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कम नहीं हुए हैं रंगोत्सव के रंग

Sunil Badal वसंतोत्सव होली भारत ही नहीं, विश्व के अनेक देशों में अलग अलग नामों और प्रकार से मनाई जाती है . रंगों का यह उत्सव कहीं कहीं सिर्फ इत्र से तो सादे पानी तक से भी मनाया जाता है. उलझनों और अभावों से जूझता आम आदमी रंगों के सतरंगी प्रभाव से कुछ दिनों के लिए अपने सारे दुःख भूल जाता है. हिंदी पट्टी के गांवों के लोग इस त्योहार के लिए हर हाल में देश परदेश से अपनी जन्मभूमि लौटना चाहते हैं, पर अंग्रेजी माध्यम की पढ़ाई से उपजी आधुनिकता और महानगरों की भागदौड़ के बीच सबसे खुशियों भरा यह उत्सव धीरे धीरे अपनी चमक भी खोता जा रहा है. होली दहन फागुन महीने के अंतिम दिन होलिका की शाम से शुरु होती है और अगला दिन रंगों में सराबोर होने के लिए होता है. छोटे बच्चे होली के त्योहार का बहुत उत्सुकता से प्रतीक्षा करते हैं तथा आने से पहले ही रंग, पिचकारी और गुब्बारे आदि की तैयारी में लग जाते हैं. सभी लोग सड़क के चौराहे पर लकड़ी, घास और गोबर के ढेर को जलाकर होलिका दहन की प्रथा को निभाते है. होली के दिन लोग सामाजिक विभेद को भुलाकर एक-दूसरे पर रंग, अबीर-गुलाल इत्यादि फेंकते हैं, ढोल बजा कर होली के गीतों पर नाचते-गाते हैं और घर-घर जा कर स्वादिष्ट पाकवानों और मिठाइयां बाँटकर खुशी का इजहार करते है. ऐसा माना जाता है कि होली के दिन लोग पुरानी कटुता को भूल कर गले मिलते हैं और फिर से दोस्त बन जाते हैं. एक दूसरे को रंगने और गाने-बजाने का दौर दोपहर तक चलता है. इसके बाद स्नान कर के विश्राम करने के बाद नए कपड़े पहन कर शाम को लोग एक दूसरे के घर मिलने जाते हैं, गले मिलते हैं और मिठाइयां खिलाते हैं. होली भारत के सबसे पुराने त्योहारों में से एक है. होली को होलिका या होलाका नाम से भी मनाया जाता है. इतिहासकारों का मानना है कि आर्यों में भी होली का प्रचलन था, लेकिन अधिकतर यह पूर्वी भारत में ही मनाया जाता था। नारद पुराण औऱ भविष्य पुराणों में वर्णित कथानुसार हिरण्यकशिपु की बहन होलिका के आग में जलकर भस्म हो जाने तथा भक्त प्रह्लाद के बच जाने की प्रचलित कथा के अलावा शिव पुराण के अनुसार इंद्र ने कामदेव को शिव जी की तपस्या भंग करने को भेजा, परन्तु शिव ने क्रोधित हो कर कामदेव को भस्म कर दिया. शिव जी की तपस्या भंग होने के बाद देवताओं ने शिव को पार्वती से विवाह के लिए राजी कर लिया. इस कथा के आधार पर होली में काम की भावना को प्रतीकात्मक रूप से जला कर सच्चे प्रेम की विजय का उत्सव मनाया जाता है. उत्तर प्रदेश के वृन्दावन में खेली जाने वाली ब्रज की लट्ठमार होली तो पूरी दुनिया में मशहूर है. विश्व को प्यार का संदेश देने वाली नगरी में प्यार जताने का यह अंदाज, लाठियों की खटखट के बावजूद कम लुभावना नहीं है. दरअसल, यह मार नहीं, प्यार है. यही मार और प्यार होली पर दुनिया भर के सैलानियों को मथुरा-वंदावन खींच लाता है. इसमें शामिल होने देश के अलग-अलग हिस्सों से मस्तों की टोली पहुंचती है. पूरे ब्रज इलाके में होली पांच दिन की होती है. जब पूरे देश से रंग का खुमार उतरना शुरू होता है, तब भी यहां उमंग चरम पर होता है. तैयारी तो महीने भर से शुरू हो जाती है. इसकी आहट गली-गली में सुनाई देती है. इस्कॉन टेंपल से लेकर बांके बिहारी मंदिर तक आयोजन भव्य पैमाने पर होता है. होली के पांचों दिन बांके बिहारी मंदिर के आगे रंग में सराबोर हजारों की भीड़ जमा होती है. इसका उल्लेख भारत की पवित्र पुस्तकों, जैसे पुराणों, दसकुमार चरित, संस्कृत नाटक, रत्नावली सहित बहुत सारी पुस्तकों में मिलता है. होली के दिन सभी लोग पुराने भेदभाव भुलाकर एक-दूसरे पर रंग, अबीर-गुलाल इत्यादि फेंकते हैं. सभी लोग एक-दूसरे के घर जा कर स्वादिष्ट पकवानों और मिठाइयां बांटकर खुशी का इजहार करते है. यह पर्व सभी समस्याओं को दूर करके लोगों को बहुत करीब लाता है, उनके बंधन को मजबूती प्रदान करता है. होली सिर्फ एक त्योहार ही नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण से लेकर स्वास्थ्य से जुड़ा है. होली का पर्व साल में ऐसे समय पर आता है, जब मौसम में बदलाव के कारण लोग आलसी से होते हैं. होली वाले दिन सभी जोर से गाते नाचते हैं, जिससे मानवीय शरीर को नई ऊर्जा प्राप्त होती है. यह त्योहार हमारे शरीर और मन को नई ऊर्जा भर देता है. होली के त्योहार पर होलिका दहन से वातावरण का तापमान बढ़ जाता है, जो बैक्टीरिया और अन्य हानिकारक कीटों को मारता है. समय के बदलते परिवेश से देश में होली का स्वरूप भी बदलता जा रहा है. सामुदायिक त्योहार की पहचान रखने वाला यह पर्व अब राजनैतिक कारणों से धीरे-धीरे जाति और समूह के दायरे में बंट रहा है. इसकी प्राचीन परंपराएं भी तेजी से खत्म होने लगी हैं. पहले हिंदी भाषी प्रदेशों में फागुन का महीना चढ़ते ही फिजा में होली के रंगीले और सुरीले गीत तैरने लगते थे. इनको स्थानीय भाषा में फाग या फगुआ गीत कहा जाता है, लेकिन महंगाई, समय की कमी, भागदौड़ भरी जीवनशैली और अन्य वजहों से शहरों और गांवों दोनों ही जगह यह परंपराएं लुप्त होती जा रही है. लोगों में प्रेम की भावना ही गायब होती जा रही है. ज्यादातर लोग लोग मोबाइल और टीवी से चिपके रहते हैं. आपसी भेदभाव की वजह से एक-दूसरे से मिलने तक भी नहीं जाते हैं. गांवों के चौपालों से होली खेलने के लिए निकलने वाली टोली में बुजुर्ग से लेकर युवा शामिल होते थे. यह टोली सामाजिक एकता की मिसाल होती थी, पर इन्टरनेट से फैलने वाले दुष्प्रचार से अपने मोबाइल और लैपटॉप में ही व्यस्त रहते हैं. डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. [wpse_comments_template]

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