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धर्म बदलने से ‘जाति’ नहीं बदलती, जाति आधारित प्रताड़ना तो नहीं ही

धर्म परिवर्तन के बाद अब अनुसूचित जाति का दर्जा नहीं मिलेगा.

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श्रीनिवास

 

सुप्रीम कोर्ट ने 24 मार्च को एक अहम फैसला सुनाया है- धर्म परिवर्तन के साथ ही अनुसूचित जाति (दलित) का दर्जा खत्म हो जायेगा. इस फैसले से अपनी विनम्र असहमति दर्ज करना चाहता हूं. असहमति दो आधारों पर है. एक तो यह कि मेरी समझ से बौद्ध, जैन और सिख धर्म हिंदू धर्म से अलग हैं, जबकि इस फैसले से वह अंतर खत्म हो गया है. दूसरे, हिंदू समाज के दलितों की सामाजिक हैसियत धर्म बदलने से नहीं बदलती.

 

कायदे से यह फैसला संविधान के अनुरूप ही लगता है, जिसमें ईसाई और इस्लाम धर्मावलंबियों के अलावा देश के सभी नागरिकों को ‘हिंदू’ मान लिया गया है! इसका मतलब बौद्ध, जैन, सिख और तमाम आदिवासी समुदायों का कोई अलग धर्म हो सकता है, है, इसे नहीं माना गया. यह सच्चाई नहीं है. यह सही है कि बौद्ध, जैन और  सिख धर्म का उद्भव भारत में ही हुआ, लेकिन क्या चीन, जापान, श्रीलंका आदि देशों के बौद्धों को भी ‘हिंदू’ माना जा सकता है? यदि नहीं, तो सिर्फ भारत में रहने वाले बौद्ध हिंदू कैसे हो गये?

 

सिख तो इनमें सबसे नया धर्म है, हिंदू धर्म और समाज से निकला हुआ. हिंदू और सिख समाजों में रोटी-बेटी का संबंध भी रहा है, हालांकि धीरे धीरे कमजोर भी पड़ता जा रहा है. लेकिन वह अलग धर्म है, इसे नकारने का कोई औचित्य समझ से परे है.

 

बाबा साहब डॉ आंबेडकर ने कहा था कि मैंने हिंदू के रूप में जन्म भले ही लिया है, मगर हिंदू के रूप में मरूंगा नहीं. फिर उन्होंने 1956 अपने निधन से कुछ समय पहले एक सार्वजनिक समारोह में हिंदू धर्म का त्याग कर बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया! क्या वह  ‘धर्मांतरण’ नहीं  था? क्या अपनी मृत्यु के समय भी वे हिंदू ही थे?

 

सच है कि संविधान के निर्माण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी और वह प्रावधान- कि बौद्ध भी हिंदू माने जायेंगे- भी उनकी सहमति से ही हुआ था. मगर मुझे लगता है, ऐसा ‘पर्सनल लॉ’ के संदर्भ में माना गया होगा! इसलिए कि इन धार्मिक समाजों की परंपराएं, रीति-रिवाज मिलते-जुलते हैं. 

 

असहमति का ठोस आधार यह हकीकत है कि हिंदू समाज के दलित या अनुसूचित जातियों की सामाजिक हैसियत उनके धर्म बदलने से बदल नहीं जाती. उसके साथ भेदभाव समाप्त नहीं हो जाता. दलित से ईसाई बने किसी परिवार को कितने ‘सवर्ण’ या अन्य दलितेतर जातियों के लोग अपने घरों में किरायेदार के रूप में रखने को तैयार होते हैं? या उनके मकान किराये पर लेने के लिए? वैवाहिक रिश्ते की बात तो दूर की बात है. वह तो उप-जातियों में भी मुश्किल से होता है. दलित उनकी नजर में कमतर और हेय हैं और धर्मांतरण से इसमें कोई फर्क नहीं पड़ता. वे ‘दलित’ ही रहते हैं! 

 

यदि हम मानते हैं- जो सच भी है- कि किसी संस्थान में, कार्यस्थल पर किसी दलित के साथ भेदभाव होता है, उसकी जाति को गाली की तरह इस्तेमाल किया जाता है, तो क्या उसके ईसाई या मुसलमान बनते ही उसके साथ व्यवहार में कोई अंतर आता है? क्या किसी दलित के ईसाई बनने पर उसके साथ छुआछूत का व्यवहार बंद हो जाता है? जो लोग दलित (हिंदू) बच्चे से अपने बच्चों का घुलना-मिलना पसंद नहीं करते, उसके ईसाई या मुसलमान बन जाने पर उनका वह भाव खत्म हो जाता है? 

 

आमतौर पर गैर दलित हिंदू किसी दलित हिंदू को उसी बर्तन में खाना या पानी तक नहीं देते, जिसमें खुद खाते-पीते हैं. क्या उसके ईसाई बनते ही यह व्यवहार बदल जाता है? यह एहसास जज साहबान को भी होना चाहिए- कोई भी इन सवालों का ईमानदारी से जवाब देगा तो जवाब होगा- नहीं.

 

पहली नजर में यह बात तर्कसंगत लगती है कि हिंदू समाज के भेदभाव से निजात पाने के लिए किसी ने अन्य धर्म अपना लिया, तो वह ‘दलित’ होने का दावा कैसे कर सकता है? उस धार्मिक समुदाय में तो ऐसी जाति संरचना और भेदभाव नहीं है, कम से कम दावा तो यही है. मगर हकीकत इससे भिन्न है.   

 

भारतीय, खास कर हिंदू समाज में ‘जाति’ जन्म से तय होती है और मरने के बाद भी वह पहचान अमिट रहती है. मुसलमान और ईसाई समाजों में भी धर्मांतरित हिंदू की पहले वाली जाति की पहचान आसानी से खत्म नहीं होती. उन समाजों में भी ऊंच-नीच का भेद बरकरार है. यही कारण है कि इस फैसले के बाद कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने केवल के 'दलित ईसाइयों' को लेकर दुख व्यक्त किया है.

 

हमारा संविधान बहुत मायनों में शानदार है, हमारे लिए सबसे पवित्र पुस्तक है. फिर भी समय के साथ उसमें संशोधन भी होते रहे हैं. यह त्रुटि संविधान में ही थी, जिसे दुरुस्त किये जाने की जरूरत है. मामला मूलतः एससी/एससी एट्रोसिटी एक्ट से सम्बद्ध एक केस से शुरू हुआ. आंध्रप्रदेश में ईसाई बन चुके एक दलित ने जाति के आधार पर प्रताड़ना का मुकदमा किया. नीचे की अदालतों ने उसकी शिकायत इस आधार पर खारिज कर दी कि ईसाई को ऐसी शिकायत करने का अधिकार नहीं है. मामला सुप्रीम का कोर्ट तक पहुंचा, जिसने यह फैसला सुनाया. 

 

इस फैसले पर सिर्फ कानूनी नहीं, संवैधानिक और समाजशास्त्रीय और तथ्यात्मक आधार पर बात होनी चाहिए. संसद में बहस होनी चाहिए और समाज में भी. यह फैसला तकनीकी मसलों पर शायद सही या आधा सही हो. लेकिन न्याय की व्यापक कसौटी पर गैर-जिम्मेदार लगता है. 

 

यह फैसला सुनाने वाले सुप्रीम कोर्ट के संबद्ध न्यायमूर्तियों को शायद एहसास भी न हो, मगर इस फैसले का इस्तेमाल 'दलितों' को यह संदेश देने के लिए भी हो सकता है कि सारा अपमान झेलते हुए भी हिंदू बने रहो. धर्मांतरण से कोई लाभ तो नहीं ही मिलेगा, उल्टे नुकसान ही होगा- आरक्षण से वंचित होने के अलावा जातीय आधार पर होने वाली प्रताड़ना से भी कोई राहत नहीं मिलेगी.

 

इस तथ्य को भी ध्यान में रखना चाहिए कि अफ्रीका के  काली चमड़ी वाली लगभग पूरी आबादी ईसाई बन चुकी है. अमेरिका (यूएसए) के काले लोग भी ईसाई ही हैं. मगर इसके बावजूद रंग और नस्ल के आधार पर भेदभाव जारी है. सीधी बात है- धर्म बदलने से जाति, नस्ल और रंग की पहचान बनी रहती है. इन आधारों पर भेदभाव भी जारी रहता है.

 

इस फैसले के संदर्भ में एक आशंका और है. फिलहाल तो मामला सिर्फ जाति (दलित) का था, नस्ल का नहीं. मगर जल्द ही यह मांग भी उठ सकती है कि धर्मांतरित आदिवासियों को आदिवासी होने के नाते जो सुविधा या संरक्षण हासिल है, उसे समाप्त किया जाये. संकीर्ण हिंदूवादी ऐसी मांग करते भी रहे हैं. विडंबना यह कि खुद को सरना मानने वाले अनेक आदिवासी नेता व समूह भी इसके समर्थन में दिखते हैं!

 

अंत में- इस फैसले से हिंदू समाज की जो सहमति दिख रही है, उस आधार पर क्या यह मान लिया जाये कि आम हिंदू यह मानते हैं कि जिस दलित ने धर्मांतरण नहीं किया है, उसके साथ भेदभाव होता है? प्रकट में ये, खास कर हिंदू धर्म और समाज के स्वयंभू रक्षक, तो मानते ही नहीं कि हिंदू समाज जन्मगत जातियों में विभाजित है और कथित ‘शूद्र’ जातियों के साथ कोई भेदभाव होता है! 

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