भारत सरकार द्वारा एक फरवरी 2026 को पेश किया गया. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की नौवीं बजट पेश होने के बावजूद, देश की आर्थिक चुनौतियों को संबोधित करने में बुरी तरह विफल साबित हुआ है. 'विकसित भारत' के नारे के साथ पेश किया गया यह बजट, वास्तव में एक 'डीफॉर्म बजट' है, जैसा कि विपक्षी नेता अखिलेश यादव ने सही कहा है. यह बजट महज 5 प्रतिशत अमीर आबादी के हितों को साधता है, जबकि बहुसंख्यक मध्यम वर्ग, गरीब और किसानों की समस्याओं को नजरअंदाज करता है.
वैश्विक अनिश्चितताओं, जैसे अमेरिकी टैरिफ और मुद्रा अस्थिरता के बीच, यह बजट कोई ठोस रणनीति नहीं पेश करता, बल्कि पुरानी नीतियों को दोहराता है जो आर्थिक असमानता को और गहरा करेंगी.
देश की सबसे बड़ी समस्या है बेरोजगारी और रोजगार सृजन की कमी. बजट में एआई और शिक्षा के लिए सेंटर ऑफ एक्सीलेंस की घोषणा की गई है, लेकिन यह महज सतही है. इकोनॉमिक सर्वे के अनुसार, जीडीपी विकास 6.8-7.2 प्रतिशत होने की उम्मीद है, लेकिन यह मजबूत घरेलू खपत पर आधारित है, जबकि वास्तविकता में गिग वर्क की मांग बढ़ रही है और स्थिर नौकरियां घट रही हैं.
सरकार बेरोजगारी दर कम होने का दावा करती है, लेकिन युवाओं की असुरक्षित नौकरियां और कौशल विकास की कमी से अर्थव्यवस्था की नींव कमजोर हो रही है. MGNREGA जैसी योजनाओं को नए कानून से लगभग खत्म करने जैसा कदम उठाया गया है, जहां औसतन सिर्फ 35 दिन का रोजगार मिलता है. यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचाएगा और प्रवासन को बढ़ावा देगा.
बजट की दूसरी बड़ी कमी है, निजी निवेश की अनुपस्थिति. बजट में कैपेक्स को 9 प्रतिशत बढ़ाकर 12.2 लाख करोड़ रुपये किया गया है, लेकिन यह सरकारी खर्च पर निर्भर है. निजी कॉरपोरेट निवेश 2012 से 12 प्रतिशत जीडीपी पर स्थिर है और सरकार इसकी वजह नहीं पूछ रही. FDI में गिरावट और विदेशी पूंजी प्रवाह की कमी से रुपया कमजोर हो रहा है.
बजट में विदेशी निवेश सीमा बढ़ाने की घोषणा है, लेकिन यह अपर्याप्त है और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारत को पीछे धकेलती है. इसके अलावा राजकोषीय घाटा 4.3 प्रतिशत रखा गया है, लेकिन डेब्ट-जीडीपी अनुपात 55.6 प्रतिशत तक कम करने का लक्ष्य अवास्तविक लगता है, क्योंकि बाजार उधार 17.2 लाख करोड़ रुपये तक बढ़ेगा, जो निजी निवेश को क्राउड आउट करेगा.
कर सुधारों में भी बजट खराब साबित हुआ है. नई कर व्यवस्था में 12 लाख रुपये तक की आय पर कोई कर नहीं, लेकिन मध्यम वर्ग की मुख्य समस्याएं जैसे महंगाई, स्वास्थ्य और आवास पर राहत नहीं दी गई है. एसटीटी बढ़ाने से शेयर ट्रेडिंग महंगी हुई और बायबैक पर कैपिटल गेन टैक्स से निवेशक हतोत्साहित होंगे. यह 'ग्रेट फिस्कल रिवर्सल' है, जहां टैक्स बोझ कैपिटल से कंजम्पशन और लेबर पर शिफ्ट हो रहा है.
मिडिल क्लास को कोई बड़ी राहत नहीं, जबकि अमीरों को क्लाउड सेवाओं पर टैक्स छूट जैसी सुविधाएं दी गई हैं. व्यक्तिगत आयात पर टैरिफ घटाना अच्छा है, लेकिन यह आयात निर्भरता बढ़ाएगा, जो 'मेक इन इंडिया' के विपरीत है.
सेक्टरल फोकस में भी असंतुलन है. विनिर्माण के लिए 40,000 करोड़ रुपये का आवंटन है, लेकिन शिक्षा और स्वास्थ्य में कमी है. बजट में बायोफार्मा के लिए 100 अरब रुपये दिए गए, लेकिन समग्र स्वास्थ्य बजट अपर्याप्त है, जो महामारी जैसी चुनौतियों में जोखिम बढ़ाएगा. बुनियादी ढांचे पर जोर है, लेकिन पर्यावरणीय स्थिरता की अनदेखी, जैसे हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर बिना ठोस ग्रीन ट्रांजिशन प्लान.
कुल मिलाकर, यह बजट संरचनात्मक समस्याओं को नहीं साधता है. कांग्रेसी नेता मनीष तिवारी ने सही कहा कि निजी निवेश की कमी और FDI गिरावट जैसी समस्याएं दशक भर से अनसुलझी हैं. बजट में कोई बड़ा सुधार नहीं, बल्कि पुरानी नीतियां जो असमानता, बेरोजगारी और कम निवेश को बढ़ावा देंगी. सरकार को फिस्कल रिवर्सल की जरूरत है, जहां शिक्षा, स्वास्थ्य और समावेशी विकास पर जोर हो. अन्यथा, 'विकसित भारत' का सपना अधूरा रह जाएगा.
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