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झारखंड में नियुक्तियों में भ्रष्टाचार-01:  विधानसभा से हुई शुरूआत

राज्य गठन के बाद नियुक्ति में भ्रष्टाचार की शुरूआत विधानसभा के पहले अध्यक्ष इंदर सिंह नामधारी के कार्यकाल में हुई. राज्य गठन के बाद उनकी काबिलियत की वजह से उन्हें विधानसभा का पहला अध्यक्ष बनाया गया था. अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने राज्य को ईमानदारी से चलाने के लिए बिरसा मुंडा की मूर्ति के नीचे जमा होकर कसम खाने का आह्वान किया. लेकिन ईमानदारी से शासन चलाने की कसम खाने कोई नहीं गया.
 
  • नियुक्ति में भ्रष्टाचार की शुरूआत विधानसभा के पहले अध्यक्ष इंदर सिंह नामधारी के कार्यकाल में हुई.
  • मुख्य सचिव के विरोध के बावजूद बाबूलाल मरांडी ने दिलीप प्रसाद को आयोग का सदस्य नियुक्त किया.
  • "खाट में खटमल पड़ जाने पर खाट नहीं जलाया जाता, खटमल निकाला जाता है" की दलील देकर रद्द हो चुके विज्ञापन पर नियुक्तियां की गयीं.

Ranchi: झारखंड में नियुक्ति के दौरान भ्रष्टाचार की शुरूआत कहीं और से नहीं बल्कि वहीं से शुरु हुई, जहां हमारे रहनुमा फैसले लेते हैं, यानी विधानसभा से. इसके बाद नियुक्ति के दौरान भ्रष्टाचार का दायरा बढ़ता गया. झारखंड राज्य लोक सेवा आयोग भी इसकी चपेट में आया.

 

आयोग में नियुक्तियों को लेकर राज्य के पहले मुख्यमंत्री बालूलाल मरांडी और पहले मुख्य सचिव विजय शंकर दुबे के बीच मदभेद पैदा हुआ. इनके विरोध के बावजूद दिलीप प्रसाद को आयोग का सदस्य नियुक्त किया गया. बाद में अध्यक्ष बना दिया गया. इसके बाद आयोग द्वारा की गयी नियुक्तियों में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हुआ. 

 

जेपीएससी द्वारा की गई नियुक्तियों में भ्रष्टाचार की सीबीआई जांच हुई और अध्यक्ष सहित कई सदस्य जेल गये. लेकिन भ्रष्टाचार नहीं रूका. बढ़ता ही गया. अब नियुक्तियों में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर छात्र आंदोलनरत हैं. सत्ता पक्ष और विपक्ष अपने-अपने तरीके से एक दूसरे पर आरोप मढ़ रहा है.

 

राज्य गठन के बाद नियुक्ति में भ्रष्टाचार की शुरूआत विधानसभा के पहले अध्यक्ष इंदर सिंह नामधारी के कार्यकाल में हुई. राज्य गठन के बाद उनकी काबिलियत की वजह से उन्हें विधानसभा का पहला अध्यक्ष बनाया गया था. अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने राज्य को ईमानदारी से चलाने के लिए बिरसा मुंडा की मूर्ति के नीचे जमा होकर कसम खाने का आह्वान किया. लेकिन ईमानदारी से शासन चलाने की कसम खाने कोई नहीं गया.

 

उन्हीं इंदर सिंह नामधारी के कार्यकाल में विधानसभा में नियुक्ति की शुरुआत हुई. लेकिन पहली नियुक्ति ही विवादों में घिर गया. इसकी वजह चतुर्थ वर्गीय पदों पर हुई नियुक्ति के दौरान सबसे ज्यादा पलामू के लोगों का चयन होना था. इसके बाद विधानसभा में होने वाली नियुक्तियों में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी हुई और भ्रष्टाचार के आरोप लगे. 

 

विधायक सरयू राय ने भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाये. इससे संबंधित सबूत भी दिये. भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए समिति बनी. समिति ने भी गड़बड़ी की पुष्टि की. साथ ही स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराने की अनुशंसा की. लेकिन समिति की अनुशंसा के बाद सरकारी स्तर पर चुप्पी साध ली गयी.

 

राष्ट्रपति शासन के दौरान विधानसभा में नियुक्तियों में भ्रष्टाचार का मामला फिर उठा. इसके बाद राज्यपाल ने विधानसभा की नियुक्तियों में हुई गड़बड़ी की जांच का आदेश दिया. सेवानिवृत न्यायाधीश लोकनाथ प्रसाद को जांच आयोग का अध्यक्ष बनाया गया. आयोग ने जांच शुरू की. लेकिन सहयोग नहीं मिलने की वजह से आयोग के अध्यक्ष ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया.

 

इसके बाद सेवानिवृत न्यायाधीश विक्रमादित्य प्रसाद को एक सदस्यीय न्यायिक आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया गया. उन्हें अतिरिक्त शक्तियां दी गयीं. उन्होंने मामले की जांच की. विधानसभा में हुई नियुक्तियों पर अपनी रिपोर्ट राज्यपाल को सौंपी. रिपोर्ट में उन्होंने कई शून्य अंक पाने वालों को नियुक्त करने, आवेदन देने की तिथि समाप्त होने के बाद मिले आवेदकों को राजनीतिक कारणों से नियुक्त करने सहित अन्य प्रकार की गड़बड़ियों का उल्लेख किया.

 

आयोग ने अपनी रिपोर्ट में विधानसभा के पूर्व अध्यक्षों इंदर सिंह नामधारी, आलमगीर आलम पर कार्रवाई करने की अनुशंसा की. इंदर सिंह नामधारी के मामले की चर्चा करते हुए आयोग ने लिखा कि नियुक्तियों से संबंधित रद्द किये जा चुके एक विज्ञापन को उन्होंने वापस लिया. इस विज्ञापन को फिर से सक्रिय करने के लिए उन्होंने फाइल पर अनोखा तर्क दिया. फाइल पर उन्होंने लिखा कि खाट में खटमल पड़ जाने के बाद खाट नहीं जलाया जाता है, खटमल निकाला जाता है. इस दलील के बाद रद्द किये जा चुके विज्ञापन पर नियुक्तियां की गयीं.

 

न्यायिक आयोग की रिपोर्ट के आलोक में तत्कालीन राज्यपाल द्रोपदी मुर्मू ने विधासभा अध्यक्ष को पत्र लिखा. इसमें उन्होंने सीबीआई जांच कराने की अनुशंसा की. लेकिन विधानसभा ने सीबीआई जांच कराने की दिशा में कोई पहल नहीं की. विधानसभा के अनुरोध पर सरकार ने जस्टिस एसजे मुखोपाध्याय की अध्यक्षता में एक सदस्यीय न्यायिक आयोग का गठन किया. 

 

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तत्कालीन राज्यपाल द्रोपदी मुर्मू (अब भारत के राष्ट्रपति) का विधानसभा अध्यक्ष को लिखा गया पत्र. 

 

इस आयोग का गठन, विक्रमादित्य प्रसाद आयोग की अनुशंसाओं को लागू करने में आनेवाली परेशानियों को दूर करने के लिए सुझाव देने के लिए किया गया था. लेकिन जस्टिस एसजे मुखोपाध्याय की आयोग ने विक्रमादित्य प्रसाद आयोग की रिपोर्ट को पूरी तरह खारिज कर दिया. विधानसभा अध्यक्ष के खिलाफ कार्रवाई की अनुशंसा को यह कहते हुए खारिज कर दी कि विक्रमादित्य प्रसाद आयोग के लिए निर्धारित टर्मस ऑफ रिफ्रेंस में यह बिंदु शामिल नहीं था.

 

इसके बाद झारखंड हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की गयी. इसमें विधानसभा की ओर से आवश्यक दस्तावेज पेश करने में आनाकानी की गयी थी. इस मामले में कोर्ट द्वारा अपनी नाराजगी का इजहार किये जाने के बाद विधनसभा की ओर से दस्तावेज दिये गये. 

 

मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने विधानसभा में हुई नियुक्तियों की सीबीआई जांच का आदेश दिया. लेकिन सरकार ने हाईकोर्ट के इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के बाद विधानसभा नियुक्ति घोटाले की सीबीआई जांच पर रोक लगा दी. मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है और शून्य नंबर वाले नौकरी कर रहे हैं.

 

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