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एक भारत-श्रेष्ठ भारत की अवधारणा

Dr. Kaushalendra Batohi नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अंतर्गत शिक्षा में गुणात्मक परिवर्तन लाने के लिए बहुत सारे दूरगामी निर्णय लिए गए हैं. वर्तमान दौर में शिक्षा का उद्देश्य केवल बच्चों को पेशेवर रूप से मजबूत करना ही नहीं है, अपितु उनमें राष्ट्र के प्रति चैतन्य एवं संवेदनशील भी बनाना है. भारतीय संस्कृति सदैव से वसुधैव कुटुम्बकम की मूल भावना के साथ विकसित हुई है, परंतु लंबे गुलामी के कालखंड एवं कालान्तर में भ्रान्तिमूलक संक्रमणों के कारण बाद की पीढि़यों में राष्ट्र के प्रति संवेदनशीलता कम हुई एवं जाति, उपजाति, मजहबी संस्कृति, लिंग, क्षेत्र एवं भाषा के प्रति ज्यादा संवेदनशील होती गई. वर्तमान में मणिपुर हिंसा और कुछ दिन पहले असम मेघालय सीमा का मुद्दा इसी तरह कर्नाटक एवं महाराष्ट्र के बॉर्डर का मसला हो या राज्यों के बीच पानी के बंटवारे का मुद्दा हो, कभी-कभी इन समस्याओं के समाधान के लिए हिंसात्मक रूप अख्तियार कर लिया जाता है और उस समय भारतीय राष्ट्र की अवधारणा को भुला दिया जाता है. हम व्यक्तिगत स्तर पर पेशेवर एवं आर्थिक रूप से सक्षम होते हुए भी समाज के स्तर पर असफल हो जाते हैं, क्योंकि जब हम भारत में पीढ़ियों का विकास करते हैं तो बस राष्ट्र की अवधारणा को स्कूली किताबों तक ही रख देते हैं. राष्ट्र के प्रतिभावनात्मक लगाव एवं संवेदनशील होना हर एक नागरिक की ही जिम्मेदारी है और यह तभी संभव है, जब हम नागरिकों के बीच परस्पर संपर्क को विकसित करें, वह संपर्क भाषा और सांस्कृतिक पर हो. इसी अवधारणा को नई पीढी में विकसित करने के लिए भारत-सरकार ने पहली बार एक व्यवस्थागत रूप से योजना "एक भारत- श्रेष्ठ भारत" शुरू की है. इस योजना के अंतर्गत दो राज्य जो पूरी तरह से सांस्कृतिक एवं भाषाई रूप से भिन्न हैं, उनके बीच 18-30 वर्ष के युवाओं का भ्रमण कराना है. यह युवा संगम के बैनर तले पर्यटन, परंपरा, प्रगति, परस्पर संपर्क एवं प्रौद्योगिकी का अन्वेषण करने हेतु, एक-दूसरे राज्य के लोगों को समझने, अपने देश को बहुआयामी रूप से समझने का प्रयास है. उदाहरण के तौर पर अभी अंडमान निकोबार के बच्चों का समूह झारखंड के भ्रमण पर था और युवाओं ने झारखंड की धरती पर अवस्थित जंगल, खनिज संपदा एवं यहां के गांवो की परंपरा की जानकारी हासिल की. इन बच्चों में ऐसे बहुत सारे बच्चे थे, जो पहली बार भारत के किसी दूसरे राज्य के भ्रमण पर थे. इससे उन बच्चों में झारखंड के प्रति भावनात्मक लगाव विकसित होगा एवं यह भारतीयता की भावना को विकसित करने में सहयोग करेगा. सोचिए, इसी युवा संगम के अंतर्गत बिहार के बच्चों की टीम अभी तमिलनाडु के भ्रमण पर है, जहां ये बच्चे वहां रह कर वहां की परंपरा, भाषा, जीवन यापन के तरीका को समझते हुए एक अच्छी भावना के साथ वापस लौटेंगे तो व्यक्ति से व्यक्ति के प्रति परस्पर संपर्क कितना कारगर होगा. यही योजना कुल 22 राज्यों, जिसमें सात नॉर्थ ईस्ट के राज्य भी हैं, विभिन्न यात्राओं के माध्यम से 1100 बच्चे भाग लेंगे. इसमें भारत के कुल 228 जिले आवृत्त होंगे. इसकी समाप्ति पर स्वत: एक विस्मयकारी कौतुहल देश के प्रति बच्चो में विकसित होगी और वह ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की परिकल्पना को मजबूत करेगी. यजुर्वेद के अनुसार, "किसी निश्चित भूभाग में लम्बे समय से निवास करने वाले मानव समूह, जब उस भूमि और वहां की प्रकृति के साथ तादात्म्य का अनुभव करने लगते हैं तथा परस्पर हित के लिए साहचर्य भाव से संगठित होकर श्रेष्ठ जीवन मूल्यों की परम्परा को स्थापित कर लेते हैं, तब उनकी वह भावानात्मक स्थली `राष्ट्र` कहलाने लगती है". इस परिभाषा को पूर्णतः भारत में उतारने हेतु यह योजना सहायक सिद्ध हो रही है. भारत के परम वैभव की प्राप्ति हेतु नागरिकों के स्तर पर एक परस्पर संपर्क का विकसित किया जाना सबसे जरूरी होता है. ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ के लिए आभ्यन्तर के साथ-साथ वाह्य वैभव को भी संरक्षित करने में भारत सरकार की यह योजना सहायक सिद्ध होगी एवं भविष्य में एक देश, एक भारत जो कि श्रेष्ठ हो, राष्ट्र आपस में सभी सभ्यता, संस्कृति, मजहब, भाषा अपने अस्तित्व के साथ खड़े रहें एवं देश की उन्नति में सहचर बनें. इसी भावना को विकसित करने के लिए ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ के युवा संगम कार्यक्रम के अंतर्गत जम्मू-कश्मीर के युवाओं की टीम पूर्वोतर भारत के असम की कला, संस्कृति के बारे में रूबरू हुए और यह जम्मू-कश्मीर के युवाओं का दूसरे राज्य की संस्कृति, वहां के लोगों के साथ जुड़ाव राष्ट्र के प्रति उनकी भावानाओं को जागृत करने में मदद करेगी. यह राष्ट्रवाद एवं देश के नागरिकों को एक सूत्र मे पिरोने का कामयाब तरीका है. अगर इस योजना का फलक बढ़ाकर अधिक से अधिक युवओं को एक-दूसरे के राज्यों में भ्रमण पर भेजा जाए तो उनके बीच परस्पर सामंजस्य के साथ-साथ आदर बढ़ेगा, जो कि क्षेत्रीयता, भाषावाद, जातिवाद एवं इस तरह की पृथकतावादी विचारों से मुक्ति मिलेगी. अक्सर अपनी श्रेष्ठता, चाहे वह सांस्कृतिक हो, महजबी हो, भाषाई हो, लिंग के प्रति हो, संसाधनों का बंटवारा हो, का बोध नहीं कराकर भारत का एक संतुलित रूप उन बच्चों के विचार-आलोक में प्रस्तुत होगा. विभिन्नता में एकता के साथ-साथ हम भारतीय दूसरे राज्यों को दूसरी संस्कृतियों को समझते हुए आदर के साथ स्वीकार करेंगे. अगर समस्त राज्य सरकारें आपसी सामन्जस्य के साथ इस तरह की योजना विकसित करें तो यह एक भारत की परिकल्पना को ज्यादा मजबूती और तीव्र गति के साथ विकसित होने में कारगर उपक्रम साबित हो सकता है. अधिक से अधिक युवाओं के बीच परस्पर संबंध विकसित होगा, जिन्हें भविष्य में श्रेष्ठ भारत के वाहक बनना है. डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. [wpse_comments_template]  

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