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जानबूझकर बनवायी जा रहीं विवादित फिल्में : डॉ चंचल चौहान

  • सत्ता बदलने से देश के हालात नहीं बदलेंगे, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी की अधीनता समाप्त करने पर ही बदलाव संभव
  • -अथर्व वेद में दर्शायी गयी भारतीय सभ्यता-संस्कृति, पर्व-त्योहार, भाषा-बोली का इस्तेमाल अब वोट बैंक के लिए हो रहा है, खतरे में है भारतीय कल्चर
Kaushal Anand Ranchi : राष्ट्रीय उर्दू सम्मेलन में दिल्ली से हिस्सा लेने आए जनवादी लेखक संघ के कार्यकारी अध्यक्ष एवं पत्रकार डॉ चंचल चौहान की नजर में देश का हालात बदलने के लिए सत्ता परिवर्तन एक विकल्प या उपाय नहीं हो सकता है. भीम राव अंबेडकर के बनाए भारतीय संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर आज सबसे अधिक प्रहार हो रहा है. ये हालात राजनीतिक नहीं है. देश में सत्ता तो लंबे अवधि तक कांग्रेस की रही. आज आरएसएस विचारधारा वाली सरकार है. यह कैसे कहा जा सकता है कि वर्तमान विचारधारा वाली सरकार हट जाती है, तो देश के हालात बदल जाएंगे. ऐसा नहीं है. उन्होंने कहा कि जानबूझकर ऐसी फिल्में बनवायी जा रही हैं, जिससे देश की गंगा-जमुनी संस्कृति और समाज में विभाजन हो, ताकि इसका लाभ वोट बैंक के रूप में मिल सके. शुभम संदेश ने डॉ चंचल चौहान से देश के विभिन्न मुद्दों से बातचीत की.

आरएसएस की पैठ बॉलीवुड तक

डॉ चंचल चौहान ने कहा कि बॉलीवुड भी इसी समाज का हिस्सा है. आखिरकार आज ही किसी भी फिल्म पर विवाद क्यों हो रहा है. पचास के दशक से लेकर 90 के दशक तक एक प्रेरणास्रोत फिल्में क्यों बनती थी, वह हिट भी होती थी. कई ऐसी फिल्में देश में बनी जिसने अंग्रेजों से आजादी तक दिलायी. समाज को बदलने का काम किया. आज ही ऐसी फिल्में क्यों बन रही हैं. दरअसल विभिन्न विचारधारा की पैठ अब बॉलीवुड में हो चुकी है. जिसमें आरएसएस की विचारधारा भी एक है. जानबूझकर ऐसी फिल्में बनवायी जा रही हैं, जिसे देश की गंगा-जमुनी संस्कृति और समाज में विभाजन हो, ताकि इसका लाभ वोट बैंक के रूप में मिल सके.

फिलहाल नहीं सुधरेंगे हालात

डॉ चंचल चौहान कहते हैं कि केवल सत्ता परिवर्तन से देश के हालात नहीं सुधरेंगे. क्योंकि आज विश्व के अधिकांश देश को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी संचालित कर रही है. अधिकांश देश इसके अधीन ही कार्य कर रहे हैं. यह लड़ाई वर्चस्व की है. अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी में तीन संस्थाएं हावी हैं. जिनमें वर्ल्ड बैंक, वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन और इंटर नेशनल मेडिकल एसोसिएशन है. ये जो सलाह और फंड मुहैया कराती हैं, उसके तहत भारत सहित अन्य देश की नीतियां संचालित हो रही हैं. कांग्रेस जमाने में जो भारत और भारत के नागरिकों पर अंतरराष्ट्रीय कर्ज था, वह वर्तमान सरकार में और अधिक बढ़ चुका है. उनकी नजर में फिलहाल देश और दुनिया के हालात बदलने वाले नहीं है. हां, मगर कभी कहीं न कहीं से कोई आवाज उठेगी. हो सकता है कि यूरोपियन कंट्री से इसकी शुरूआत हो.

देश अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी के गुलाम हैं

आज जो देश अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी के गुलाम हैं, वहां गरीब और गरीब, अमीर और अमीर हो रहा है. यह विश्व के विभिन्न राजनीतिक दलों को फंडिंग भी करते हैं. जाहिर है जब हम किसी से पैसे लेकर चलेंगे, तो नीतियां भी उनके अनुसार ही बनेगी. कल कांग्रेस या विपक्ष भी आ गयी, तो हालात यही रहेंगे. फिलहाल भाजपा और आरएसएस विचारधारा अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी का बड़ा केंद्र बनी हुई है. आज यह विचारधारा आर्थिक रूप से इतनी मजबूत हो चुकी है कि पैसे के बल पर हर चीज को बदल दें. एक-एक वोट खरीदने की ताकत रखते हैं.

धर्म की हो रही है मार्केटिंग और ठेकेदारी

चंचल चौहान कहते हैं कि पहले धर्म और धार्मिक लोग ही धर्म की ठेकेदारी करते थे. मगर आज राजनीतिक दल इसकी ठेकेदारी कर रहे हैं. धर्म की मार्केटिंग हो रही है. दरअसल हिंदू धर्म और सभ्यता को किसी मार्केटिंग की जरूरत ही नहीं है. यह अपने आप में आत्मसात करने वाला धर्म है. ऐसा नहीं है कि आज किसी दल या संगठन के कहने पर या उनकी सलाह पर धर्म को मानें और धर्म के प्रति आस्था रखें. धर्म एक आस्था और विश्वास की चीज है. ऐसा नहीं है कि हिंदुवादी संगठन या उनकी विचारधारा नहीं मानने वाले लोग इनसे कम धार्मिक या कट्टर हैं.

धार्मिक आयोजन भी कॉपीराइट जैसा हो गया है

आज देश में धार्मिक आयोजन भी कॉपीराइट जैसा हो गया है. अथर्व वेद में भारतीय धर्म, संस्कृति, भाषा-रहन, सहन के बारे में स्पषेट कर दिया गया है तो फिर से धर्म की परिभाषा गढ़ने की क्या जरूरत है. लोगों के बीच बंटवारा करके कभी किसी धर्म की उन्नति एवं प्रगति नहीं हो सकती है. आज तो ऐतिहासिक पुरुषों की जयंती और पुण्यतिथि भी धर्म और जाति के नाम आयोजित होने लगी हैं. जो भारतीय संस्कृति के लिए बेहद खतरनाक साबित हो रहा है. इसे भी पढ़ें – नयी">https://lagatar.in/urdu-will-end-completely-with-the-new-education-policy-subhashini-ali/">नयी

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