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टिप्पणीः कांग्रेस ने सीट तो गंवाई ही, अब इज्जत भी गंवा रही

  • संदर्भ: राज्यसभा चुनाव-2026

Shyam Kishore choubey

एक दिन पहले 18 जून को झारखंड कोटे की दो राज्यसभा सीटों पर हुए चुनाव में प्रत्यक्षतः पर्याप्त संख्या बल रहते हुए कांग्रेस प्रत्याशी प्रणव झा की हार हो गई. यह साधारण हार नहीं थी, अपितु बेइज्जतीपूर्ण हार थी. चुनाव जीतने के लिए उनको चाहिए थे 28 वोट, जो गठबंधन के पास हैं. 

 

इंडिया ब्लॉक ने झामुमो नेता हेमंत सोरेन के नेतृत्व में ढाई साल पहले 2024 में राज्य की 81 विधानसभा सीटों में 56 पर शानदार जीत हासिल की थी. इस लिहाज से राज्य की दोनों राज्यसभा सीटों पर बहुत सोच-समझकर झामुमो और कांग्रेस ने अपने-अपने प्रत्याशी दिये थे. 28-28 वोटों पर ही तो जीत सुनिश्चित थी।.

 

इतना न भी होता, बिग ब्रदर के नाते झामुमो अपने प्रत्याशी को एक-दो अतिरिक्त वोट भी दिलवा देता, जैसा कि हुआ, तो भी द्वितीय वरीयता के मतों से कांग्रेस प्रत्याशी की जीत में कोई किंतु-परंतु न होना था। लेकिन कांग्रेस प्रत्याशी को वोट मिले केवल 20।

 

दूसरी ओर एनडीए समर्थित निर्दलीय प्रत्याशी परिमल नाथवानी 28 मत पाकर विजयी रहे, जबकि एनडीए के पास कुल जमा 24 ही वोट हैं. नाथवानी महोदय पूर्व में दो मर्तबा इसी राज्य से राज्यसभा इसी प्रकार निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर जीत चुके हैं. वे रिलांयस इंडस्ट्री में डायरेक्टर हैं. न तो धन-संपति की कमी है, न ही पहचान का सवाल है.

 

झारखंड में पिछले 26 साल में हुए 20 राज्यसभा चुनावों (13 द्विवार्षिक और सात उपचुनाव) में गिनती के एक-दो को छोड़ दिया जाय, तो शेष सभी चुनावों में हार्स ट्रेडिंग के किस्से खूब मशहूर हुए हैं. यहां तक कि 2010 के चुनाव में नोट फॅार वोट मामले की सीबीआई जांच चली. अभी तक कोई फैसला नहीं आया है. इसलिए भी माननीय निश्चिंत रहते हैं. खूब बोली लगती रही है.

 

चुनावों में हार-जीत लगी रहती है, लेकिन राज्यसभा चुनाव में वोट वेल कैलकुलेटेड होते हैं, इसलिए सोच-समझकर, गुणा-भाग लगाकर प्रत्याशी उतारे जाते हैं. झारखंड में इंडिया ब्लॉक में झामुमो के 34, कांग्रेस के 16, राजद के 4 और माले के दो विधायक हैं. इस लिहाज से कांग्रेस ने तो प्रत्याशी देकर गलत नहीं किया था. लेकिन उसके हिस्से के वोट भाजपा समर्थित निर्दलीय परिमल नाथवानी को जीत की स्थिति में लाने की ओर कैसे सरक गये, सोचनेवाली बात यही है.

 

चुनाव परिणाम के तत्काल बाद 18 जून की शाम कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी और इस चुनाव में प्रत्याशी के एजेंट की भूमिका निभा चुके के राजू ने बिना लाग लपेट गठबंधन पार्टनर राजद और माले के विधायकों द्वारा क्रॉस वोटिंग का आरोप लगाया. उसके बाद से झारखंड में इंडिया ब्लॉक के सियासी प्याले में तूफान आया हुआ है. खासकर राजद और माले के छोटे से बड़े नेता के राजू को ही लपेटे में ले रहे हैं. 

 

राजद विधायक दल के नेता सुरेश पासवान ने तो यहां तक कह दिया कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन कांग्रेस को गठबंधन से बाहर करें, हम सरकार चला लेंगे. उनकी इस बात को जदयू के एकमात्र विधायक सरयू राय ने यह कहकर हवा दे दी है कि हेमंत चाहें तो वे और कुछ और विधायक उनके सपोर्ट में आ जाएंगे. मतलब यह कि झारखंड के सत्ताधारी गठबंधन में ‘घर फूटे, ... लूटे’ वाली स्थिति-परिस्थिति आ गई है. 

 

कुछ लोग पिछले साल बिहार विधानसभा चुनाव में झामुमो को सीटें न देने की घटना से भी जोड़कर देख रहे हैं और कह रहे हैं कि इसी कारण असम चुनावों में हेमंत ने कांग्रेस से अलग अपने प्रत्याशी उतारे. असम में झामुमो प्रत्याशियों की जीत भले न हुई, लेकिन कांग्रेस बुरी तरह हार जरूर गई. ऐसे ही कुछ अरसा पहले हुए नगर निकाय चुनावों में भी इंडिया ब्लॉक बिखरा रहा, जिसका सीधा फायदा भाजपा को मिल गया.

 

उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हालांकि अलग संदर्भों में बार-बार कहते हैं, बंटोगे तो कटोगे. उनकी यह युक्ति झारखंड में इंडिया ब्लॉक के लिए सटीक लग रही है. कहां राज्य के इतिहास में पहली बार दो-तिहाई से अधिक बहुमत पाकर चलनेवाली सरकार और कहां नगर निकायों और राज्यसभा के चुनाव में बुरी तरह हार! 

 

ये राजनीतिक घटनाएं कतई मामूली हैं. ये साफ-साफ कह रही हैं, गठबंधन के अंदर सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है. फोड़ा आगे चलकर बड़ा जख्म बनता है. यहां वह स्थिति नहीं ही आएगी, पक्के तौर पर कौन कह सकता है!

 

रही बात, राज्यसभा चुनावों में ‘घोड़े’ खरीदे जाने की, तो जब वे बिकने को तत्पर-तैयार हुए, तभी तो खरीदे गये. खरीदनेवाले का क्या दोष! गठबंधन की गांठें ढीली पड़ीं, नेतृत्व समझते हुए भी उनको मजबूती नहीं दे सका. 

 

राज्यसभा चुनाव से एक दिन पहले, जब सफल मॉक ड्रील कर ली गई तो कुछ वोट बेकार क्यों हुए और कुछ वोट बहक क्यों गए! इन सवालों का जवाब पाने के लिए हालांकि चुनाव के अगले दिन 19 जून को बैठक कर आंतरिक समिति बनाने की बात तय की गई, लेकिन इससे क्या हो जाएगा!

 

कांग्रेस का हाल हो गया, खाया-पिआ कुछ नहीं गिलास तोड़ा बारह आने. इससे तो बेहतर था कि वह प्रत्याशी ही न देती. गौर करने की बात यह भी है कि गठबंधन में रायशुमारी के पहले ही कांग्रेस ने अपने प्रत्याशी की घोषणा कर दी थी. इस बात को लेकर भी नाराजगी के स्वर फूटे थे. चुनाव से पहले इंडिया ब्लॉक के जो लोग विपक्षी खेमे से पांच वोट इधर आने की बात कह रहे थे, उनको बताना चाहिए कि आठ वोट इधर से उधर कैसे हो गये!

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