होंगे. समस्या एक ही है कि आज भी बहुत से लोग इसे सिर्फ टेक्नोलॉजी के जरिए हल करना चाहते हैं. मगर सच्चाई है कि टेक्नोलॉजी काफी नहीं है, बल्कि टेक्नोलॉजी कुछ बड़े देश और कुछ बड़े पूंजीवादी व्यवस्था के पोषक लोगों को लाभ पहुंचाने का माध्यम बन जा रहा है. टेक्नोलॉजी से ज्यादा आवश्यक है मनोविज्ञान बदलना. बिना उसके टेक्नोलॉजी कारगर समाधान नहीं दे पाएगी. यदि ईमानदारी और गहराई से विश्लेषण हो तो जलवायु परिवर्तन में सबसे बड़ी भूमिका आम लोगों की है. उनकी सोच में बदलाव लाने की आवश्यकता है. उनके व्यवहार और उनके संस्कार बदलने होंगे. मगर इस पर चर्चा करने से पहले एक बोध कथा. एक बड़ी पुरानी कहानी है. एक बार एक गांव में बड़ा भयंकर अकाल पड़ा. गर्मी के प्रकोप से खेतों की जमीन फट गई, कुएं, तालाब सूख गए, भयंकर सूखा पड़ा और लोगों में त्राहि-त्राहि मच गई. इस भयंकर विपदा से बचने के लिए लोगों ने गांव में स्थित प्राचीन शिव मंदिर में सामूहिक पूजा अर्चना की. तब आकाशवाणी हुई. लोगों को निर्देश दिया गया कि गांव के मध्य में स्थित कुएं में आने वाली अमावस की अर्धरात्रि को गांव के प्रत्येक घर से एक लोटा दूध डाला जाए और प्रातः काल उसी दूध से मंदिर में भगवान शंकर का अभिषेक किया जाए तो संकट दूर हो जाएगा. अब अमावस की रात आ गई. प्रत्येक घर से एक लोटा दूध डालने की तैयारी हो गई. गांव के मुखिया को भी एक लोटा दूध डालना था. किंतु मुखिया जी ने विचार किया कि हर घर से एक लोटा दूध तो जा ही रहा है. यदि एक लोटा पानी ही डाल दें तो अमावस की अंधेरी रात में किसे पता चलेगा. ऐसा विचार कर मुखिया जी लोटे में दूध की जगह पानी लेकर कुएं की तरफ चल दिए. लोग वहां इकट्ठा थे. सबने बारी-बारी से लोटे में लाया हुआ दूध डाला. मुखिया जी ने भी अपना लोटा खाली किया और सभी अपने अपने घर चले गए. अगली सुबह जब लोग कुएं में से दूध निकालने गए तो वहां सिर्फ पानी था. दरअसल सभी ने वैसा ही सोचा जैसा मुखिया जी ने सोचा था. तो बुनियादी समस्या यही है. हर आदमी को लगता है जलवायु परिवर्तन कोई अकेले उसकी वजह से नहीं हो रहा है और यह उसकी जिम्मेदारी नहीं है. यह सोच बदलने की आवश्यकता है. हर एक आदमी की कोशिश जरूरी है. वह भी पूरी ईमानदारी के साथ. अपने प्रदेश झारखंड के संदर्भ में ही बात करें तो हमें लगेगा कि हमारे यहां मौसम कैसा था और कैसा हो गया. दक्षिण बिहार के पठार के रूप में मशहूर झारखंड की आज की राजधानी रांची एक जमाने में बिहार की ग्रीष्मकालीन कालीन राजधानी थी. इसके पीछे कारण था इसका मौसम. वक्त के साथ-साथ मौसम भी बदल गया. हरियाली के स्थान पर आज कंक्रीट के जंगल दिखाई पड़ते हैं. बड़ी-बड़ी बहुमंजिली इमारतें खड़े हो गईं और पेड़ पौधे कम होते गए. झारखंड का नाम झाड़-झंखाड़ की अधिकता के चलते पड़ा था. आज वही गायब है. यही नहीं, बड़ी-बड़ी इमारतें बनीं तो उनमें पानी के लिए जमीन के नीचे का जल का दोहन करना पड़ा. इमारतें ऊंची होती गईं, पर पानी नीचे चला गया. यही नहीं. इमारतों में लगे वातानुकूलित मशीन जो वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड बढा़ने लगे. फ्रिज, टीवी एवं अन्य उपकरण के प्रयोग बढ़ते गए और वातावरण में गर्मी बढ़ती गई. जीवन शैली के बदलाव ने न केवल मानव स्वास्थ्य, बल्कि पर्यावरण के स्वास्थ्य को भी खासा नुकसान पहुंचाया है. सड़कों पर वाहनों की बेतहाशा बढ़ती संख्या और अधिकांश चार पहिया वाहनों का वातानुकूलित होना इस समस्या को और बढ़ा रहा है. जीवन शैली के दोषपूर्ण होने के साथ-साथ हमारा गैर जिम्मेदाराना व्यवहार ही जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार है. आजकल घरों में पीने के पानी के लिए आरओ के मशीन लगे हुए हैं, जो एक बोतल पानी निकालने में तीन बोतल बर्बाद करते हैं. इसके अलावा भी हम कई तरीके से पानी बर्बाद करते हैं. और यह अच्छी खासी मात्रा है. दरअसल यह सोचना जरूरी है कि मानवीय प्रयास के जरिए संरक्षण के बिना जलवायु परिवर्तन के कुप्रभाव को रोकना मुश्किल है. धरती की क्षमता सीमित है, किंतु मानव का लोभ असीमित है. वही लोभ जलवायु परिवर्तन का कारण है. डिस्क्लेमर : ये लेखक के निजी विचार हैं. [wpse_comments_template]

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